मोदी की शुरू से आखिर तक की चुनावी स्क्रिप्ट, तब विपक्ष कैसे लड़े?

 

 

(हरि शंकर व्यास)

मेरी 24 फरवरी को लिखी बात सही प्रमाणित हुई। रविवार को मैंने गपशप कालम में लिखा था – मेरी इस बात को नोट करके रखें कि अगले तीन महीने में हिंदू बनाम मुस्लिम की भावनाओं के उबाल को लगातार आग दी जाती रहेगी। तीन महीनों में कश्मीर में एक्शन (अनुच्छेद 370 या 35 ए को खत्म करने) से लेकर वहां की सीमा पार दो-तीन बार सर्जिकल स्ट्राइक का हल्ला बनेगा।ऐसी जब खबर बनेगी तो चुनाव लड़ रहे राहुल गांधी, माया, अखिलेश या केजरीवाल में तब कौन सवाल करने की, सबूत मांगने की हिम्मत करेगा? किसी ने चूं भी की तो टीवी चौनल टूट पड़ेंगे कि देखो ये देशद्रोही जो सेना के कहे पर सवाल कर रहे हैं! जबकि मोदी जनसभाओं में बोलेंगे सेना को सलाम!

क्या वह लिखा सही नहीं हुआ? तय माने 14 फरवरी में पुलवामा के आंतकी हमले से ले कर 14 मई तक के तीन महिनों में चुनाव में जो होगा वह नरेंद्र मोदी की स्क्रीप्ट अनुसार होगा। चुनाव की स्क्रीप्ट, उसका सेट सत्ता के जलवे में सजा हुआ तो मोदी ही डायरेक्टर, एक्शन शुरू दृबंद कराने का भोंपू लिए हुए, वे ही कैमरामैन, स्पेशल इफेक्ट निर्माता! स्क्रीप्ट अनुसार शूटिंग का श्यूडल भी दिन-प्रतिदिन के कलेंडर में इवेंट के ब्यौरे के साथ उन्ही द्वारा बनाया हुआ। अब जब ऐसा है तो राहुल, केजरीवाल, अखिलेश, ममता आदि का इस चुनावी स्क्रीप्ट में क्या रोल बनेगा? ये पिछले दस दिनों में किस रोल में दिखे? या तो एक्स्ट्रा कलाकार के नाते या खलनायक की तरह। ऐसा यदि 14 मई तक लगातार हुआ तो चुनाव में नरेंद्र मोदी सुपरस्टार साबित हो कर जीतेगे या नहीं?

सोचिए 14 फरवरी से ले कर 28 फरवरी के आज के दिन तक विपक्ष क्या कहीं दिखाई दिया? न मोदी की स्क्रीप्ट में इनका रोल झलका और न ये अपनी स्क्रीप्ट बनाए एक्शन, रिएक्शन करते मिले। ये चुप सन्नाटे, गुमनामी में रहे या ताली बजाई। केजरीवाल ने ध्यान बंटाने के लिए दिल्ली में धरने पर बैठने की घोषणा की थी मेगर स्पेशल इफेक्ट-एक्शन का धमाका हुआ नहीं कि केजरीवाल ने ताबड़तोड धरने पर नहीं बैठने का ऐलान किया। सबकी बोलती बंद। मगर हां, एक्शन-स्पेशल इफेक्ट के बाद नरेंद्र मोदी ने बेधड़के, पहले की तरह चुरू में वीर रस की पंक्तियां बोल पूरे देश से कहां वे देश को मिटने नहीं देंगे! सोचे इतनी बड़ी बात। बावजूद इसके विपक्ष में यह सवाल करने की हिम्मत नहीं हुई कि भला देश के मिटने की बात कहने की नौबत कैसे आ गई!

सेट पर देश के मिटने, उसे बचाने वाले एक्शन के स्पेशल इफेक्ट की वाह, रोने-धोने, सस्पेंश से ले कर हीरो की दस लीलाओं की दस तरह की झांकियां! स्क्रीप्ट में एक के बाद एक धडाधड असंख्य रूपों में नरेंद्र मोदी। कभी प्रधानसेवक के रूप में तो कभी किसानों पर दया बरपाते हुए तो कभी गरजते हुए तो कभी भ्रष्टाचारियों का शमन करते हुए तो कभी दलित के पांव धोते हुए। सोचे भारत के आजाद इतिहास में या दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की प्रक्रिया में जनता को रिझाने, मूर्ख बनाने, उल्लू बनाने की ऐसी प्रपंची स्क्रीप्ट कब देखने को मिली जिसमें प्रधानमंत्री के लोगों के पांव धोने से ले कर देश के मिटने और मिटने नहीं देने के संवाद का एक्स्ट्रीमपना रहा हो।

