और गरीबों का मसीहा होने का भी हल्ला!

 

 

(अजित द्विवेदी)

इंदिरा गांधी को गरीबों का मसीहा कहा जाता था। समाजवादी राजनीति करने वाले नेता गरीबों के मसीहा कहे जाते थे। मंडल की राजनीति से निकली यादव त्रयी को भी गरीबों और पिछड़ों का मसीहा कहा गया। पर भाजपा के किसी नेता को कभी गरीबों का मसीहा नहीं कहा गया। समाजवादी राजनीति के दौर में भी भाजपा उदार अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद की पैरोकार पार्टी थी। नेहरू का समाजवाद भाजपा को पसंद नहीं था। तभी कांग्रेस का झुकाव जब रूस की ओर था तो भाजपा का झुकाव अमेरिका की ओर था। भाजपा के नेता कहते रहे हैं कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है। नरेंद्र मोदी भी सत्ता संभालने के बाद उसी रास्ते पर चल रहे हैं। उनके राज में सरकार के सारे बिजनेस बंद होने की कगार पर हैं। चाहे विमानन हो या संचार हो, सब की हालत खराब है। उनके राज में कुछ खास निजी कंपनियों का कारोबार फल फूल रहा है। पर बावजूद इस सबके पांच सालों में मोदी ने अपने को गरीबों का मसीहा बनाने का नैरेटिव बनवाया।

यही इस बार के लोकसभा चुनाव की एक खास बात रही, इसी ने भाजपा और मोदी के पक्ष में अंडरकरंट बनाई। मोदी ने राष्ट्रवाद और हिंदू गौरव की जो मुख्य थीम चुनी, उसके एक परत नीचे गरीबों और वंचितों के लिए काम करने का नैरेटिव भी बनाया गया। हिंदू गौरव और राष्ट्रवाद की आड़ में बहुत सावधानी से सबाल्टर्न और पोस्ट मंडल राजनीति का जाल बुना गया। ध्यान रहे मंडल आंदोलन से मझोली जातियां मजबूत हुईं। यादव, कुर्मी, कुशवाहा, लोध जैसी जातियों को सत्ता मिली। इसने अति पिछड़ी जातियों के अंदर सत्ता की आकांक्षा पैदा की। उस आकांक्षा को मोदी ने बहुत कायदे से भुनाया। मंडल के बाद की राजनीति में उभरी जातियों से उन्होंने अपने को जोड़ा। खुद को अति पिछड़ा बता कर मोदी ने एक बड़े समूह में हिंदू गौरव का भाव भी भरा और खुद को उनके प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित किया।

इसके बाद उन्होंने गरीबों, वंचितों के लिए काम करने का नैरेटिव बनवाया। उन्होंने ऐसा प्रचार कराया जैसे उनकी सरकार सिर्फ गांव और गरीब के लिए काम कर रही है। उन्होंने सारी योजनाएं ऐसी शुरू कीं, जिनका सीधा जुड़ाव आम आदमी और खास कर गरीब से था। उन्होंने गांव गोद लेने की योजना चलवाई। हालांकि गोद लिए गांव अब भी गोद में ही हैं, चाहे वह गांव प्रधानमंत्री का गोद लिया क्यों न हो। पर मोदी ने यह नैरेटिव बनवाया कि वे गांवों का विकास कर रहे हैं। उन्होंने देश भर में शौचालय बनवाने शुरू किए। यह भी गरीब की जरूरत थी। उन्होंने बैंकों में जन धन खाते खुलवाए। प्रधानमंत्री आवास का दायरा बढ़ाया। किसानों को सीधे खाते में रुपए भेजने की योजना बनाई। रसोई गैस के सिलिंडर बांटने शुरू किए।

बौद्धिक चिंतन के लिए इन सारी योजनाओं की सफलताओं, विफलताओं पर चर्चा हो सकती है। आंकड़े दिए जा सकते हैं कि 83 फीसदी लोग रसोई गैस के सिलिंडर रिफील नहीं करा रहे हैं। पर इससे धारणा नहीं बदल सकती है। जिसको रसोई गैस के सिलिंडर मिले, जिसके घर में शौचालय बना, जिसको आवास मिला, जिसके खाते खुले, जिसके खाते में नकद पैसे आए, उनकी धारणा इन आंकड़ों से नहीं बदलेगी कि कितने खातों में कितना पैसा है या कितने सिलिंडर दोबारा नहीं भरे जा रहे है। उनको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ रहा है कि अंबानी और अडानी को सरकार क्या दे रही है। वे यह मानते हैं कि हर सरकार पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के लिए काम करती है। गरीब के लिए कौन काम कर रहा है?

मोदी की सरकार ने ऐसी सैकड़ों योजनाएं शुरू कराई, जिसके लाभार्थियों की संख्या करोड़ों में है। उनके बीच बिल्कुल नीचे तक भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं ने यह मैसेज पहुंचाया कि मोदी उनकी तरह के परिवार से आए हैं और इसलिए वे उनके लिए काम कर रहे हैं। यह अस्मिता की राजनीति का अगला दौर है, जहां नेता खुद को सिर्फ जाति के आधार पर नहीं, बल्कि वर्ग के आधार पर आम लोगों से जोड़े। मंडल के नेताओं ने खुद को जाति के आधार पर एक खास जाति समूह से जोड़ा। पर मोदी ने अपने को जाति से जोड़े रखते हुए उससे ऊपर उठा दिया। ऐसा काम उनसे पहले बिहार में नीतीश कुमार ने किया। वे बहुत मामूली संख्या वाली अपनी जाति की पहचान बनाए रखते हुए सर्वजन के नेता बने।

मोदी ने बार बार अपने को हिंदू राष्ट्रवादी के रूप में पेश किया पर साथ ही जाति भी बताई और अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी बताई। अब कोई इस बात की पड़ताल करके बताता रहे कि उन्होंने चाय बेची या नहीं और उनकी मां ने लोगों को घरों में काम किए या नहीं। पर उन्होंने यह बात आम लोगों के मन में बैठा दी कि वे बेहद गरीब पृष्ठभूमि से और बेहद निचली जाति से आए हैं। तभी उनकी सरकार भले बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाले काम करती रही। पर आम लोगों के लिए मोदी उनकी तरह के व्यक्ति बने रहे। वे कारोबारियों के लिए कारोबार बढ़ाने वाले नेता रहे, अगड़ी जातियों के लिए हिंदू राष्ट्रवादी रहे, पिछड़ी जातियों के लिए अति पिछड़ी जाति के नेता रहे और गरीबों के मसीहा बन गए। नोटबंदी के उनके फैसले ने गरीबों के मसीहा वाली छवि को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने गरीबों को यह मैसेज दिया कि तमाम अमीरों और पैसे वालों को उन्होंने लाइन में लगा दिया।

(साई फीचर्स)

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