क्या थे निर्देश जारी करने के मायने!

 

 

(शरद खरे)

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के हवाले से 08 मई को जारी सरकारी विज्ञप्ति में जिले में निजि चिकित्सा करने वाले चिकित्सकों को मध्यप्रदेश के नियमों के हिसाब से एक पखवाड़े में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय में पंजीयन कराने के निर्देश जारी किये गये थे। देखा जाये तो 22 मई के उपरांत सीएमएचओ को इस मामले में कार्यवाही कर देना चाहिये था, पर अब तक इस मामले में कोई भी कार्यवाही नहीं हुई है।

इस तरह की विज्ञप्तियों को पढ़कर पाठकों की हंसी रोके नहीं रूकती होगी, क्योंकि हर छः महीने में इस तरह के निर्देश जारी हो जाते हैं। इसके बाद कितने चिकित्सकों के द्वारा पंजीयन कराया गया, कितनों के खिलाफ सीएमएचओ के द्वारा कार्यवाही की गयी, यह बात शायद ही कोई जानता हो। लोग तो यह भी कहते नज़र आते हैं कि नियमित अंतराल के बाद चौथ वसूली की गरज से ही इस तरह की विज्ञप्तियां सार्वजनिक की जाती हैं ताकि झोला छाप चिकित्सकों से उगाही की जा सके।

जिला कलेक्टर के राडार पर स्वास्थ्य विभाग होने के बाद भी इस तरह की विसंगतियों की पुनरावृत्ति लगातार हो तो इसे क्या माना जायेगा! सिवनी शहर में नागपुर से आकर बिना अनुमति उपचार करने वाले चिकित्सकों के द्वारा यहाँ के मरीज़ों की जेबें तराशी जा रही हैं और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं।

जिले के ग्रामीण अंचलों में झोला छाप चिकित्सकों की भरमार है। पूर्व में जिला कलेक्टर्स के द्वारा तहसील स्तर पर इनकी जाँच के लिये समितियां बना दी गयी थीं। इन समितियों के द्वारा एक भी झोला छाप चिकित्सक के खिलाफ कार्यवाही न होने से यही प्रतीत होता है या तो सब कुछ ठीक ठाक है और या फिर समितियों को इन चिकित्सकों ने साध लिया है।

एक जिलाधिकारी के तबादले के बाद उनके द्वारा दिये गये दिशा निर्देशों को उनके सक्सेसर जिलाधिकारी के द्वारा हवा में ही उड़ा दिया जाता है। नये जिलाधिकारी की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं जबकि होना यह चाहिये कि विभागवार जो भी काम चल रहे हों उनकी समीक्षा की जाकर उन्हें आगे बढ़ाया जाये।

सिवनी में रोज़ ही दो से तीन चिकित्सक नागपुर से आकर नियम विरूद्ध तरीके से उपचार कर रहे है। इनके द्वारा कोई काम निःशुल्क नहीं किया जाता है, फिर भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी एवं अस्पताल के सिविल सर्जन के मौन को क्या यह नहीं माना जाये कि इन चिकित्सकों के द्वारा अधिकारियों को साधा गया है।

इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष प्रेम तिवारी, नगर अध्यक्ष नरेंद्र ठाकुर, जिला काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज कुमार खुराना और नगर अध्यक्ष इमरान पटेल सहित चारों विधायकों का मौन भी आश्चर्य से कम नहीं माना जा सकता है। अब तो यह बात भी लोगों के जहन में उठ रही होगी कि नियम कायदे किसलिये बनाये जाते हैं, जब उनका पालन ही नहीं करवाना हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह की प्राथमिकता पर स्वास्थ्य विभाग दिख रहा है, मई माह उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के नाम कर दिया था। इसलिये उनसे जनापेक्षा व्यक्त की जा सकती है कि अगर बाहर से आने वाले इन चिकित्सकों पर बंदिश नहीं लगायी जा सकती है तो कम से कम इस अनिवार्यता को इन पर थोपा जा सकता है कि वे सुबह दो घण्टे जिला अस्पताल में मरीज़ों का निःशुल्क उपचार करेंगे! इससे जिले के मरीज़ों को इन अनुभवी चिकित्सकों की निःशुल्क सेवाओं का लाभ मिल सकेगा . . .!

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