हवा खराब हो या सही, खिचड़ी तो पकनी ही चाहिए

(सुधीर मिश्र)

खुर्शीद तलब साहब का एक शेर हैः

हवा तो है ही मुख़ालिफ़ मुझे डराता है क्या!

हवा से पूछ के कोई दिए जलाता है क्या!!

पर साहब हवा इतनी भी मुखालिफ़ नहीं होनी चाहिए कि सांस लेना ही मुश्किल हो जाए। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक आजकल ऐसी ही हवा चल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि जाड़े भर सुबह घर से बाहर न घूमें। नहीं तो दमा हो जाएगा। प्रधानमंत्री जी तीन साल से स्वच्छ भारत का नारा दे देकर परेशान हैं पर देश है कि साफ होने को ही तैयार नहीं।

ग़नीमत है कि हमारे देश में बहुत ही समझदार, दूरदृष्टि वाले और उद्देश्यपूर्ण टीवी चौनल हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, हमारे पास टीवी देखकर घंटो फेसबुक और वॉट्सऐप पर पूरी मेहनत से बहस करने वाले लाखों-करोड़ों नौजवानों, बुजुर्गों और महिलाओं का समूह भी है। ये ऐसे लोग हैं, जो पूरे देश को हताशा और निराशा भरे विषयों की नकारात्मकता से दूर रखते हैं। मिसाल के तौर पर यूपी-बिहार में गरीब मां और शिशु कितनी बड़ी संख्या में अकाल मौत मर रहे हैं, इस पर अगर ज्यादा ध्यान देंगे तो अपन लोगों से उखड़ेगा तो कुछ नहीं, सोच-सोचकर परेशान और हो जाएंगे। इससे अच्छा है कि टीवी पर यह बहस देखें कि अगर किसी व्यंजन को राष्ट्रीय का तमगा देना है तो वह खिचड़ी हो सकती है या बिरयानी।

इसमें उत्तेजना और चटखारे की पर्याप्त गुंजाइश है। आप इसे हिन्दू-मुसलमान के हिसाब से भी देख सकते हैं। यह ऐसा मुद्दा है कि जरूरत पड़े तो बात आगे बढ़ाकर इसे चुनाव जिताने-हराने लायक मसले में भी तब्दील किया जा सकता है। ऐसे देश में जहां हर साल पंचायत से लेकर लोकसभा तक कोई न कोई चुनाव होता रहता है, वहां ऐसे मुद्दे हमेशा अपने लिए पर्याप्त गुंजाइश रखते हैं। आप खुद ही सोचिए कि अब नगर निगम के चुनाव में क्या जरूरी है। वोट क्या इस बात से मिलेगा कि प्रत्याशी बढ़ते प्रदूषण, गंदी होती नदियों, जहरीली होती हवा, गड्ढों, सड़कों व गलियों की बदहाली और बिगड़ते मौसम की बात करें। या फिर राष्ट्रवाद, सेकुलरिजम, पटेल बड़े या नेहरू और ताज था या शिवालय जैसे बेहद गंभीर मुद्दों पर तकरीर करें। वोटरों को भी पसंद है कि प्रत्याशी पर्यावरण, प्रदूषण, गंदगी, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, नाली, गली या खड़ंजों की बात करने के बजाए उनका कुछ मनोरंजन करे।

मनोरंजन गंगा, यमुना और गोमती के प्रदूषण पर बोरियत भरी चिंता जताने से नहीं होता। न ही इस बात से कि लगातार जहरीली होती हवा ने अब आपका सांस लेना भी मुश्किल कर दिया है। हमारे वोटर बेहद कमिटेड हैं। सांस लेना भले ही बंद हो जाए पर वो ना तो मुद्दों की बात करेंगे और ना ही सुनना पसंद करेंगे। आजादी के बाद से अब तक गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी दूर करने के हर साल इतने वादे वो सुनते आए हैं कि अब उन पर तो भरोसा ही नहीं रहा। असली मुद्दों की बात नेता भरमाने के लिए करते हैं। खिचड़ी, पटेल, ताज और बैल, ये ऐसे मुद्दे हैं कि कुछ समय तक कम से कम मनोरंजन करते हैं। गौरवान्वित करते हैं। ये मुद्दे हमारी जातीय, मजहबी और धार्मिक पहचान से जुड़े हैं।

यकीन न आए तो किसी सार्थक विषय पर बहस करके देख लीजिए। लोग आपकी सात पुश्तें न तार दें तो कहिएगा। हाल ही में लखनऊ से दिल्ली की ट्रेन यात्रा के दौरान कुछ साथी मुसाफिरों के साथ बात-बात में निकल गया कि गर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। खासतौर से जाड़ों का तापमान तो अब पहले के मुकाबले औसतन तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। इतना बोलने की देर थी कि साथी मुसाफिरों में से एक ने गुस्से में भरकर तुरंत सवाल दाग दिया, मतलब पिछली सरकार में तापमान एकदम ठीक रहता था, यह भी सरकार की गलती है? मैने तुरंत माफी मांगी और कहा, जी नहीं, यह फर्क तो बीते सौ साल में आया है और तुरंत यह चर्चा शुरू कर दी कि खिचड़ी राष्ट्रीय डिश होनी चाहिए या नहीं। अब सब खुश थे और मैं भी खलील तनवीर के इस शेर को बुदबुदाते हुए सोने की कोशिश करने लगा

अब के सफ़र में दर्द के पहलू अजीब हैं!

जो लोग हम-ख़याल न थे हम-सफ़र हुए!!

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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