बोर्ड में 30 फीसदी से कम रिजल्ट देने वाले स्कूलों के शिक्षकों की होगी परीक्षा

 

 

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

भोपाल (साई)। स्कूल शिक्षा विभाग बोर्ड परीक्षा में 30 फीसदी से कम रिजल्ट देने वाले स्कूलों के शिक्षकों की परीक्षा लेगा। परीक्षा 12 जून को विषयवार ली जाएगी।

परीक्षा के लिए पिछले चार साल के 10वीं-12वीं के पेपरों से प्रश्नपत्र तैयार किए जाएंगे। विभाग शिक्षकों द्वारा हल किए गए प्रश्नपत्रों का विश्लेषण करेगा। इससे विद्यार्थियों की परेशानी और उनकी पढ़ाई के स्तर का पता लगाया जा सकेगा। यह भी पता चलेगा कि छात्रों को पढ़ाने वाले शिक्षक काबिल हैं कि नहीं।

स्कूल शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव रश्मि अरुण शमी ने शुक्रवार को सभी जिलों के अधिकारियों की बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट की समीक्षा बैठक में यह निर्देश दिए। उन्होंने बहुत कम या शून्य परीक्षा परिणाम देने वाले स्कूलों के शिक्षकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के निर्देश भी दिए।

बैठक में उपस्थित अधिकारियों से आगामी परीक्षा परिणाम में सुधार के लिए कार्ययोजना भी ली गई है। बैठक में तया हुआ कि कक्षा 8वीं के शिक्षकों के लिए भी प्रतिभा पर्व के प्रश्नपत्रों पर आधारित प्रश्नपत्र तैयार कर इनकी परीक्षा ली जाए। बैठक में लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) आयुक्त जयश्री कियावत, उप सचिव अनुभा श्रीवास्तव व केके द्विवेदी, रमसा के अपर संचालक कामना आचार्य उपस्थित थीं। बैठक में रीवा, सीधी, सिंगरौली, मुरैना, शिवपुरी, भिंड, ग्वालियर आदि कई जिलों के अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी शामिल हुए।

पढ़ाई जाएं एनसीईआरटी की किताबें : प्रमुख सचिव ने अधिकारियों से कहा कि स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों से ही पढ़ाई कराई जा रही है कि नहीं यह निरीक्षण कर पता करें। सभी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों से ही पढ़ाई सुनिश्चित कराएं।वहीं डीपीआई आयुक्त ने निर्देश दिया कि न्यून परीक्षा परिणाम वाले स्कूलों के प्राचार्यों, व्याख्याताओं और शिक्षकों के ट्रांसफर पर विचार किया जाएगा। इसके अलावा प्राचार्यों व शिक्षकों के लिए टाइम मैनेजमेंट, नेतृत्व विकास पर प्रशिक्षण दिया जाए।

रिजल्ट खराब आने की कमियां गिनाईं : स्कूलों में नियमित प्राचार्यों का अभाव और कई विषयों के शिक्षकों की कमी। योग्य अतिथि शिक्षकों का अभाव। गणित व अंग्रेजी विषय के शिक्षकों की कमी। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थित कम होना एवं मूलभूत सुविधाओं की कमी। शिक्षकों की बीएलओ के रूप में नियुक्ति गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाना। पालक, शिक्षक व विद्यार्थियों के बीच नियमित संवाद न होना।

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