साजिशों से घिरी काले धन की सचाई

(किंशुक पाठक)

पनामा लीक्स मामले में मुख्य भूमिका निभाने वाली पत्रकार डैफ्नी कैरुआना गलिजिया की हत्या ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। पैराडाइज पेपर्स का किस्सा सामने आने से ठीक पहले हुई इस घटना ने पूरी दुनिया में यह चिंता पैदा कर दी है कि सफेदपोशों के काले कारनामे उजागर करने वालों का क्या यही अंजाम होगा? क्या निष्पक्ष और निर्भीक ढंग से अपना पत्रकारीय धर्म निभाने वाले इसी तरह शांत कर दिए जाएंगे? अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की स्वतंत्रता और न्यायिक समानता जैसी बातें सिर्फ नारों में सिमट कर रह जाएंगी? डैफ्नी की हत्या तब हुई जब वह अपने घर से निकलकर नॉर्थ माल्टा की ओर जा रही थीं। उनकी कार में धमाका हुआ और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। डैफ्नी एक स्वतंत्र ब्लॉग चलाती थीं, जिसके जरिए वह भ्रष्टाचार के कई मामलों का खुलासा कर चुकी थीं। उन्हें लेडी विकीलीक्स भी कहा जाता था। मौत से कुछ समय पहले ही उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा था कि यहां हर जगह बदमाश बैठे हैं, स्थिति बेहद खराब है। उनकी मौत के बाद उनके छोटे से शहर में करीब 3000 लोगों ने कैंडल मार्च निकाला।

इस घटना ने दुनियाभर के पत्रकार संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी संस्था कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। इराक और अफगानिस्तान में कैमरे के सामने पत्रकारों का सिर काटा जाना और आतंक से जूझते क्षेत्रों में छोटे-मोटे सवालों को लेकर उनपर होने वाले हमले भारत सहित तमाम देशों की गंभीर समस्या है। इथियोपिया, चीन, वियतनाम, अफगानिस्तान जैसे देश पत्रकारों के लिए बेहद खतरनाक देशों की सूची में शामिल हैं, जहां स्वतंत्र पत्रकारिता, खासकर महिला पत्रकारों का काम दिवास्वप्न बनता जा रहा है। डैफ्नी माल्टा द्वीप के प्रमुख पत्र द माल्टा इंडिपेंडेट में पिछले 21 वर्षों से निरंतर पाक्षिक कॉलम लिखती रहीं, जो बेहग लोकप्रिय था।

पनामा पेपर लीक्स में माल्टा के राजनीतिज्ञों का भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद वहां कार्यकाल पूरा होने के चार महीने पहले ही संसद को भंग कर चुनाव कराए गए थे, जिसमें प्रधानमंत्री जोसफ मस्कट ने दोबारा चुनाव जीतकर अपने पद पर वापसी की। मस्कट ने डैफ्नी की हत्या पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, सभी जानते हैं कि वे व्यक्तिगत और राजनीतिक रूप से मेरी बड़ी निंदक थीं लेकिन इस घटना को किसी भी तरह से ठीक नहीं ठहराया जा सकता और इस मामले में न्याय होने तक मैं चौन से नहीं बैठूंगा।करप्शन के अनेक मामलों को डैफ्नी ने बेखौफ उजागर किया। वह अपने देश की सत्ता ही नहीं, विपक्ष के भी निशाने पर रहीं। लंदन में एक वेश्यावृत्ति रैकेट से माल्टा के विपक्षी दल की एक महिला नेता के जुड़े होने तथा सरकारी जर्मनी यात्रा के दौरान एक मंत्री के वेश्यालय जाने से संबंधित खबरें भी उन्होंने उजागर की थीं। डैफ्नी को कुछ दिनों से हत्या और बलात्कार की धमकियां मिल रही थीं, जिसकी उन्होंने शिकायत भी दर्ज कराई थी लेकिन सरकारी अधिकारियों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी।

खोजी पत्रकारिता के जरिए देश की सत्ता को हिला देने के मामले पहले भी सामने आए हैं। वाटरगेट स्कैंडल को लेकर की गई अपनी खोजी पत्रकारिता के जरिये वाशिंगटन पोस्ट के कार्ल बर्नस्टाइन और बॉब वुडवर्ड ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को राष्ट्रपति पद से हटने को मजबूर किया था। कल्पित नाम डीप थ्रोट के जरिए यह अभियान चलाया गया जिसे पत्रकारों ने लंबे समय तक गोपनीय रखा। भारत में भी साहसी पत्रकारों ने अपनी खोजी पत्रकारिता से कई बार सत्ता को हिलाया। डैफ्नी की हत्या इस जमात के लिए एक गहरे सदमे के साथ ही चुनौती भी है। पनामा लीक्स के नतीजों ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। दुनियाभर के चुनिंदा पत्रकारों ने लंबे और अथक साहसी अभियान के जरिए 1970 से 2015 के बीच के लगभग सवा करोड़ ऐसे कागजात दुनिया के सामने रखे, जिससे कई देशों के 2 लाख 14 हजार से अधिक अरबपति राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और अफसरशाहों की अवैध संपत्ति और टैक्स चोरी से पर्दा उठ गया।

साफ हो गया कि समाज में अपना दबदबा रखने वाले विभिन्न देशों के नामी लोग धोखाधड़ी, टैक्स चोरी और अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने ही देश के संसाधन लूटने में लगे थे। जाहिर है, इसे उजागर करने वाले पत्रकारों का मकसद एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की स्थापना है, जिसमें सब कुछ नियम-कायदे से चले। सभी देशों की सरकारों को टैक्स मिलें ताकि उसे जनकल्याण पर खर्च किया जा सके लेकिन स्वार्थी तत्व ऐसा कभी नहीं होने देना चाहते। संभव है, उन्हीं में से किसी ने डैफ्नी को मौत की नींद सुला दिया हो। इस हत्या की जांच होनी चाहिए क्योंकि यह किसी एक देश का न होकर पूरी दुनिया, पूरी मानवता का मामला है।

अगर एक जगह सच को दबाया जाता है तो दूसरी जगह भी झूठ के झंडाबरदारों का मनोबल बढ़ जाता है। आज पूरी दुनिया में पत्रकारों पर ही नहीं, मनुष्यता के पक्ष में खड़े लोगों पर भी हमले हो रहे हैं। भारत में पत्रकार गौरी लंकेश से पहले गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर का भी मर्डर किया गया। कई कस्बों और गांवों में पत्रकार और आरटीआई ऐक्टिविस्ट मारे गए हैं। कई लोग सिर्फ इसलिए निशाने पर हैं कि वे सरकारों की तारीफ नहीं करते या सत्तारूढ़ विचारधारा से असहमति जताते हैं। यह खतरनाक स्थिति है। अगर हम न्याय पर आधारित एक लोकतांत्रिक दुनिया में जीना चाहते हैं तो हमें उन लोगों के साथ खड़ा होना होगा, जो अपनी जान जोखिम में डालकर सच को सामने ला रहे हैं।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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