100 दिन पूरे कब मिलेगा पानी!

 

 

(शरद खरे)

जिला मुख्यालय में तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी शासित नगर पालिका परिषद काम कर रही है। इसके पहले श्रीमति पार्वती जंघेला और राजेश त्रिवेदी के तो अब श्रीमति आरती शुक्ला के नेत्तृत्व में नगर पालिका परिषद सत्ता पर काबिज है। इन तीनों ही परिषदों के खाते में शहर को लेकर किसी तरह की उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं रही है।

पार्वती जंघेला के अध्यक्ष रहते हुए शहर की सड़कों के हाल बेहाल हुए। सड़कों को बनाया गया और उसमें जमकर बंदरबांट की गयी। यह मामला माननीय उच्च न्यायालय में लंबित है। आज नहीं तो कल इसका फैसला होगा। उस समय बनीं सड़कों के हाल क्या थे यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।

इसके बाद राजेश त्रिवेदी के अध्यक्ष रहते हुए शहर में मॉडल रोड का काम आरंभ किया गया। इसके अलावा शहर में यातायात सिग्नल्स संस्थापित किये गये और अंतिम दौर में भीमगढ़ जलावर्धन योजना की पूरक जलावर्धन योजना को भी इसी दौर में तैयार करवाया गया।

इसके बाद श्रीमति आरती शुक्ला सत्ता में आयीं और उसके बाद मॉडल रोड को बिसार दिया गया। नवीन जलावर्धन योजना में जिस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं वे अपने आप में कीर्तिमान ही स्थापित करते नज़र आ रहे हैं। शहर में पानी की त्राहि त्राहि मची है पर परिषद पूरी तरह खामोश बैठी है।

पालिका के भ्रष्टाचार और लोगों को होने वाली परेशानी को लेकर जब भाजपा या काँग्रेस के पार्षदों से बात की जाती है तो सभी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे पार्टी से बंधे हैं और पार्टी लाईन से बाहर जाना उनके बस की बात नहीं है। इसमें शोध का विषय यह है कि क्या पालिका के चुने हुए प्रतिनिधि जिस दल के सदस्य हैं, उस दल की सदस्यता लेकर ही इस धरा पर आये थे!

जाहिर है इसका उत्तर न में ही होगा। फिर क्या वजह है कि सिवनी शहर इन पार्षदों के लिये पार्टी के बाद वाली प्राथमिकता पर है। रही बात पार्टी लाईन की तो जब भी दल की बैठकें होती हैं तो शायद ही किसी पार्षद के द्वारा इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया जाता हो कि वे महज़ रबर स्टाम्प पार्षद ही हैं।

कुल मिलाकर पालिका के चुने हुए लगभग सारे जन प्रतिनिधि खामोश हैं तो उनकी खामोशी के पीछे कहीं न कहीं उनका निहित स्वार्थ (चाहे जो भी हो) जुड़ा हुआ है। जब भी बात आती है तो चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने और खाल बचाने के लिये अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।

यक्ष प्रश्न यही है कि जब पालिका का बजट पारित होता है या साधारण सभा की बैठक होती है तब ये पार्षद बगलें झांकते क्यों नजर आते है। क्या भाजपा और काँग्रेस संगठनों में इतनी माथा फोड़ी और मनभेद या मतभेद हैं कि वे जनता के हितों के मामले में बैठकर पालिका के अधिकारियों को नसीहत नहीं दे पा रहे हैं। या तो पालिका के जनप्रतिनिधियों को उनके अधिकारों का बोध नहीं है या है तो फिर वे जानबूझकर अपनी खाल बचाने के लिये इस तरह की बचकानी हरकतें करते नज़र आते हैं।

शहर में पानी का जबर्दस्त संकट चल रहा है। नवीन जलावर्धन योजना का काम तीन साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। जिला कलेक्टर के द्वारा दिये गये अल्टीमेटम को 09 जून को 100 दिन ज्यादा हो चुके हैं। इधर, विधायक दिनेश राय के द्वारा तय की गयी समय सीमा से भी 466 दिन ज्यादा बीत चुके हैं पर नवीन जलावर्धन योजना के बारे में अब तक नगर पालिका की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई भी वक्तव्य नहीं आया है।

यह बात समझ से परे ही मानी जा सकती है कि लगातार तीसरे साल भी गर्मी के मौसम में शहर के निवासियों को पानी की किल्लत से दो-चार होना पड़ा है। इस तरह के हालात तब हैं जबकि नवीन जलावर्धन योजना के ठेकेदार को पालिका के द्वारा लगभग 98 फीसदी भुगतान कर दिया गया है!

दिसंबर के पहले नगर पालिका के खिलाफ कार्यवाही से अधिकारी इसलिये कतराते रहे होंगे क्योंकि उस समय प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और नगर पालिका भी भाजपा शासित ही थी। अब तो प्रदेश में काँग्रेस की सरकार है तब पालिका की मश्कें कसने से काँग्रेस संगठन क्यों कतरा रहा है यह बात समझ से परे ही है!

मजे की बात तो यह है कि सिवनी के प्रभारी मंत्री सुखदेव पांसे प्रदेश में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मंत्री हैं। पीएचई के मूल कामों में जल प्रदाय योजना का शुमार होता है, इसलिये प्रभारी मंत्री के लिये इस पूरे मामले की जाँच करायी जाना मिनिटों का काम है। जिला काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज कुमार खुराना और प्रभारी मंत्री सुखदेव पांसे के बीच मधुर संबंध किसी से छुपे नहीं हैं। इसके बाद भी जिला काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज कुमार खुराना आखिर शहर के लोगों को भीषण गर्मी में प्यासा देखने के बाद कार्यवाही क्यों नहीं करवा रहे हैं यह बात भी शोध का ही विषय मानी जा सकती है।

सुना है दो चार दिन में प्रभारी मंत्री का सिवनी दौरा हो सकता है। इस बार अगर उनके द्वारा जिला अस्पताल में वार्ड ब्वाय, सफाई कर्मियों की भर्त्ती की बजाय जबरिया निर्माण कार्य को ही प्राथमिकता दी जाती है और नवीन जलावर्धन योजना के विलंब पर समय सीमा में जाँच नहीं बैठायी जाती है तो यह समझ लेना चाहिये कि . . .!

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