चुनाव- नाच न जाने, आंगन टेढ़ा

 

 

(बलबीर पुंज)

जैसे ही 10 मार्च को मुख्य निर्वाचन आयोग द्वारा 17वें लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा हुई, उसके बाद दो घटनाक्रम सामने आए। पहला- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दलों का तथाकथित महागठबंधन का बिखरना। दूसरा- लंबी चुनावी प्रक्रिया और रमजान में मतदान होने पर आपत्ति जताना। भगवान का शुक्र है कि फिलहाल किसी भी विपक्षी दल ने ईवीएम पर प्रश्न नहीं उठाया है। ऐसा प्रतीत भी होता है कि सात चरणों में होने वाले आम चुनाव में मतदान या फिर 23 मई को परिणाम अपने विरुद्ध आने की संभावना तक शायद ही कोई ईवीएम को लांछित करें।

पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था और जिसे उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेकों बार दोहराया भी कि देश का संविधान भारत की नवीनतम स्मृति है और उससे जनित चुनाव- उसके पर्व। यदि कोई उन पर्वों की पवित्रता और प्रमाणिकता को क्षति पहुंचाता है या उसके महत्व को कम करने का प्रयास करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से भारत की बहुलतावादी और लोकतांत्रिक छवि को कमजोर करने का काम करता है। इस पृष्ठभूमि में वर्तमान समय में क्या हो रहा है?

रमजान के समय लोकसभा चुनाव होने से मुस्लिम समाज- विशेषकर कुछ मौलाना और स्वघोषित इस्लामी बुद्धिजीवियों का एक वर्ग नाराज हैं। लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिघ्रंगी महली के अनुसार, 5 मई को रमजान का चांद देखा जाएगा। यदि चांद दिख जाता है, तो 6 मई से रोजे शुरू होंगे और करोड़ों रोजेदारों को 6 मई (पांचवा चरण), 12 मई (छठा चरण) और 19 मई (सातवां चरण) को मतदान के समय परेशानी होगी। मौलाना कल्बे रुशैद रिज़वी कहते हैं, लोकतंत्र में भी अगर मज़हबी आज़ादी नहीं होगी तो कहां होगी? इसी तरह दर्जनों इस्लामी बुद्धिजीवियों और मौलानाओं ने रमजान के समय चुनाव कराएं जाने पर आपत्ति दर्ज करते हुए कार्यक्रम में बदलाव की मांग की है, जिसे चुनाव आयोग ने सिरे से निरस्त भी कर दिया है।

इन्हीं उपरोक्त आपत्तियों को लपकते हुए तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी सहित अन्य स्वघोषित सेकुलरिस्ट दलों के नेताओं ने निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। सपा नेता आज़म खां कहते हैं, अगर दूसरे विचारधारा या धर्म के त्योहारों का ध्यान रखा जा सकता है, तो रमजान का भी ध्यान रखना चाहिए था। 1947 के बाद हम अपनी मर्जी से भारत में रुके। हिंदू भाई पाकिस्तान नहीं जा सकते थे, हम जा सकते थे, फिर भी हम यहीं रुके। आज जैसा माहौल है, उसमें अब मुसलमान खुद को देश में किराएदार मानने लगा है।

क्या इस प्रकार की आपत्तियां तर्कसंगत है? क्या इस लोकसभा चुनाव के बीच हिंदुओं और सिखों के त्यौहार नहीं आएंगे? 11 अप्रैल-19 मई के बीच सात चरणों में 17वें लोकसभा का चुनाव होना है और 23 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। मार्च में चुनावी तैयारियों के बीच पहले होली का पर्व आएगा। 6-14 अप्रैल के बीच चौत्र नवरात्र आएंगे, जिसमें करोड़ों हिंदू उपवास (निर्जल व्रत सहित) रखेंगे। इसके अतिरिक्त 14 अप्रैल को जहां पंजाब सहित देशभर में सिख बैसाखी का पर्व मनाएंगे, तो उसी दिन करोड़ों लोग हिंदू नववर्ष का स्वागत करेंगे। इस पर्व को केरलवासी जहां विशु के रूप में मनाएंगे, तो असम में बिहू, ओडिशा में महाविष्णु संक्रांति, प.बंगाल में पाहेला बैशाख, तमिलनाडु में पुथुंडू और बिहार में जुरसीतल का पर्व हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। ईसाई समुदाय का महत्वपूर्ण पर्व गुड फ्राइडे भी चुनाव के समय ही पड़ेगा। मई में नागालैंड का आओ समुदाय पारंपरिक मोआत्सु उत्सव मनाएगा, तो 13 मई को केरल के मंदिरों में पूरम और 18 मई को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाएगी।

