समझो! चुनना है सांसद न कि मोदी, राहुल या मायावती

 

 

(हरि शंकर व्यास)

पहली बार वोट डालने वाले नौजवानों को इस चुनाव में साबित करना है कि वे साक्षर, पढ़े-लिखे हैं न कि मूर्ख। तभी इन्हें पता होना चाहिए कि वोट का पहला मतलब है अपने घर, अपने इलाके का जनप्रतिनिधि याकि सांसद चुनना है। मतलब उस व्यक्ति को चुनना है जो आपका ख्याल करे। जरूरत पड़ने पर आपके लिए पत्र लिखे, पैरवी करे। आपके मन की बात को अधिकारी, सरकार, मंत्रियों के आगे रखे। हिम्मत से आपके लिए बोल सके। आपको रोजगार दिलाने के लिए, इलाज कराने, स्कूल में दाखिले, काम-धंधे में बाधाओं को दूर कराने में आपकी मदद करे।

हां, नागरिक शास्त्र में अपने संविधान की पहली बेसिक बात है कि हम संसदीय प्रणाली वाले हैं। ब्रिटेन की तरह हैं। इसमें जनप्रतिनिधि मतलब सांसद है। सांसद अच्छा चुनेंगे, बुद्धि-विवेक वाला समझदार चुनेंगे तो प्रधानमंत्री अपने आप समझदार चुना जाएगा। जान लें चुनाव जीतने के बाद बहुमत वाली पार्टी या एलायंस के सांसदों की बैठक होती है। उसमें तब सांसद चुनते हैं कि कौन प्रधानमंत्री लायक है। हां, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, पीवी नरसिंह राव, वीपी सिंह, एचडी देवगौडा, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह ऐसे ही प्रधानमंत्री चुने गए थे। सो, नरेंद्र मोदी के इस प्रोपेगैंडा में भटके नहीं कि आपका वोट प्रधानमंत्री के लिए है। इस प्रोपेगैंडा में यदि वोट डालेंगे तो अपने सुख-दुख की चिंता की जिम्मेवारी लिए हुए सांसद गलत चुनेंगे। अपना जनप्रतिनिधि गलत बनाएंगे। तब आपकी आवाज खत्म होगी। आपकी लोकल चिंता नहीं होगी। अगले पांच साल फिर अपने सांसद से यहीं सुनेंगे कि मेरी चलती नहीं है।

हां, हर नौजवान, किसान, व्यापारी, मध्यवर्ग को वोट देते हुए सोचना है कि उन्हें उनकी आवाज बोलने वाला, उनकी चिंता करने वाला जनप्रतिनिधि चाहिए या जैसे पिछले पांच साल गुजरे हैं वैसा सिस्टम चाहिए, जिसमें सांसद बोला नहीं है। काम नहीं किया है, करवाया नहीं है और सवा सौ करोड़ लोग सिर्फ एक प्रधानमंत्री याकि नरेंद्र मोदी के मन की बात में बंध कर जीने को मजबूर रहे हैं।

समझो मतदाताओं कि देश की बात, देश की चिंता करने के लिए संसद और उसके 543 सांसद होते हैं। यदि ये सांसद अच्छे, सत्यवादी, समझदार, हिम्मती हुए तो सवा सौ करोड़ लोगों का यह देश अपने आप सुद्ढ़, विकासवान और विश्व में प्रतिष्ठा बनवाता बनेगा। ब्रिटेन की मौजूदा हकीकत पर गौर करें। इस समय वह यूरोपीय संघ से अलग होने की जनता की इच्छा वाले जनादेश की प्रक्रिया के बीच है। मगर वहां की संसद का कमाल देखिए, जनप्रतिनिधियों की बुनावट को समझें कि वे सरकार और प्रधानमंत्री के बनाए प्रस्ताव को बार-बार खारिज कर रहे हैं। इसमें सत्तारूढ, प्रधानमंत्री की पार्टी के सांसद तक भी अलग-अलग रूख अपनाए हुए हैं। मतलब वे प्रधानमंत्री, ह्वीप की चिंता नहीं करते हुए विपक्ष के साथ वोट कर रहे हैं या अपना अलग प्रस्ताव रख रहे हैं। यही संसदीय प्रणाली, लोकतंत्र की वह ताकत है, जिसने ब्रिटेन, यूरोपीय देशों, अमेरिका आदि को सिरमौर देश बनाया है। अमेरिका में वहां के सांसद आज स्टैंड लिए हुए हैं कि उन्हें अपने संसदीय इलाके, जनप्रतिनिधि होने के अपने धर्म को निभाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप के बनाए एक्ट को नहीं मानना है तो नहीं मानेंगें। फिर भले सरकार पर ही क्यों न कई दिनों तक ताला लगा रहे।

