घड़े-सुराही के कारीगरों का रोजगार समाप्ति की कगार पर!

 

 

(आगा खान)

कान्हीवाड़ा (साई)। कुछ साल पहले तक हर घर की अहम उपयोगी वस्तुओं में शुमार मिट्टी के घड़े, सुराही व अन्य सामग्री अब अपना अस्तित्व खोते जा रही हैं। आधुनिक समय में आरओ मशीन, फ्रिज का चलन बढ़ने से मिट्टी के घड़े बनाने वाले कारीगरों के सामने रोजी – रोटी के लाले पड़ गये हैं। इससे मजबूरन वे अपना पुश्तैनी काम को छोड़कर महानगरों की ओर रुख कर रहे हैं।

सिवनी में सुराही और घड़ों के लिये कान्हीवाड़ा क्षेत्र की अपनी अलग पहचान है। कान्हीवाड़ा की सुराही पूरे जिले ही नहीं बल्कि संपूर्ण अंचल में प्रसिद्ध है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि इस व्यवसाय से अच्छी आमदानी भी कारीगरों को प्राप्त होती थी। आधुनिक समय में मशीनों के आ जाने के कारण मिट्टी के घड़े व अन्य सामग्री बनाने वाले कारीगरों को रोजगार के लाले पड़ गये हैं। कई कारीगरों ने पंचायत में काम नहीं मिलने के कारण रोजी – रोटी की तलाश में महानगरों की राह पकड़ ली है।

घड़ा और सुराही बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि घड़े व अन्य सामग्री बनाने के लिये उन्हें 1500 से 2000 हजार रुपये में एक ट्रैक्टर ट्रॉली मिट्टी खरीदनी होती है। इसमें घड़े व अन्य सामग्री को पकाने अलग से खर्च आता है। गाँव में सदियों से यह व्यवसाय चल रहा है।

केवलारी के घड़े, जिला मुख्यालय सिवनी सहित बालाघाट, मण्डला, छिंदवाड़ा, नरसिंहपुर के अलावा महाराष्ट्र प्रदेश में भी बिकने जाते थे। वर्तमान में एक घड़े की कीमत चालीस से साठ रुपये ही मिल रही है जिससे इस व्यवसाय से जुड़े लोगों के समक्ष आजीविका का संकट भी आन खड़ा होता दिख रहा है।

ज्ञातव्य है कि वर्तमान में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी मिट्टी के घड़े का चलन तेजी से घट रहा है। अधिकांश लोग फ्रिज व आरओ का ठण्डा पानी पीते हैं। अब धीरे – धीरे कारीगर इस परंपरागत धंधे को छोड़ रहे हैं।

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