क्षेत्रफल और विविधता के संदर्भ में भारत एक विशाल देश है, जहां 365 दिन में कोई न कोई उत्सव, पर्व और परंपरा का निर्वाहन किया जाता है। यदि रमजान पर चुनाव टालने की मांग को आधार बनाया भी जाएं, तो फिर उस पृष्ठभूमि में पर्वों के देश भारत में एक भी चुनाव कराना असंभव है। आश्चर्य हुआ कि इस मामले में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कहा, हम रमजान में चुनाव का स्वागत करते हैं। मुसलमान रमजान में रोजे पर भी रहेंगे और मतदान करने भी जाएंगे। इस परिप्रेक्ष्य में उस घटना को भी स्मरण करना आवश्यक है, जब स्वतंत्रता से पहले 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्नाह ने डायरेक्ट एक्शन डे (सीधी कार्रवाई) का एलान किया था, जिसमें दो पक्षों से हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था- तब रमजान का 18वां दिन था। इसी तरह, 22 जून 2017 को रमजान के आखिरी दिनों में श्रीनगर की एक मस्जिद के बाहर जम्मू-कश्मीर पुलिस अधिकारी मोहम्मद आयूब पंडित की मजहबी भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

क्या यह सत्य नहीं कि जिस विषाक्त मानसिकता ने दशकों पहले भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम अलगाववाद की नींव तैयार की थी, जिसके परिणामस्वरूप 1947 में देश का विभाजन भी हुआ था- उसी चिंतन से ग्रस्त भारतीय मुस्लिम समाज का एक वर्ग रमजान पर आम चुनाव कराए जाने का विरोध कर रहा है? यह विडंबना ही है कि जिस प्रकार स्वतंत्रता से पहले तत्कालीन राजनीतिक अधिष्ठान ने इस्लामी कट्टरपंथियों के अलग राष्ट्र की मांग के समक्ष समर्पण कर दिया था, ठीक उसी तरह वर्तमान समय में भी स्वयंभू सेकुलरिस्ट और स्वघोषित उदारवादी रमजान पर आम चुनाव टालने की मांग का प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन कर रहे है।

उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में सात चरणों में चुनाव कराए जाने पर आरोप लगाया जा रहा है कि सत्तारुढ़ भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए चुनाव को लंबा खींचा गया है। प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया जानबूझकर लंबी खींची जा रही है, ताकि एक और स्ट्राइक करा सके। क्या देश में कई चरणों में आम चुनाव पहली बार हो रहा है? क्या यह सत्य नहीं कि पिछला लोकसभा चुनाव 9 चरणों में संपन्न हुआ था और बिहार-उत्तरप्रदेश में छह, तो प.बंगाल में पांच चरणों में चुनाव कराए गए थे? अब जो विपक्षी दल लंबे चुनावी कार्यक्रम का रोना रो रहे है- क्या प्रचार के लिए उन्हे उतना ही समय नहीं मिलेगा, जितना भाजपा को मिलने का आरोप लगाया जा रहा है?

वास्तव में, इस कुत्सित परिदृश्य के गर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैचारिक, राजनीतिक और वैचारिक विरोध है, जिसमें संवैधानिक और न्यायिक संस्थाओं के साथ सेना को भी कलंकित करने से नहीं चूका जा रहा है। मई 2014 के बाद देश में जितने भी चुनाव हुए है, उसमें मोदी और भाजपा विरोधी दल एक विकृत विमर्श स्थापित करने का प्रयास कर रहे है- जिसके अनुसार, भाजपा की विजय लोकतंत्र की हत्या और किसी भी विरोधी दल की जीत स्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक है। पिछले पांच वर्षों में जिस किसी भी प्रदेश में विधानसभा या नगर निकाय चुनाव हुए और उसके नतीजे भाजपा के पक्ष आएं है, तो विपक्ष और उनके समर्थित बुद्धिजीवियों ने ईवीएम को हैक बताकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को धूमिल करते हुए देश में लोकतंत्र को खतरा बता दिया। यदि नतीजे विरोधियों के हक में आएं, तो उसे देश में संविधान और लोकतंत्र की जीत के रूप में प्रस्तुत कर दिया। क्या यह दोगलेपन की पराकाष्ठा नहीं?

इसी विकृत पृष्ठभूमि में मोदी विरोध के नाम पर जिस प्रकार कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल एक मंच पर खड़े होकर महागठबंधन की एकता का नारा बुलंद कर रहे थे, वह भी आम चुनाव की घोषणा के 100 घंटे के भीतर हवा में उड़ गया। जहां बहुजन समाज पार्टी ने उत्तरप्रदेश सहित किसी भी प्रदेश में कांग्रेस से समझौते की संभावना को खारिज कर दिया है, वही तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की सभी लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने परोक्ष शब्दों में कांग्रेस को उसकी राजनीतिक हैसियत दिखा दी है, वही दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी से तालमेल बिठाने की सभी संभावनाओं को स्वयं कांग्रेस ने निरस्त कर दिया है।

वास्तविकता तो यह है कि 17वें लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल (भाजपा विरोधी क्षत्रप सहित) तीन मुख्य मोर्चे पर तैयारी कर रहे है। पहला- भाजपा और नरेंद्र मोदी को पुनः सत्ता में आने से रोका जाएं। दूसरा- जिन प्रदेशों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है, वहां भी क्षत्रप अपने उम्मीदवार खड़े करने का मन बना चुके है। और तीसरा- प्रतिकूल परिणाम आने पर पराजय के सभी कारणों (जैसे ईवीएम, रमजान में चुनाव और लंबी चुनावी प्रक्रिया) की नींव को पहले से मजबूत कर दिया जाएं।

(साई फीचर्स)

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