1977 में इंदिरा गांधी के दिमाग में कुछ और ही था

 

 

मैंने 1977 में इलाहाबाद के फूलपुर में श्रीमती इंदिरा गांधी का चुनाव प्रचार कवर किया था। प्रधानमंत्री जनसभा को संबोधित करने के लिए हेलीकॉप्टर से पहुंची थीं, जहां 1974 के विधानसभा चुनाव में उनके द्वारा संबोधित सभा की तुलना में काफी कम लोग मौजूद थे। इलाहाबाद से 40 किलोमीटर दूर तक से भीड़ लाने के लिए गाड़ियों का इंतजाम भी उन्होंने किया था, लेकिन बैरिकेड से बनाए गए स्थान खाली थे और 15 मीटर की ऊंचाई पर बने मंच से लगाए जा रहे नारों का जवाब भी बड़ी कमजोर आवाज में दिया जा रहा था।

श्रीमती गांधी के 15 मिनट लंबे भाषण में निजी बातों का जिक्र बार-बार किया गया। उन्होंने कहा कि हमारे परिवार के लोगों के बलिदान का एक लंबा इतिहास रहा है। मेरे दादा ने स्वराज भवन नाम का एक मकान बनाया, जिसे मेरे पिता ने देश को दान कर दिया। फिर हमने एक और मकान बनाया, आनंद भवन, जिसे मैंने जनता को समर्पित कर दिया। हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। हम देश की सेवा करना चाहते हैं, लेकिन कुछ लोग हमारे खिलाफ हैं। भविष्य में मेरा परिवार देश की सेवा करता रहेगा। उन्होंने अपने निजी संबंधों का जिक्र किया। कहा कि संसद में उन लोगों को भेजिए जो मेरा समर्थन करें, उन्हें नहीं जो मेरी पीठ में छुरा घोंपें।

श्रीमती गांधी का भाषण खत्म हो जाने के बाद उनके हेलीकॉप्टर के उड़ने तक लोग वहीं रहे। हेलीकॉप्टर को लेकर गजब आकर्षण था। श्रीमती गांधी की की तुलना में जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं की सभा में कहीं ज्यादा भीड़ जुटती थी। लोग आधी रात के बाद भी उन्हें सुनने का इंतजार करते थे।

जनता पार्टी ने कम से कम यूपी, बिहार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में जितने भी उम्मीदवार खड़े किए थे, उन्हें लगभग निर्वाचित मान लिया गया था। मजाक में कहा जाता था कि बिजली के खंभे को जनता पार्टी का टिकट मिल जाए तो वह भी जीत जाएगा। किसी उम्मीदवार की प्रतिभा या लोकप्रियता मायने नहीं रखती थी, मायने यह रखता था कि वह जनता पार्टी का नुमाइंदा है या नहीं।

जनता पार्टी की लहर तेज हो रही थी। सरकार के नेताओं द्वारा बार-बार यह स्वीकार किए जाने का भी लोगों पर कोई असर नहीं हुआ कि गलतियां हुई हैं। ऐसा लगा जैसे चुनाव के ऐलान से पहले ही उन्होंने तय कर लिया था कि वोट देकर किसे सत्ता में लाना है। विपक्षी नेताओं ने यह बताकर कि इमरजेंसी के दौरान जेल में उनके साथ क्या-क्या हुआ, लोगों के गुस्से को भड़काया। हर दिन जबरन नसबंदी, झुग्गियां हटाने और यातना के किस्से सामने आने लगे। अखबार, जो इमरजेंसी के समय काफी हद तक सरकार के समर्थन में आ गए थे, उनमें अब इमरजेंसी की खौफनाक बातों को सामने लाने की होड़ मच गई थी। लोग यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि डरावने दिन फिर न लौट सकें। बेशक कांग्रेस के लिए चीजें अच्छी नहीं दिख रही थीं।