इसका अर्थ यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी को ऐसा करने का हक नहीं है। लोकतंत्र है, चुनाव है तो वे कैसे भी चुनाव लड़े यह उनका हक है। चाहे जैसी अपनी स्क्रीप्ट, फिल्म बनाए। असली मसला लोकतंत्र और चुनाव का यह है कि जो विपक्ष है वह कहां है? उसकी स्क्रीप्ट, एक्शन, स्पेशल इफेक्ट कहां है? कौन है उसका डायरेक्टर, कैमरामेन और हिरो? वह अपनी फिल्म बना रहा है या जाने-अनजाने मोदी की स्क्रीप्ट में विलेन या एक्स्ट्रा रोल में है?

पहला सवाल है कि विपक्ष की स्क्रीप्ट कहां है? दूसरी बात स्क्रीप्ट का मकसद नरेंद्र मोदी को हराने का है या नहीं? इन दो सवालों पर सोचे तो राहुल गांधी, प्रियंका सोनिया गांधी और कांग्रेस कार्यसमिति की स्क्रीप्टिग (सभी विरोधी नेताओं व पूरे विपक्ष पर भी बात लागू) वह पहेली है जिस पर मैं बार-बार लिखता आ रहा हूं। पिछले 14 दिनों याकि 14 फरवरी से 28 फरवरी का घटनाक्रम देखें। इतना कुछ हुआ कि हिसाब से राहुल-प्रिंयका-शरद पवार-चंद्रबाबू नायडु- ममता- केजरीवाल आदि की आँखे मोदी की चुनावी स्क्रीप्ट के एक्शन, एक्टिंग से खुलनी चाहिए। इन्हे समझ आ जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी का एकमेव टारगेट जैसे भी हो चुनाव जीतना है। साम-दाम-दंड-भेद, अभिनय की दस मुद्राओं, देश के मिटने-नहीं मिटने देने के संवादों से वे 20-25 करोडों हिंदू दर्शकों के वोट डलवाने के लिए सबकुछ लुटा देंगे।

इतना समझ आना चाहिए। तब सवाल है कि विपक्ष क्या करें? इस अनुभव के बाद उसकी चुनावी स्क्रीप्ट में एक्शन, संवाद क्या बने? अच्छे-अच्छे जानकार किंकर्त्वयमूढ़ है। दशा गंभीर है। तभी पेश है चुनाव-राजनीति को कवर करने के चालीस साला अनुभव में विपक्ष के लिए फिलहाल बनते ये सुझाव-

– राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल महानायक बने। तीनों त्याग दिखलाएं। राहुल गांधी यूपी (दो सीट छोड), बंगाल, और आंध्रप्रदेश में कांग्रेस के चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा करें।

– ऐसी त्यागी भूमिका अखिलेश व केजरीवाल भी दिखा सकते है। मतलब आप पार्टी यह कहते हुए लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा करें कि मोदी को हराना क्योंकि उसका पहला मकसद है इसलिए वह दिल्ली में चुनाव नहीं लड़ कर मोदी को हरवाएगी तो उधर अखिलेश पूरे देश में अपने को सुपर हीरो बनवाते हुए ऐलान करें कि वे यूपी में अपने कोटे की 8-10 सीटे कांग्रेस को देने का त्याग कर मोदी विरोधी मोर्चे के लिए कुरबानी दे रहे है। वे कहीं भी विपक्ष के आपस में वोट काटने वाले उम्मीदवार नहीं खड़े करेंगे।

– राहुल गांधी अपना त्यागी, गंभीर सुपर रोल बनाए। जब मोदी दलितों के पांव धो कर दलित वोटों को रिझाने का एक्शन, अभिनय कर सकते है तो राहुल क्यों न मायावती के घर जा कर बैठे? केजरीवाल के घर, ममता, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक के घर जा कर क्यों न उनके दरवाजे पर बैठे? इससे राहुल गांधी की इमेज घटेगी नहीं बल्कि महानायक वाली बनेगी। अपने आप वे कैप्टन बनेंगे। यदि अकेले जाने की हिम्मत नहीं हो तो प्रियंका, शरद पवार को साथ ले जाएं। पूरे देश में राहुल गांधी, अखिलेश और केजरीवाल को बतौर नौजवान चेहरों के सिर्फ और सिर्फ यह मैसेज बनाना चाहिए कि उनमें दम है, समझ है नरेंद्र मोदी को हरा देने की। वे इसके लिए निजी हित-पार्टी हित छोड़ देश को, लोकतंत्र को मिटने नहीं देने के लिए सबकुछ कुरबान करने को तैयार है।

