बहिष्कार करना है तो पहले पटकिए अपना चीनी मोबाइल

 

 

 

(सुधीर मिश्र)

अहमद कमाल परवाजी का शेर है-

इस क़दर आप के बदले हुए तेवर हैं कि मैं

अपनी ही चीज़ उठाते हुए डर जाता हूँ

शायर की शायर जाने। यहां इंटरनैशनल मसलों से घर में झगड़े की नौबत है। पाकिस्तान में बैठे मौलाना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किया जाना था। संयुक्त राष्ट्र में चीन वालों ने टांग फंसा दी। अब हमारी एक भाभी जी बड़े गुस्से में हैं। बच्चों से बोलीं कि घर के कबाड़ में पुरानी पीतल की पिचकारी पड़ी है। इस बार होली उसी से खेलो। हम चीनी पिचकारी का बहिष्कार करेंगे। चौराहों पर उनकी होली जलाएंगे। मारे घबराहट के मैंने तुरंत अपने चीनी मोबाइल फोन को जेब में डाल लिया। तब तक एक शरारती भतीजा भाभीजी की अलमारी से बाम की शीशी ले आया और बोला-चाची पहले इसको तोड़ो, इसमें पड़ने वाला यूकेलिप्टस का तेल चीन से ही आता है। तब से महाभारत मची है घर में और अपन बाम पर बाम मल रहे हैं माथे पर।

बचपन में पढ़ते थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। आजकल यह भावना प्रधान देश में तब्दील हो चुका है। भावनाओं का माइट्रोकान्ड्रिया सोशल मीडिया है। जरा सा हुसका दीजिए फेसबुक-ट्विटर पर, फिर देखिए मजा। ताजा मसला मौलाना मसूद अजहर का है। बड़े-बड़े कारोबारी चीन और चीनी माल के बहिष्कार की बातें कर रहे हैं। होली के बाजार में आए चीनी सामान को इस्तेमाल न करने के लिए ललकारा जा रहा है। लोग भावुक हो रहे हैं। कुछ समझ नहीं रहे। चलिए पिचकारियां, अबीर-गुलाल और दूसरे चीनी आइटमों के बाजार की तो आप वाट लगा देंगे। उन बुलेटप्रूफ जैकेटों का क्या करेंगे जिनकी पहली खेप बहुत जल्द सेना को मिलने वाली है। इन जैकेटों में चालीस फीसदी कच्चा माल चीन से आयातित है। बच्चे चीनी पिचकारियों से नहीं खेलेंगे। फिर सैनिक कैसे उन बुलेटप्रूफ जैकेटों को पहनेंगे। सैनिकों को छोड़िए। अपन लोग मोबाइल फोन, लैपटॉप का क्या करेंगे। फेक देंगे क्या? ज्यादातर तो चीन के हैं। भारत छोड़िए, लंदन, पेरिस और न्यू यॉर्क। हर जगह बाजार चीनी माल से भरा पड़ा है।

खैर भावुक लोग हैं। समझने में वक्त लगेगा कि सरकार चीन के साथ व्यापार करे और जनता बहिष्कार, यह मुश्किल है। दुनिया की बाइस फीसदी आबादी चीन के पास है, 18 प्रतिशत भारत में। यानी दुनिया का चालीस फीसदी बाजार इन दोनों देशों के पास है। चूंकि पड़ोसी हैं तो एक-दूसरे पर निर्भरता भी है। समझने वाली बात यह है कि कौन किस पर ज्यादा निर्भर है। हमारी फैक्ट्रियों और बाजारों में खपने वाला ज्यादातर कच्चा माल चीन से आता है।

सिर्फ इतना ही नहीं, देसी कारोबारी अब अपना माल बनवाने के लिए चीन जा रहे हैं। उनकी औद्योगिक नीतियां ऐसी हैं कि भारत के बजाए वहां अपना माल बनवाना सस्ता पड़ता है। यहां हाल यह है कि हमारे गांव कस्बों की लोक कलाएं, संस्कृति और मेले चीनी माल से पटे पड़े हैं। हमारे कुटीर उद्योग दम तोड़ रहे हैं। सोचने वाली बात है कि अपने पारम्परिक बाजारों को कैसे बचाएं। चीन के सस्ते माल से वह मुकाबला ही नहीं कर पा रहे। हमारे पास भी चीन की तरह अपार मानव संसाधन है।

लेकिन उसका सही इस्तेमाल करने वाली नीतियां नहीं हैं। दिवाली पूजा के गणेश-लक्ष्मी तक चीन बनाकर भेज रहा है। सोचिए हमारे मूर्तिकारों और कुम्हारों का क्या हाल हो रहा है। तो पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकी मसूद से नाराज मेरे जज्बाती भाइयों, बहनों और भाभियों। पिचकारियों के बहिष्कार से कुछ नहीं होगा। चीन से निपटना है तो दूर की सोचिए, फिलहाल वो करिए जो सरकार को मंजूर है। भावुक अपन भी हैं आप की तरह पर क्या करें, खयाल इफ्तिखार रागिब के इस शेर की तरह हैं-

जी चाहता है जीना जज़्बात के मुताबिक़!

हालात कर रहे हैं हालात के मुताबिक़!!

(साई फीचर्स)

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