मुख्यमंत्रियों को यह संदेश भिजवाया गया कि वे लोगों का मन जीतने के लिए रियायतों का ऐलान करें। मुख्यमंत्री भी खजाना खाली करने को तैयार थे। राज्यों ने विभिन्न रूपों में 250 करोड़ रुपये बांटे। भूराजस्व और कृषि पर आयकर को कम किया गया। सिंचाई शुल्क और बिजली की दरों में कटौती की गई। मकान के किराये में छूट, अतिरिक्त महंगाई भत्ता, किराया और चिकित्सा सुविधाएं दी गईं। लेकिन इनका कोई असर नहीं पड़ा। इंटेलिजेंस रिपोर्ट में बताया गया कि विपक्ष के पास सबसे अच्छा मुद्दा इमरजेंसी के बारे में बातें करने का था। कुल मिलाकर चुनाव प्रचार बिना किसी घटना के चल रहा था।

श्रीमती गांधी 18 मार्च को नई दिल्ली लौट आईं, तब तक ज्यादातर वोटिंग हो चुकी थी। संकेत अशुभ थे। उनके घर पर दो बैठकें हुईं। एक 18 को और दूसरी 19 को। संजय, धवन, बंसीलाल और ओम मेहता उनमें मौजूद थे। वरिष्ठ अधिकारियों में गृह सचिव और दिल्ली पुलिस के महानिरीक्षक शामिल थे। उनसे कहा गया कि पीएम के घर की सुरक्षा हर कीमत पर की जानी चाहिए। महानिरीक्षक ने इसके लिए स्थानीय पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाई। एक डीआईजी ने पूछा कि किसी भी कीमत का क्या मतलब? आईजी ने कहा कि इसका मतलब है कि जरूरत महसूस होने पर लोगों को गोली भी मार दी जाए। यह अफवाह जोरों पर थी कि अगर जनादेश श्रीमती गांधी के खिलाफ गया तो वे मार्शल लॉ लगा देंगी। श्रीमती गांधी इस बात को लेकर चिंतित नहीं थी कि नतीजों के ऐलान के बाद कोई गड़बड़ी हो जाएगी या कांग्रेस पार्टी हारी तो लोग उनके घर के बाहर प्रदर्शन करेंगे।

उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। वह सोच रही थीं कि 543 सदस्यों वाले सदन में अगर उन्हें 200 से 220 सीट मिल जाएंगी तो बाकी वह खरीद लेंगी। वह सोच रही थीं कि उनके लिए कार्यकारी राष्ट्रपति वीडी जत्ती की मदद से सरकार बनाना संभव होगा क्योंकि वे खुलेआम उनके राजनीतिक कर्ज के लिए आभार जता चुके थे। वह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और अगर सरकार बनाने की उनकी योजना का विरोध हुआ तो बल प्रयोग अनिवार्य हो सकता था। उनकी योजनाएं चाहे जो भी रही हों, पर वे सब धरी की धरी रह गईं, जब उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने उन्हें रायबरेली संसदीय सीट पर हरा दिया, जो पिछले सारे चुनावों में उनका गढ़ रही थी। श्रीमती गांधी सोच भी नहीं सकती थीं कि वह हार जाएंगी। रायबरेली के रिटर्निंग ऑफिसर विनोद मेहरोत्रा पर काफी दबाव बनाया गया। ओम मेहता ने दो बार और धवन ने तीन बार दिल्ली से फोन कर आदेश दिया कि दोबारा चुनाव हों या कम से कम दोबारा गिनती हो, क्योंकि श्रीमती गांधी चाहती थीं कि उनकी हार की घोषणा जितनी देर से संभव हो, की जाए। शायद वह सोच रही थीं कि अगर कांग्रेस पर्याप्त सीटें जीत जाएगी तो वह उपचुनाव के जरिए वापसी कर लेंगी। (स्वर्गीय नैयर की पुस्तक- इमरजेंसी रीटोल्ड से साभार)

(साई फीचर्स)

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