कब होंगे खुले में शौच से मुक्त ग्राम!

 

 

(शरद खरे)

भारत की आधी से अधिक आबादी खुले में शौच जाने को मजबूर है। इसके परिणाम स्वरूप अनेक बीमारियां जिनमें उल्टी, दस्त प्रमुख हैं, बड़े पैमाने पर फैलती हैं, जिनकी परिणिति कई बार मृत्यु ही होती है। सरकारी योजनाओं में शौचालय निर्माण की बात तो जोर-शोर से की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर हमारे सामने रख रही है।

दुनिया में सर्वाधिक लोग दूषित जल से होने वाली बीमारियों से पीड़ित हैं। आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश लोग डायरिया से पीड़ित होते हैं, जिनमें से कई बच्चों की तो मौत ही हो जाती है। डायरिया से मौत की वजह प्रदूषित जल और गंदगी ही है।

अनुमान है कि 80 प्रतिशत बीमारियां और एक तिहाई मौतों के लिये प्रदूषित जल का सेवन ही जिम्मेदार है। प्रत्येक व्यक्ति के रचनात्मक कार्यों में लगने वाले समय का लगभग दसवां हिस्सा जलजनित रोगों की भेंट चढ़ जाता है। यही वजह है कि इन बीमारियों के नियंत्रण और अपनी रचनात्मक शक्ति को बरकरार रखने के लिये साफ-सफाई, स्वास्थ्य और पीने के साफ पानी की आपूर्ति पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। निश्चित तौर पर साफ पानी लोगों के स्वास्थ्य और रचनात्मकता को बढ़ावा देगा। कहा भी गया है कि सुरक्षित पेयजल की सुनिश्चितता जल जनित रोगों के नियंत्रण और रोकथाम की कुंजी है।

ऐसे में हमें मर्यादापूर्वक शौच निपटाने की सही सोच के साथ शौचालय उपलब्ध होना ही चाहिये। सरकार निर्मल भारत अभियान, संपूर्ण स्वच्छता अभियान आदि से शौचालय बनवाना चाहती है और इसके लिये काफी बड़े बजट का प्रावधान किया गया है, लेकिन सफाई, स्वच्छता पर खर्च होने वाला धन यदि केवल शौच गृह बनाने तक सीमित है तो हम मल प्रबंधन, खुले में शौच समस्या को ट्रांसफर भर कर रहे हैं, न की इस समस्या का पूरा निराकरण कर रहे हैं। महात्मा गाँधी के अनुसार कचरा वह चीज है, जो अपने यथास्थान नहीं है। अगर वह अपने उचित स्थान पर पहुँच जाये तो वह हमारे लिये संपत्ति हो जाती है, पर सीवेज या फ्लश जैसे इन तरीकों से मल खेती का बल नहीं बन पाता। इन तरीकों में उड़ाऊपन, फिजूलखर्ची का दोष है। मल की खाद यानी सोनखाद जैसी अपने हाथ की खाद व्यर्थ गंवाना बेवकूफी और दुर्दैव का लक्षण है।

खुले में शौच से जल की गुणवत्ता खत्म हो जाती है और यह पीने के लायक नहीं रहता। इससे बीमारियां होने की भी संभावनाएं ज्यादा होती हैं। जल गुणवत्ता में एक खास पहलू है कि इसमें मल की मौजूदगी नहीं होनी चाहिये, इसलिये जब पेयजल की बैक्टीरियोलॉजिकल जाँच की जाती है तो उसमें सबसे पहला उद्देश्य मल प्रदूषण की उपस्थिति की जाँच करना होता है। एक खास तरह का बैक्टीरिया मानव मल की जल में उपस्थिति के संकेत देता है, जिसे ई-कोलाई कहते हैं।

