अथ श्री साईकिल कथा

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। सोशल मीडिया पर इन दिनों साईकिल को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा चल रही है जो अधेड़ हो रही पीढ़ी के लिए उनके बचपन के दिनों को गुदगुदाती दिख रही है। पेश है अथ श्री साईकिल कथा :

यह वह दौर था जब टीवी चैनल्स के मामले में बस डीडी नेशनल और डीडी न्यूज़ हुआ करते थे। धारावाहिक के नाम पर रामायण, महाभारत, श्री कृष्णा और शक्तिमान हुआ करता था। यह दौर था हमारे साईकिल सीखने का और हमारे जमाने में साईकिल दो चरणों में सीखी जाती थी पहला चरण कैंची और दूसरा चरण गद्दी…….

तब साईकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साईकिल बस बाबा या ताऊ चलाया करते थे। तब साईकिल की ऊंचाई अड़तालीस इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साईकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।

कैंची वो कला होती थी जहां हम साईकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे। और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और क्लींङ – क्लींङ करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की छोरा साईकिल दौड़ा रहा है।

आज की पीढ़ी इस एडवेंचर से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में अड़तालीस इंच की साईकिल चलाना जहाज उड़ाने जैसा होता था। हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तुड़वाए हैं और गज़ब की बात ये है कि तब दर्द भी नहीं होता था, गिरने के बाद चारांे तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।

अब तकनीक ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पाँच साल के होते ही बच्चे साईकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो-दो फीट की साईकिल इजाद कर ली गयी है और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में।

मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साईकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! जिम्मेदारियों की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं।

इधर से चक्की तक साईकिल ढुगराते (लुढ़काते) हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए! और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।

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