वर्षा ऋतु के पूर्व कर लिये जायें पौधारोपण के मुकम्मल इंतेजामात

 

इस स्तंभ के माध्यम से मैं सिवनी के पर्यावरण प्रेमियों से अपील करना चाहता हूँ कि नौतपा आरंभ होने वाले हैं जिसके शीघ्र बाद ही बारिश का मौसम आरंभ हो जायेगा, इसे देखते हुए समय रहते, सिवनी में इस तरह से वृक्षारोपण की तैयारियां की जायें जिससे लगाये गये पौधे बाद में वृक्ष के रूप में आकार ले सकें।

अभी होता यह है कि वृक्षारोपण तो भारी मात्रा में कई संस्थाओं के द्वारा जगह-जगह बारिश के मौसम में कर दिया जाता है लेकिन उनके द्वारा लगाये गये पौधों का बाद में क्या हश्र हुआ इसके बारे में वे ज्यादा खोज खबर लेते नहीं दिखते हैं। बहुत कम स्थानों पर लगाये गये पौधों की, लोगों के द्वारा पूरी चिंता के साथ देखरेख की गयी जिसके कारण वे वृक्ष में तब्दील हो सके लेकिन प्रत्येक स्थान पर ऐसा न होने के कारण पौधारोपण के अपेक्षित नतीजे फिर भी नहीं मिल सके।

आवश्यकता इस बात की है कि भले ही लाखों की तादाद में पौधारोपण करके कीर्तिमान रचने का प्रयास न किया जाये लेकिन कम ही मात्रा में पौधारोपण किया जाये। यदि ऐसा किया जाता है तो संभव है कि कम संख्या में लगाये गये पौधे अनुपात की दृष्टि से वृक्ष के रूप में ज्यादा विकसित हो सकें। सिवनी शहर में वृक्षों की बहुत आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। वृक्षों की कमी के चलते शहर की आबोहवा में तेजी के साथ हानिकारक परिवर्तन आया है।

एक समय था जब शहर में प्रवेश करने के पहले लोगों का सामना सड़क के दोनों ओर लगे वृक्षों से होता था। आज के समय में शहर में प्रवेश करने वाले रास्तों पर दूर-दूर तक सघन पेड़ों का नामो निशान तक नहीं दिखता है। इक्का-दुक्का पेड़ अवश्य ही कुछ-कुछ अंतराल पर नजर आ जाते हैं। जिस तरह की मानसिकता इन दिनों अपनायी जा रही है उसे देखकर नहीं लगता कि ये इक्का-दुक्का पेड़ भी ज्यादा दिनों तक अपना अस्तित्व बचाये रखने में कामयाब हो पायेंगे।

शहर के अंदर आमतौर पर नये वृक्षों को स्थान देना अपेक्षाकृत मुश्किल हो गया है। विडंबना यह है कि सड़क निर्माण के नाम पर शहर के अंदर स्थित कई वृक्षों को समय से पहले ही नेस्तनाबूद करवा दिया गया और जिसके बाद न तो सड़क ही पूरी हो सकी और न ही काटे गये वृक्षों के स्थान पर नये पौधों को रोपित किया गया। इस तरह के कार्य का सबसे ज्वलंत उदाहरण है मॉडल रोड, जिसके लिये वृक्षों को तो कटवा दिया गया लेकिन बिजली के खंबे आज भी यथावत लगे हुए हैं। इस तरह की कार्यशैली बताती है कि संबंधित लोगों के लिये हरे-भरे वृक्षों का कितना औचित्य है।

सिवनी ही ऐसा शहर या जिला होगा जहाँ सड़क निर्माण के नाम पर वृक्षों को जमींदोज़ तो कर दिया जाता है लेकिन उनके स्थान पर नये पौधों का रोपण नहीं किया जाता है। यदि कहीं पर कोई पौधा लगा भी दिया जाये तो उनके विकसित होने की व्यवस्था बनाये जाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय होगा कि सिवनी में पदस्थ अधिकारियों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं दिखता है लेकिन स्थानीय जन प्रतिनिधियों के द्वारा भी इस ओर कोई रूचि न ली जाना विस्मृतकारी मानी जा सकती है। इन जन प्रतिनिधियों को अपने शहर से कोई वास्ता नजर नहीं आता है। ऐसे में पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों से अपेक्षा है कि वे ही आगे आकर जागरूकता फैलायें एवं शहर सहित संपूर्ण जिले को हरा-भरा बनाने में अपना रचनात्मक योगदान दें।

गुड्डू खान