इससे समझें सांसद का मतलब और संसदीय व्यवस्था की अच्छाई। सो, हर मतदाता वोट डालने से पहले सोचे कि उसे सांसद गूंगा चाहिए या बोलने वाला? वह बुद्धि लिए हुए है या भक्ति लिए हुए? वह अगले पांच साल जनता के सुख-दुख को बुलंदी से बोलने वाला, प्रशासन-अफसरों से लड़ने वाला होगा या यह बहाना लिए हुए होगा कि मेरी तो चलती नहीं है। यदि सरकार का, प्रधानमंत्री का देश का सत्यानाश करने वाला कोई फैसला होगा तो वह संसद में बोलेगा या मौन बैठा रहेगा?

इसे और समझें। ब्रिटेन, अमेरिका के आज के उदाहरण की तरह मानें कि यदि वैश्विक झांसे में नरेंद्र मोदी को लगा कि पाकिस्तान से समझौता करके उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिल सकता है तो वे लाहौर जा कर इमरान खान से कश्मीर पर ले दे कर आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ जैसी सहमति तक पहुंचें और लोकसभा में प्रस्ताव ले आएं तो क्या आपका सांसद हाथ उठा कर समर्थन करेगा या य़ह पूछेगा कि ऐसा कैसे कर रहे हैं? आगरा के वक्त में जैसे वाजपेयी को रोकते हुए आडवाणी ने स्टैंड लिया था क्या वैसा आपका सांसद करेगा? तभी उस व्यक्ति को सांसद बनाएं जो यस सर नहीं, बल्कि हाथ उठाने, बोलने की हिम्मत लिए हो। जिसमें हिम्मत हो कि नोटबंदी सत्यानाशी लग रही है तो संसद में बोले, जीएसटी तकलीफदेह है तो वह ससंद में बताए।

मतलब आप जैसा सांसद चुनेंगे वैसी संसद बनेगी वैसे ही फिर देश की शान बनेगी, देश बनेगा। सांसद याकि जनप्रतिनिधि कैसा हो इस पर फोकस नहीं करके यदि सीधे प्रधानमंत्री के चेहरे का ध्यान कर इस सोच में वोट डाला कि नरेंद्र मोदी नहीं तो क्या राहुल गांधी को या मायावती को वोट दें तो यह आपका अपनी बुद्धि, विवेक और संसदीय लोकतंत्र की बेसिक जरूरत, बुनावट को ठोकर मारना होगा। देश में एक व्यक्ति की तानाशाही बनवाने वाला होगा। फिर भले वह मोदी की हो या राहुल की या मायावती की।