सेनिटेशन केवल मानवीय स्वास्थ्य के लिये ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक विकास के लिये भी निहायत जरूरी है। बावजूद इसके यहाँ पर पूर्ण स्वच्छता के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं। सरकारी से लेकर, खुले में शौच और साफ-सफाई से संबंधित आदतों तक की, लोगों के मन, वचन और कर्म में गहरे पैठ की हुई आदतों को बदलना इतना आसान नहीं होता है। आदतों में बदलाव तो एक चुनौती है ही पर सरकारों की समझदारी भी सवालों के घेरे में है। सरकारें सबको शौचालय देना चाहती हैं लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अधकचरी समझ से बन रहे शौचालय कहीं भूजल को न प्रदूषित कर दें। इसके अलावा सब्सिडी दे-देकर कब तक शौचालय बनवाये जायेंगे, फिर उनके रख-रखाव के लिये क्या कोई नयी स्कीम लायी जायेगी।

हालांकि खुले में पड़े हुए मल से न केवल भू, जल प्रदूषित होता है, बल्कि कृषि उत्पाद भी इस प्रदूषण से अछूते नहीं रहते हैं। यही मल डायरिया, हैजा, टाईफाईड जैसी घातक बीमारियों के कीटाणुओं को भी फैलाता है। उचित शौचालय न केवल प्रदूषण और इन बीमारियों से बचने के लिये आवश्यक है बल्कि एक साफ सुथरे सामुदायिक पर्यावरण के लिये भी आवश्यक है क्योंकि शौचालय ही वो स्थान है, जहाँ मानव मल का एक ही स्थान पर निपटान संभव है। इससे पर्यावरण साफ सुथरा सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे मानव मल में मौजूद जीवाणु हमारे जल, जंगल, जमीन को प्रदूषित नहीं कर पाते हैं।

जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण और लोगों की भलाई ये सब आपस में जुड़े हुए हैं। प्रदूषित जल का पीना, मल का ठीक से निपटान न करना, व्यक्तिगत और खाद्य पदार्थों के स्वास्थ्य और सफाई की कमी, कचरे का ठीक से प्रबंधन न होना बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है। यहाँ हर साल अनेंकों लोगों को जल जनित बीमारियों का शिकार होना पड़ता है।

दूषित पेयजल से स्वास्थ्य को जो सबसे बड़ा और आम खतरा है वो है मानव और पशु मल और उसमें मौजूद छोटे-छोटे जीवांश का संक्रमण। आमतौर पर जिन्हें ई-कोलाई के नाम से जानते हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों ने भी यह साबित कर दिया है कि खुले में शौच को रोककर और गाँवों को निर्मल बनाकर ही हम न केवल पेयजल के प्रदूषण को कम कर सकते हैं बल्कि इससे गाँव प्रदूषण मुक्त होने के साथ ही साथ डायरिया, हैजा, टाईफाईड और अन्य संक्रामक रोगों से भी मुक्त होंगे। बेहतर स्वच्छता सुविधाएं लोगों के स्वास्थ्य को ही नहीं बल्कि उनके आर्थिक और सामाजिक विकास को भी बेहतर बनाती हैं।

खुले में शौच से मुक्ति के लिये केंद्र सरकार के द्वारा करोड़ों रूपयों की इमदाद प्रदेश के जरिये सिवनी पहुँची है। सिवनी जिले में ग्रामीण अंचलों में बनने वाले शौचालयों में जमकर घोटाला हुआ है। इसकी जाँच भी जिला पंचायत स्तर पर की जा रही थी। इस जाँच का क्या हुआ किसी को नहीं पता। कुल मिलाकर सरकारी पैसों की होली नुमाईंदों ने जमकर खेली है। इस मामले में सांसद और विधायक भी मौन ही साधे रहे।

विडंबना ही कही जायेगी कि सिवनी जिले में किसी भी जनप्रतिनिधि ने अपने संसदीय क्षेत्र या विधानसभा क्षेत्र के एक भी गाँव को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा नहीं उठाया है। यहाँ तक कि सांसद आदर्श ग्राम गोपालगंज के हाल भी खुले में शौच के मामले में बहुत ही खराब हैं। सिवनी शहर में ही झुग्गी बस्तियों में खुले में शौच पर जब नागरिक मजबूर हैं तो दूर दराज के ग्रामीण अंचलों के हालात की कल्पना मात्र ही . . .!

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