– प्रिंयका सिर्फ और सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस की आमने-सामने वाली लड़ाई के प्रदेशों में प्रचार करें। उत्तरप्रदेश से फोकस हटा ले। वहां सबका एलायंस बने तभी प्रचार करें।

– सीताराम यूचरी लेफ्ट की पार्टियों से फैसला कराएं कि वे किसी भी प्रदेश में अकेले चुनाव नहीं लड़ेंगे। पश्चिम बंगाल में चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर ममता के समर्थन की एकतरफा घोषणा करें तो केरल में कांग्रेस के आगे एलायंस से लड़ने का प्रस्ताव रखें।

– लेफ्ट का ऐसा ऐलान पूरे देश में लेफ्ट के त्याग, मोदी विरोध की उसकी संजीदगी की ऐसी इमेज बनाएगा जो चुनाव बाद राजनीति में उसकी नैतिक पूंजी होगी। अपनी दलील है कि यचूरी, करात, लेफ्ट यदि धर्मनिरपेक्षा, समानता की बातों में कसम खाते है तो लेफ्ट को ही नरेंद्र मोदी को ले कर सर्वाधिक चिंता में होना चाहिए। मोदी को वापिस न आने देने का पहला प्रण लेफ्ट का बनता है तब वह बंगाल में, केरल में इस तरह चुनाव क्यों लड़े जिससे मोदी-शाह जीते। यचूरी का तर्क हो सकता है कि तब सीपीएम के राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता जितने वोट नहीं बनेगे। वह राष्ट्रीय पार्टी नहीं रह पाएगी। लेकिन इस छोटे से स्वार्थ में वह भाजपा को बंगाल में, केरल में त्रिवेंद्रम जैसी सीट जीतने देगी, मोदी को वापिस पीएम बनाएगी तो राष्ट्रीय पार्टी रह कर भी क्या खाक करेगी। उलटे लेफ्ट के लिए केरल, बंगाल में मोदी-शाह की अप्रत्याशित जीत भारत के लेफ्ट इतिहास का तब सबसे बडा कलंक बनेगा।

सार-संक्षेपः राहुल-प्रियंका जाने कि इस चुनाव में कांग्रेस जितना त्याग करेगी उससे कई गुना अधिक, देश की बहुसंख्यक आबादी में दोनों महानायक बनेंगे। दलित, ब्राह्यण, मुसलमान और ओबीसी से ले कर सिविल सोसायटी, एनजीओ आदि तमाम तरह के वर्ग, वर्ण सभी में राहुल-प्रियंका-कांग्रेस को लोग, मोदी विरोधी सिर आंखों बैठाएगें। मतलब राहुल, केजरीवाल, ममता, अखिलेश, चंद्रबाबू सभी त्यागी का रोल बना, अर्जुन की आंख वाला एक लक्ष्य बना अपनी ऐसी चुनावी स्क्रीप्ट लिख सकते है जिससे अचानक पांसा पलटा मिलेगा। तब चुनाव में विपक्ष की स्क्रीप्ट भी शूटिग का सेट लिए होगी, संवाद लिए हुए होगी और विपक्ष का हर चेहरा नरेंद्र मोदी की ललकार के आगे दबंगी से खड़ा मिलेगा। फिर भले केजरीवाल हो या राहुल या ममता या अखिलेश! हां, केजरीवाल व दिल्ली के उदाहरण में ही समझे कि यदि केजरीवाल चुनाव न लड़े तब भी वे कांग्रेस का समर्थन करते हुए नरेंद्र मोदी के खिलाफ यह दहाड़ निकालते हुए होंगे कि एक सीट नहीं जीतने देंगे या कांग्रेस- आप में सीट का कम ज्यादा जैसा भी एलायंस बने तो पूरे देश में केजरीवाल, शीला दीक्षित दोनों अपने साझा सजे सेट से यह डॉयलाग मारने का दम लिए हुए होंगे कि हम दिल्ली में मोदी को मिटा देंगे!

(साई फीचर्स)

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