काम के बोझ तले दबता बचपन!

 

 

पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद को तिलांजलि देकर कचरा बीन रहे बच्चे!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। जिले में वर्षों से बचपन को संवारने के लिये जमीनी स्तर पर एक भी योजना धरातल पर नहीं उतर पायी है। अभी भी स्थान – स्थान पर बच्चे कड़े श्रम से लेकर छोटे – छोटे कार्य भी कर रहे हैं। चाय की गुमटी से लेकर गली में फेरी लगाने तक के सभी कार्यों में 06 से 14 साल तक के बच्चे लगे हुए हैं।

भूख की आग में इन बच्चों को कचरों की ढेर में कुछ तलाशते देखा जा सकता है। शहर में किराना दुकानें, मिठाई दुकानें, ढाबे, छोटी – छोटी फैक्ट्रियों, चाय के ठेलों, ऑटो गैरेज, पंचर की दुकानों पर भी काम करते हुए बचपन को देखा जा सकता है। मुन्ना, छोटू, पप्पू, जैसे नामों को पुकारते ही बचपन सामने आकर खड़ा हो जाता है।

बालश्रम के लिये कानून बने तो वर्षों हो गये परंतु इनका पालन कभी कभार ही होता है। इसका कारण यह है कि जिम्मेदार, आँखें मूंदे बैठे हैं। वहीं बच्चों को खेलने और पढ़ने की उम्र में बाल कामगारों को चंद रुपये थमाये जा रहे हैं। श्रम विभाग फाईलें तैयार करने के चक्कर में केवल कागजों पर लक्ष्य पूरे कर रहा है। अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा ही है कि बाल श्रमिकों के लिये बनायी गयी योजना का लाभ उन तक नहीं पहुँच पा रहा है।

जिला जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी सरकारी आधिकारिक विज्ञप्तियों में भी लंबे समय से इस बात का उल्लेख करते हुए समाचार जारी नहीं किये गये हैं जिनमें बाल श्रमिकों को काम करवाने पर दुकान या प्रतिष्ठान संचालकों पर कोई प्रकरण कायम किया गया हो। मजे की बात तो यह है कि पेट की आग बुझाने के लिये दुकानों पर काम करने वाले बच्चों को स्कूल जाने के लिये भी प्रेरित नहीं किया जाता है।

यक्ष प्रश्न यही खड़ा हो रहा है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों की नजर में एक भी बाल श्रमिक नहीं आया? श्रम विभाग के कार्यालय के कुछ ही कदमों पर स्थित सड़क के किनारे लगे कई हॉटलों व ठेलों में कप प्लेट धोते दर्जनों बाल श्रमिक सहज ही दिख जायेंगे।

सुबह सवेरे टीन टप्पर बीतने हुए बचपन को आसानी से देखा जा सकता है। कचरे के बीच पारखी आँखों से गरीब गुरबों के बच्चे दिन भर अपने काम की चीजें बटोरते देखे जा सकते हैं। सालों पहले जब इलैया राजा सिवनी में पदस्थ थे तब उनके द्वारा इन बच्चों की सुध ली गयी थी। लोगों का कहना है कि उनके बाद से इस ओर देखने सुनने की फुर्सत किसी को नहीं रह गयी है।

सिवनी में इस तरह की व्यवस्थाएं भी नहीं हैं कि घर में सबसे छोटे होने के बाद भी परिवार के मुखिया (भरण पोषण के मामले में) निभाने वाले इन बच्चों के अध्ययन अध्यापन की कोई व्यवस्था शाम के समय हो। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी इससे कोई सरोकार नजर नहीं आता है।

एक हॉटल में काम करने वाले श्यामू (बदला हुआ नाम) ने मासूमियत से कहा कि मन तो स्कूल जाने का करता है। पापा अकेले परिवार का बोझ कैसे उठायेंगे? बालश्रम परियोजना के तहत नौ से 14 साल तक के बच्चों का सर्वे कर उन्हें विशेष बाल श्रमिक विद्यालय में भर्त्ती कराने का प्रावधान है, जहाँ सारा खर्च सरकार वहन करती है पर सरकारी नियम कायदों की परवाह किसे है!

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