जंग की सियासत कितनी कामयाब होगी?

 

 

(अजित द्विवेदी)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई दिन हो गए यह बताए हुए कि उनकी सरकार ने कितने करोड़ शौचालय बनवाए हैं। यह बताए हुए भी बहुत दिन हो गए कि उनके स्वच्छता अभियान से तीन लाख या पता नहीं कितने लोगों का जीवन बच गया है। मुद्रा लोन से कितने लोगों ने रोजगार शुरू किए और उन लोगों ने कितने लोगों को रोजगार दिया यह बताए हुए भी कई दिन हो गए हैं।

हर दिन कितने किलोमीटर सड़कें बन रही हैं, कितने जन धन खाते खुल गए, नीम कोटेड यूरिया से कितने किसानों को फायदा हो रहा है, किसानों की आय दोगुनी करने के लिए कैसे उनकी सरकार ने फसलों की न्यूनतम कीमत डेढ़ गुनी कर दी है, दुनिया से कितना निवेश भारत में आ गया, सवर्ण आरक्षण से कैसे सामाजिक समानता बहाल हो गई जैसी बातें किए हुए भी कई दिन हो गए। हालांकि ऐसा नहीं है कि वे इन दिनों सभाएं, रैलियां या वीडियो कांफ्रेंसिंग से संवाद नहीं कर रहे हैं। ये सारे काम पहले से ज्यादा हो रहे हैं फिर भी पांच साल की कथित उपलब्धियों की चर्चा नदारद है।

अब पिछले दो हफ्ते से देश नहीं झुकने दूंगा, देश नहीं मिटने दूंगा की चर्चा है। पाकिस्तान से हिसाब लेने की हुंकार है। आतंकवादियों को नेस्तनाबूद कर देने के दावे हैं। शहीदों के परिजनों के आंसुओं का हिसाब लेने का संकल्प है। अभिनंदन का अभिनंदन है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35ए की चर्चा है। और हां, इन सबके बीच विपक्ष के नेताओं को भ्रष्ट साबित करने और यहां तक कि विपक्ष के सबसे बड़े नेता को मंदबुद्धि बताने का बहुत भोंडा प्रयास भी है और वह भी सार्वजनिक मंच से!

बहरहाल, अब जंग और आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा है। सवाल है कि इससे सत्तारूढ़ गठबंधन को फायदा होगा या नुकसान हो जाएगा? चुनावी फायदे या नुकसान की भविष्यवाणी अभी नहीं की जा सकती है पर चुनाव के बदलते नैरेटिव, नेताओं के भाषण और लोगों के मूड से हवा का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है। जंग की इस सियासत से सबसे बड़ा और पहला बदलाव तो यह हुआ है कि सत्ता पक्ष ने खुद ही अपने पांच साल के किए कराए पर पानी फेर दिया है। अब पांच साल की उपलब्धियां बताने की बजाय राष्ट्रवाद की लहर और पाकिस्तान व आतंकवादियों के खिलाफ देश के नागरिकों की एकजुटता को वोट में बदलने के प्रयास पर फोकस है। सेना के शौर्य और शहीदों के सर्वाेच्च बलिदान का सियासी फायदा लेने के प्रयास और विपक्ष को पाकिस्तान परस्त साबित करने के प्रयासों पर सत्तापक्ष का फोकस है।

यानी पांच साल के कामकाज से देश के हर नागरिक के अच्छे दिन लाने के दावों की जगह अब आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ जंग पर सियासत होगी। ऐसे में यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पांच साल की उपलब्धियां असल में कागजी थीं, जिन पर चुनाव नहीं लड़ा सकता है। तभी चुनाव से ठीक पहले जंग का नैरेटिव बनाने की सियासत हो रही है। यह नहीं कहा जा सकता है कि पुलवामा से लेकर बालकोट और अभिनंदन मामले तक जो कुछ भी हुआ है वह किसी लिखित पटकथा का हिस्सा है पर इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा और उसके नेता बहुत व्यवस्थित तरीके से फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं।

पर सवाल है कि पांच साल तक लोगों ने जो महसूस किया है उसे क्या पाकिस्तान और आतंकवाद के नैरेटिव से बदला जा सकता है? यह मुश्किल है। युद्ध अंततः शहरी मध्य वर्ग को उद्वेलित करने का माध्यम है। टेलीविजन चौनलों और नेताओं के भाषण से फैलाए जा रहे युद्धोन्माद का असर सिर्फ शहरी मध्य वर्ग के ड्राइंगरूम तक सीमित होता है। जिन लाखों परिवारों के लोग सेना में या अर्धसैनिक बलों में हैं वे गांव में रहने वाले किसान या गरीब पृष्ठभूमि के लोग हैं, जो निश्चित रूप से युद्ध नहीं चाहते हैं। जिन परिवारों का कोई भी व्यक्ति सेना या अर्धसैनिक बल में नहीं है, युद्ध की चाहना सिर्फ उन्हीं की होती है। सो, युद्ध का नैरेटिव देश के बहुत बड़े वर्ग को कतई प्रभावित नहीं करता है।

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के रणनीतिकार हो सकता है कि इस बात को समझ रहे हैं पर चुनाव से पहले उनकी पहली प्राथमिकता अपना शहरी मध्य वर्ग हो, जिसको पिछले कुछ समय से नाराज बताया जा रहा था। तभी सामान्य वर्ग के आरक्षण से लेकर, आय कर की सीमा बढ़ाने, वेतनभोगियों व पेंशनभोगियों के लिए डीए बढ़ाने, ईपीएफ पर ब्याज दर बढ़ाने से लेकर जंग का नैरेटिव बनाने तक सब कुछ उस वर्ग को पटाने के लिए किया गया हो सकता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि देश में शहरी मध्य वर्ग बहुत बड़ा हो गया है। जो मोटे तौर पर भाजपा का ही वोटर रहा है। इसका वोट भाजपा ने सुनिश्चित किया है। पर 90 करोड़ मतदाताओं के देश में शहरी मध्य वर्ग का वोट जीत की गारंटी नहीं हो सकता है।

देश के गांवों में, किसानों में अब भी आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और पाकिस्तान से युद्ध लड़ने का नैरेटिव बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं हो सकता है। उलटे इससे यह धारणा मजबूत होगी कि सरकार ने पांच साल कुछ किया नहीं है और अब चुनाव से पहले जंग लड़ने की बातें होने लगी हैं। आखिर आकांक्षा और उम्मीदों की राजनीति ने 2014 के चुनाव में मोदी को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया था, जो अब हाशिए में चली गई है। दूसरे, जंग के नैरेटिव से जाति की पकड़ भी नहीं टूटने वाली है, जो भारत में वोट डालने का सबसे बड़ा आधार है, जो जंग की सियासत से प्रभावित नहीं हो सकती है। हां, इसकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इसने विपक्षी पार्टियों को बैकफुट पर ला दिया है। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि वे कैसे इसका मुकाबला करें। इस पूरी राजनीति से भाजपा को इतनी ही बढ़त हासिल हुई है।

(साई फीचर्स)

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