परंपरागत उल्लास व शालीनता से मनायें होली का त्यौहार

 

 

(संजीव प्रताप सिंह)

सिवनी (साई)। होली, भारतीय संस्कृति का एक महान पर्व है। होली सामाजिक समरसता, भाईचारे, प्रेम व एकता का संदेश देने वाला पर्व है। कहा जाता है कि होली के अवसर पर लोग अपनी पुरानी से पुरानी शत्रुता को भी समाप्त कर होली का आनंद उठाते हैं। होली कई प्रकार से आनंद दायक पर्व है। होली लगभग पूरे भारत में तो मनायी जाती है साथ ही विदेशों में बसे भारतीय भी अपने पारंपरिक रीति रिवाजों के साथ होली का आनंद उठाते हैं।

होली वसंत ऋतु के फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व है। यह पर्व वसंत का संदेश वाहक है। इस पर्व के प्रमुख अंग हैं राग और संगीत। होली पर्व एक प्रकार से वसंत पंचमी से प्रारंभ हो जाता है और शीतला आष्टमी के साथ संपन्न होता है। वसंत ऋतु आते ही सामाजिक वातावरण होलीमय होने लग जाता है। चंँकि राग और संगीत होली के प्रमुख अंग हैं अतः इस समय प्रकृति भी रंग बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था में होती है। होली पर्व के उमंग पर स्त्री हो या फिर पुरूष या फिर बच्चे सभी पर होली का कुछ अलग ही प्रकार का खुमार चढ़ जाता है। अति प्राचीन भारतीय परंपरा में होली को काम महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। वसंत ऋतु व होली के चलते कामुकता चरम पर होती है लेकिन आज के युग में इसमें अश्लीलता व फूहड़पन भी आ गया है। लोग होली की इस पावन उमंग को गलत नजरिये से भी देखने लग गये हैं।

प्राचीन काल में होली का पर्व होलिका या होलाका के नाम से भी मनाया जाता था। होली का पर्व विभिन्न तरीकों से मनाने की प्रथा का उल्लेख विभिन्न साहित्यों में भी मिलता है। इस पर्व का वर्णन जिन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है वे हैं जैमिनी के पूर्व मीमांसा सूत्र और गाह्य सूत्र में। नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्त लिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। संस्कृत साहित्य में वसंत ऋतु और वसंतोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। महान कवि कालिदास की रचनाओं में पर्व का व्यापक उल्लेख मिलता है। कालिदास रचित ऋतु संहार में तो पूरा एक सर्ग वसंतोत्सव को अर्पित है। भारति, माघ और कई अन्य संस्कृत कवियों ने भी वसंत ऋतु की खूब चर्चा की है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्ति कालीन कवि सूर, रहीम, रसखान, पदमाकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीति कालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। वास्तव में होली अबीर, गुलाल और गीले रंगों सहित पिचकारी का पर्व तो है ही यह पर्व गीत – संगीत, कविता, हंसी, मजाक का भी पर्व हैं। होली पर देवर – भाभी, जीजा – साली जैसे पवित्र रिश्तों का प्रेम व मजाक भी अपनी चरम सीमा पर होता है तथा सभी नाते रिश्ते होली की उमंग में बुरा न मानो होली है के नारे के बीच मस्ती की चरम सीमा को प्राप्त करने का अनुभूत प्रयास करते हैं।

होली पर्व का उल्लेख अनेकानेक विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा वृतांत में भी किया है। मुगल काल में भी यह पर्व बहुत ही उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता था। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदु ही नहीं मुस्लिम समाज के लोग भी मनाते थे। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के चित्र में जहाँगीर को होली खेलते दिखाया गया है।

शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का अंदाज ही बदल गया था। शाहजहाँ के समय में होली को इंद्र ए गुलाबी या आब ए पाशी कहा जाता थ। मध्य युगीन हिन्दी साहित्य में भी दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर होली के चित्र मिलते हैं। विजय नगर की राजधानी हंपी के 16वीं शताब्दी के एक चित्र फलक पर होली का आनंद दायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमार और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दंपति को होली के रंग में रंगते दिखाया गया है। 16वीं शताब्दी की अहमद नगर की एकचित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है।

16वीं शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ होली खेलते चित्रित किया गया है जिसमें राजा कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगनाएं मनोहारी नृत्य कर रहीं हैं और इन सबके बीच रंग का एक कुण्ड है। बूंदी से प्राप्त एक लघु चित्र में राजा को हाथी दांत के सिंहासन पर बैठा दिखया गया है जिसके गालों पर महिलाएं गुलाल लगा रहीं हैं।

होली के पर्व को लेकर कई तरह की कहानियां भी प्रचलित हैं जिसमें हिरण्य कश्यप और प्रहलाद की कहानी सर्वाधिक प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि अति प्राचीन समय में हिरण्य कश्यप नामक एक राक्षसराज का राज था। वह बहुत ही अभिमानी तथा ईश्वर के प्रति बेहद घृणा का भाव रखता था। अहंकार के चलते उसने अपने राज्य में ईश्वर भक्ति पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी जिसके चलते वह ईश्वर भक्तों पर अत्याचार करता था।

जनमानस उससे पूरी तरह से त्रस्त था लेकिन स्वयं उसका पुत्र प्रहलाद परम ईश्वर भक्त निकला जिसके कारण हिरण्य कश्यप ने प्रहलाद को कठोर यातनाएं भी दीं, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। अंत में हर प्रकार से पराजित व लज्जित होकर हिरण्य कश्यप ने उसे मृत्यु दण्ड देने का कठोर फैसला ले लिया। उसकी एक बहिन थी जिसका नाम होलिका था, उसे कुछ आशीर्वाद प्राप्त था जिसके चलते उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठ जाये। होलिका ने बिलकुल वैसा ही किया। वह प्रहलाद को लेकर अग्नि कुण्ड में बैठ तो गयी लेकिन प्रहलाद को तो कुछ नहीं हुआ, वह पूरी तरह से जलकर समाप्त हो गयी। मान्यता है कि इसी घटना के चलते होली पर्व का प्रारंभ हुआ। एक प्रकार से यह पर्व यह बात भी याद दिलाता है कि ईश्वर उसी का साथ देता है जो सत्य व ईश्वभक्ति में पूरी तरह से तल्लीन रहता है। होलिका का दहन समाज व मनुष्यगत बुराईयों के दहन का भी प्रतीक है।

आधुनिक रंग में होली बदरंग भी हो गयी है। एक प्रकार से कलियुग की होली में लोग बदले की भावना से भी होली खेलने लग गये हैं। कुछ असामाजिक तत्व अपनी पुरानी शत्रुता निपटाने का भी प्रयास करते हैं। शराब पीकर हुड़दंग करना ही लोगों का पर्व हो गया है। कुछ लोग इस अवसर पर मिलावटी सामानों की बिक्री कर अधिक फायदा उठाने का कुत्सित प्रयास भी कर रहे हैं। इससे हम लोगों को बचना चाहिये। होली प्रेम का त्यौहार है बदले की भावना का नहीं।