ऑक्सीजन पर शिक्षा विभाग

 

 

(शरद खरे)

जिले में आला अधिकारियों की प्रशासनिक पकड़ कुछ सालों से ढीली ही प्रतीत हो रही है, जिसके चलते अनेक विभाग के जिला स्तर के अधिकारियों के द्वारा न केवल मनमानी की जा रही है, वरन जिले के आला अधिकारियों को अपने हिसाब से किस्से-कहानी गढ़कर उंगलियों पर नचाने का प्रयास भी किया जा रहा है।

जिले में शिक्षा विभाग के हालात सालों से बेहाल पड़े हुए हैं। सालों से एक ही स्थान पर जमे शिक्षकों और बाबुओं के द्वारा अपने तरीके से ही कामों को संपादित किया जा रहा है। पता नहीं शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्वारा तीन साल से ज्यादा समय से एक ही स्थान पर जमे लिपिकों के तबादले क्यों नहीं किये जा रहे हैं। तबादले तो छोड़िये, बाबुओं के पास एक ही शाखा का प्रभार सालों से है।

जिले में निजि शालाओं के द्वारा जिस तरह की मनमानी की जा रही है वह किसी से छुपी नहीं हैं। इस तरह की मनमानियों से पालकों की जेबें हल्की हो रही हैं, पर इसकी चिंता न तो जिला प्रशासन को है और न ही सियासी दलों को। निजि शालाओं के द्वारा मार्च माह में ही नये शैक्षणिक सत्र की कार्यवाही आरंभ कर दी जाती है। मार्च माह के दूसरे पखवाड़े में ही बोर्ड परीक्षाओं को छोड़कर अन्य कक्षाओं के विद्यार्थियों के पालकों के द्वारा मार्च के अंतिम दिनों में गणवेश और पाठ्य पुस्तकें खरीद ली जातीं हैं।

कई बार इस बात को मीडिया के जरिये प्रकाशित और प्रसारित किया गया कि निजि शालाओं की पाठ्य पुस्तकें और गणवेश दुकान विशेष में ही उपलब्ध होते हैं, पर जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधियों के द्वारा इस ओर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा गया। आज तक शायद ही कभी पुस्तक या गणवेश विक्रेताओं के प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण किया गया हो। सालों से शिक्षा विभाग के द्वारा इसके लिये निरीक्षण दल का गठन तो कर दिया जाता है पर निरीक्षण कब होता है इस बात की जानकारी किसी को नहीं लग पाती है। शिक्षा विभाग के आला अधिकारी भी पालकों के द्वारा शिकायत किये जाने का इंतजार ही करते रहते हैं, मानों इन समितियों का गठन शिकायत के इंतजार के लिये किया गया हो!

इसके अलावा निजि तौर पर कोचिंग संस्थान के संचालकों के द्वारा दसवीं और बाहरवीं बोर्ड (चाहे सीबीएसई हो या माध्यमिक शिक्षा मण्डल) के विभिन्न शालाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का श्रेय बटोरा जाता है और शैक्षणिक संस्थान और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के जिम्मेदार अधिकारी जिस तरह मौन रहते हैं उसमें कहीं न कहीं अधिकारियों के उपकृत होने की चर्चाओं को बल ही मिलता है।

नया शैक्षणिक सत्र आरंभ होने वाला है। जिला शिक्षा अधिकारी को चाहिये कि वे अपने कार्यालय में बैठे रहने की बजाय जिले का भ्रमण करें ताकि जिले में चल रहीं शिक्षा की दुकानों की असलियत सामने आ सके। सरकारी शालाओं में हालात इतने खराब हैं कि शिक्षकों के द्वारा अध्यापन करवाने की बजाय पूरा समय मोबाईल पर सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर बिताया जा रहा है। इस तरह कैसे शिक्षा का स्तर सुधर पायेगा।

निश्चित तौर पर प्रशासनिक अनदेखी के चलते पालकों के अंदर सत्ताधारी पार्टी के प्रति अविश्वास पैदा हो रहा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि वे ही शिक्षा विभाग की मश्कें कसें और पालकों को राहत दिलवाने के मार्ग प्रशस्त करें।

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