कुटीर उद्योगों के लिये बनें योजनाएं

 

 

(शरद खरे)

जिले में कुटीर उद्योग के नाम पर शायद ही कुछ बचा हो। कुटीर क्या बड़े, मंझोले और छोटे उद्योगों के मामले में जिला पूरी तरह पिछड़ चुका है। युवाओं के पास रोजगार के साधन नहीं हैं। रोजगार के साधन न होने से युवाओं के द्वारा गलत रास्तों से धनार्जन करने के मार्ग प्रशस्त किये जा रहे हैं।

आसपास के जिलों पर अगर नज़र डाली जाये तो आसपास के जिलों को सिवनी के निवासी पूरी तरह समृद्ध ही पाते हैं। जिले में औद्योगिक क्षेत्रों में शायद ही कोई भूखण्ड रिक्त हो पर उद्योगों की संस्थापना के हिसाब से अगर देखा जाये तो औद्योगिक क्षेत्रों में भूखण्ड खाली ही मिलते हैं।

जिला मुख्यालय में डालडा फैक्ट्री के पास उद्योग कार्यालय के समीप पुराना औद्योगिक क्षेत्र है। अगर आप उद्योग कार्यालय जाकर यहाँ उद्योग स्थापित करने के लिये भूखण्ड की माँग करते हैं तो आपको यह कहकर टरका दिया जाता है कि यहाँ पर एक भी भूखण्ड रिक्त नहीं है। इसके अलावा भुरकुलखापा में औद्योगिक क्षेत्र है। यहाँ भी कमोबेश यही स्थिति नज़र आती है।

जिले के सांसद विधायकों के द्वारा शायद ही कभी यह पूछा गया हो कि जिले में उद्योग तो स्थापित हैं नहीं, लोगोें को रोजगार तो मिल नहीं रहा है फिर इतने सारे भूखण्ड किसे और कितने समय के लिये आवंटित किये गये हैं। अगर भूखण्ड पर एक साल के अंदर उद्योग आरंभ नहीं हो पाते हैं तो उनका आवंटन निरस्त किया जाना चाहिये।

जिले में कुटीर उद्योग भी दम तोड़ चुके हैं। चायनीज आईटम्स ने कुटीर उद्योगों का गला घोंटकर रख दिया है। प्रौढ़ हो रही पीढ़ी आज भी इस बात की गवाह है कि जब वह भैरोगंज से होकर गुजरती थी तब वहाँ हाथ करघा की खट-खट और बर्तन बनाने की आवाजें आया करती थीं। अब सब कुछ इतिहास की बातें हो चुकी हैं।

महंगाई के इस जमाने में कान्हीवाड़ा की सुराही और मटके का उद्योग भी दम तोड़ता ही प्रतीत हो रहा है। हुक्मरानों को इसके लिये प्रयास करने की आवश्यकता है। जिला स्तर पर उद्योग की संस्थापना कैसे हो पायेगी इस बारे में सांसद विधायकों को दलगत भावना से ऊपर उठकर साथ मिलकर सोचना होगा।

वर्तमान में अमानक पॉलीथिन की बात सामने आ रही है। जिला प्रशासन अगर चाहे तो जिला उद्योग केंद्र के जरिये शासन की विभिन्न योजनाओं के तहत कपड़े और कागज के लिफाफे बैग्स आदि बनाने के काम को प्रोत्साहित कर सकता है। इसके लिये जिला प्रशासन को स्थानीय नागरिकों से संवाद करने की महती जरूरत है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिले में पदस्थ रहे अधिकारियों के द्वारा जिले के प्रबुद्ध नागरिकों से संवादहीनता की स्थिति बनाये रखने के कारण इस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं कि लोग अब जैसा चल रहा है चलने दो की मानसिकता में आ चुके हैं, यह मानसिकता बदलना होगा।

इसके लिये सांसद, विधायकों के साथ ही साथ सियासी दलों के नुमाईंदों को भी अपने एक छद्म आवरण को तोड़कर बाहर निकलना होगा और जिले के लिये बेहतर कैसे किया जाये इस बारे में नागरिकों से चर्चा कर रास्ते खोजने होंगे अन्यथा आने वाले समय में जिले में जुआ सट्टा, अवैध शराब और अन्य गलत काम बहुतायत में होने लगें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

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