पानी का धंधा, मौन है विभाग

 

 

(शरद खरे)

गर्मी के मौसम में पानी की माँग बढ़ना स्वाभाविक ही है। गर्मी के मौसम में गला तर करने को अगर शीतल पेयजल मिल जाये तो क्या कहने। एक समय था जब राह चलते लोगों को शीतल पेयजल उपलब्ध कराने के लिये दानदाताओं, सेठ साहूकारों के द्वारा सार्वजनिक स्तर पर प्याऊ की व्यवस्थाएं की जातीं थीं। धनाढ्य लोगों के द्वारा राहों में कुंए भी खुदवाये जाते थे।

आज प्रौढ़ हो रही पीढ़ी के जेहन में वे यादें ताजा होंगी जिसमें यात्रा के समय सुराही या छागल ले जाने का चलन था। कमोबेश हर यात्री बस या ट्रक में छागल लटकी दिख जाया करती थी। बस स्टैण्ड अथवा रेल्वे स्टेशन के आसपास भी समितियों के द्वारा यात्रियों को निःशुल्क ही ठण्डा पानी पिलाया जाता था।

समय बदलता गया और सार्वजनिक प्याऊ इतिहास की वस्तुओं में शामिल होती गयीं। बोतल बंद पानी का चलन जबसे आरंभ हुआ है उसके बाद से सुराही और छागल का अस्तित्व भी समाप्त ही हो गया है। आज की युवा पीढ़ी को सुराही के बारे में तो शायद पता हो पर छागल के बारे में वे शायद ही जानते हों। आज बाजार में भी छागल कहीं बिकती नहीं दिखती।

दुकानों अथवा कार्यालयों में भी लोगों के द्वारा बोतल बंद या कंटेनर्स में पानी बुलाया जाता है। शुद्ध आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) पानी के नाम पर बिना फिल्टर किये पानी का चलन चल पड़ा है। सिवनी में भी आरओ पानी जगह-जगह बिक रहा है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन अथवा नगर पालिका के द्वारा भी कभी इस बात की तस्दीक करने की जरूरत नहीं समझी गयी कि जो पानी बाजार में बिक रहा है वह वाकई आरओ तकनीक के द्वारा शोधित है अथवा नहीं।

आज जिला मुख्यालय में ही पंद्रह से बीस लिटर वाले उन कैन्स में जिनमें पानी देर तक शीतल रहता है, का धंधा जमकर चमक रहा है। छोटे चार पहिया वाहनों में इस तरह के कैन्स से शादी ब्याह, मेलों ठेलों यहाँ तक कि घरों और प्रतिष्ठानों में पानी की सप्लाई का काम बदस्तूर जारी है। यह पानी आरओ वाटर के नाम पर बेचा जा रहा है। यह पानी वाकई शुद्ध है अथवा नहीं, इसको जाँचने की फुर्सत किसी को नजर नहीं आती है।

इतना ही नहीं गर्मी के मौसम में शीतल पेयजल बेचने वालों के द्वारा कितना पानी रोजाना शीतलीकरण के लिये उपयोग किया जा रहा है, उसके एवज में नगर पालिका को कितना कर चुकाया जा रहा है? कितना वाणिज्यिक कर दिया जा रहा है? कितना आयकर चुकाया जा रहा है? इस बारे में देखने सुनने की फुर्सत भी किसी को नहीं है।

वैसे भी लापरवाह नगर पालिका प्रशासन के द्वारा जिस तरह का पेयजल प्रदाय किया जा रहा है उसकी बजाय लोग इस तरह का शीतल जल ही खरीदकर पीना पसंद कर रहे हैं। शादी ब्याह हो या मेला ठेला हर जगह ही बड़े कंटेनर्स में कथित तौर पर शुद्ध अथवा शीतल जल परसते हुए देखा जा सकता है।

संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि जिले में चल रहे शीतल पेय के व्यापार पर नजर रखने के लिये संबंधित विभागों को पाबंद करें ताकि अमानक पानी की बिक्री से लोगों की सेहत पर बुरा असर न पड़ पाये।

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