किराये की साईकिल . .

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प के आने के बाद लोग इसे मनोरंजन एवं जानकारियों का मंच मानने लगे हैं। इस मंच पर लोगों के द्वारा गुदगुदाने वाली भूली बिसरी यादें भी पोस्ट कर दी जाती हैं, जिससे लोग अतीत में जाने पर विवश हो जाते हैं।

इसी तरह की एक पोस्ट किराये की साईकिल शीर्षक से पोस्ट की गयी है। इस पोस्ट को पचास की उमर में पहुँच चुके या उससे अधिक आयु के पाठकों के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है।

पहले हम लोग गर्मियों में किराये की छोटी साईकिल लेते थे, अधिकांश लाल रंग की होती थीं, जिसमें पीछे कैरियर नहीं होता था, जिससे आप किसी को डबल न बैठाकर घूमें। एक साईकिल वाले ने तो पिछले मड गार्ड पर धारदार नुकीले कीले तक लगवा दिये थे। किराया शायद 50 पैसे प्रति घण्टा होता था। किराया पहले लगता था और दुकानदार नाम पता नोट कर लेता था।

किराये के नियम कड़े होते थे.. जैसे कोई हवाई जहाज लेना हो। पंचर होने पर सुधारने के पैसे, टूट-फूट होने पर, आपकी जिम्मेदारी। खैर! हम खटारा छोटी-सी किराये की साईकिल पर सवार उन गलियों के युवराज होते थे, पूरी ताकत से पैडल मारते, कभी हाथ छोड़कर चलाते ओर बैलेंस करते, तो कभी गिरकर उठते और फिर चल देते..!

अपनी गली में आकर सारे दोस्त, बारी – बारी से, साईकिल चलाने माँगते। किराये की टाईम की लिमिट न निकल जाये, इसलिये तीन – चार बार साईकिल लेकर दूकान के सामने से निकलते।

तब किराये पर साईकिल लेना ही अपनी रईसी होती! खुद की अपनी छोटी साईकिल रखने वाले तब रईसी झाड़ते। वैसे हमारे घरों में बड़ी काली साईकिलें ही होती थीं, जिसे स्टैण्ड से उतारने और लगाने में पसीने छूट जाते, जिसे हाथ में लेकर दौड़ते, तो एक पैडल पर पैर जमाकर बैलेंस करते।

ऐसा करके फिर कैंची चलाना सीखे। बाद में डण्डे को पार करने का कीर्तिमान बनाया, इसके बाद सीट तक पहुँचने का सफर एक नयी ऊँचाई था। फिर सिंगल, डबल, हाथ छोड़कर, कैरियर पर बैठकर साईकिल के खेल किये। खैर, जिंदगी की साईकिल अभी भी चल रही है। बस वो दौर वो आनंद नहीं है..!

कोई माने न माने पर वर्तमान से कहीं अच्छा वो खूबसूरत बचपन ही हुआ करता था साहब.. जिसमें दुश्मनी का स्थान सिर्फ एक कट्टी हुआ करती थी और सिर्फ दो उंगलियां जुड़ने से दोस्ती फिर आरंभ हो जाया करती थी ..! अंततः बचपन एक बार निकल जाने पर सिर्फ यादें ही शेष रह जाती हैं और रह-रह कर याद आकर सताती है।

आजकल पेड़ पर लटके हुए आम भी अपने आप ही गिरने लगे हैं, आज बच्चों में वह शरारतें कहाँ कि चुपके-से आम चुरा लें…! सुना है आज के बच्चों का बचपन तो एक मोबाईल ने ही चुरा लिया है…!

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