अपनी अपील है हर मतदाता से कि वोट डालने से पहले लालबहादुर शास्त्री, पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोह सिंह के चार चेहरों को ध्यान रखें। विश्वास रखें कि ये जैसे प्रधानमंत्री बने वैसे 23 मई बाद भी आपके सांसद अपने आप अच्छा प्रधानमंत्री चुन लेंगें। इन चारों को सांसदों ने ही प्रधानमंत्री बनाया था। 2004 में बहुतों का तर्क था कि वाजपेयी नहीं तो क्या विदेशी सोनिया गांधी? लेकिन बाद में क्या हुआ। वाजपेयी हारे तो प्रलय नहीं आया। देश मिटा नहीं जैसे आज मोदी मैसेज दे रहे हैं कि वे नहीं आए तो देश मिट जाएगा। 2004 में चुने गए 543 सासंदों, नेताओं के विवेक, पार्टियों की चेतना ने डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवाया था। हां, 2004 के चुनाव में वोट डालते हुए लोगों के दिमाग में डॉ. मनमोहन सिंह की तस्वीर नहीं थी। फिर भी वे प्रधानमंत्री बने। दस साल उनका राज रहा और पिछले पांच सालों की बैकग्राउंड, अनुभवों के परिपेक्ष्य में सोचें कि उनका मौन कार्यकाल मोदी राज के मुकाबले कैसा रहा? वहीं अनुभव लालबहादुर शास्त्री, पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी से भी है, जिन्हें सांसदों ने उस वक्त की परिस्थिति अनुसार सहजता में प्रधानमंत्री चुना और देश सहज गति आगे बढ़ा।

वहीं फिर होना चाहिए। झूठी और आपके दिमाग को मूर्ख बनाने वाली बात है कि मोदी को हराया तो मायावती या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। जान लें न मोदी का वापिस बनना गारंटीशुदा है और न भाजपा के हारने पर राहुल या मायावती का बनना गारंटीशुदा है। इस बात को भी नोट रखें कि राहुल या मायावती ने कभी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री बन कर ही रहेंगें। आडवाणी जीवन भर प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे, सोनिया गांधी को कई सालों प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बूझा जाता रहा। क्या हुआ? यह भी ध्यान रहे कि राहुल गांधी में यदि सत्ता की भूख होती तो 2009 के चुनाव की जीत के बाद मजे से प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन राहुल से अब तक के अनुभव का सार है कि उन्हें भले पप्पू मानें लेकिन उनमें सत्ता की, सत्ता वैभव की भूख नहीं है। वे डॉ. मनमोहन सिंह, एंटनी, शरद पवार, रघुराम राजन, सैम पित्रोदा सबका आदर करते हुए दिखते रहे हैं। 23 मई को यदि त्रिशंकु लोकसभा बनी तो जैसे सोनिया ने डॉ. मनमोहन सिंह को बनवाया वैसे राहुल गांधी भी रघुराम राजन, शरद पवार या अशोक गहलोत या दिग्विजय सिंह या मल्लिकार्जुन खड़गे किसी का भी नाम संसदीय पार्टी बैठक या यूपीए एलायंस के नेताओं के बीच रख सकते हैं। कोई भी पीएम बन सकता है। उससे देश आगे बढ़ेगा ही। कतई नहीं मिटेगा।

हां, संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली में ऐसे ही हुआ करता है। ब्रिटेन के पिछले पांच साल में ऐसे ही प्रधानमंत्री आए और गए हैं। सो, वोट डालते हुए वोटर पहले सिर्फ यह सोचे कि जो उम्मीदवार ख़ड़े हैं उनमें बतौर जनप्रतिनिधि कौन अच्छा रहेगा? यह भी सोचें कि 2014 में जिन सांसदों को आपने चुना और यदि वे चुनाव में खड़े हैं तो क्या उन्होंने पिछले पांच वर्षों में जनता का काम किया? जनता के सुख-दुख की बात संसद में की? अफसरों-प्रशासन में जा कर, कलक्टर-एसपी, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के आगे जा कर क्या हिम्मत से बात रखी? लोगों के काम क्या कराए?

यह सब सोचना वोट डालने से पहले की जरूरत है। और खास कर पहली बार वोट दे रहे नौजवानों को जानना चाहिए कि उनके वोट की ताकत तभी है जब वह अपना जनप्रतिनिधि ऐसा चुनें, जो उसके रोजगार के लिए, कलक्टर-एसपी के यहां, प्रशासन में, उसके सुख-दुख में उसका प्रतिनिधित्व करने का माद्दा रखता हो। यदि अपने लिए, अपनी खुद की इन कसौटियों का सांसद बनाया तो देश को अपने आप अच्छा प्रधानमंत्री मिल जाएगा।

(साई फीचर्स)

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