इन नतीजों का अर्थ आमूलचूल परिवर्तन

 

 

(बलबीर पुंज)

इस बार 17वें लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का पुनः बहुमत प्राप्त करना और उसके नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की हुई ऐतिहासिक विजय का अर्थ क्या है? स्वतंत्र भारत में विगत 70 वर्षों से भारतीय राजनीति का अधिकांश परिदृश्य विकृत रहा है, जिसमें गरीबी के निर्णायक और वस्तुनिष्ठ उन्मूलन हेतु कार्ययोजना चुनावी घोषणापत्र या फिर जुमले से आगे ही नहीं बढ़ पाई। इसी कड़ी में सेकुलरवाद के नाम पर जहां मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी वर्गों के पोषित-तुष्ट किया जा रहा था, तो हिंदुओं को जाति के आधार पर बांटने का प्रयास किया जा रहा था।

यही नहीं, राष्ट्रहित की अवहेलना कर विश्व के सभी मुस्लिम देशों से अच्छे संबंध बनाए रखना, भारतीय विदेश नीति का मुख्य अंग बन चुका था। क्या पिछले पांच वर्षों में इसमें कोई परिवर्तन आया है? यदि आया है, तो क्या इस परिणाम से स्पष्ट नहीं होता है कि देश के मतदाता भारत का भविष्य सुदृढ़ करने और उपरोक्त विकृति से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ चुका है?

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव का जनादेश डॉ. मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार की अक्षमता और उनके कार्याकाल में हुए अघात भ्रष्टाचार के खिलाफ था। राजग-2 सरकार की उपलब्धियों को लेकर प्रबुद्ध समाज के भीतर वाद-विवाद हो सकता है। किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के लिए तीन तथ्यों का स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। पहला- मोदी सरकार का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त रहा। दूसरा- जम्मू-कश्मीर और पठानकोट के रूप अपवाद को छोड़कर शेष देश में न ही एक भी आतंकवादी हमला हुआ और न ही कोई दंगा। और तीसरा- महंगाई दर को पांच वर्षों में नियंत्रित रखा गया।

जिस प्रकार कांग्रेस की अगुवाई में संप्रगकाल भ्रष्टाचार के सागर में डूबी हुई थी, क्या वैसी स्थिति राजग-2 सरकार में देखनों को मिली? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों ने तथ्यों को विकृत कर राफेल समझौते में भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर राजग सरकार को कलंकित करने का प्रयास किया था। सर्वाेच्च न्यायालय और भारतीय नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक द्वारा इस सौदे को क्लीन चिट मिलने के बाद भी कांग्रेस सहित विपक्ष ने राजनीतिक हित साधने हेतु अपने चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री मोदी को चोर कहकर भी संबोधित किया। लेकिन हुआ क्या?- अतिउत्साही और प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाले राहुल गांधी को सौदे से संबंधित एक मामले में सर्वाेच्च न्यायालय से माफी मांगनी पड़ी।

सितंबर 2016 में गुलाम कश्मीर में आतंकियों पर भारतीय थलसेना की सर्जिकल स्ट्राइक और इस वर्ष पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी शिविरों पर भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक ने स्पष्ट कर दिया कि नया भारत किसी भी प्रकार से देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता से समझौता नहीं करेगा और हर प्रहार का उपयुक्त जवाब देगा। यही कारण है कि इस चुनाव में पहली बार मताधिकार करने वाले लगभग 1.5 करोड़ मतदाताओं के साथ अधिकांश युवाओं ने वंशवादी राजनीति के पैरोकारों के स्थान पर नरेंद्र मोदी पर अधिक विश्वास जताया है।

भले ही चुनाव परिणाम 542 सीटों के घोषित हुए हो। किंतु इस पूरी प्रक्रिया में मेरी विशेष नजर दो सीटों- बिहार की बेगूसराय और मध्यप्रदेश की भोपाल सीट पर केंद्रित रही। मेरा मानना है कि यहां दो व्यक्तियों की नहीं, अपितु दो विचारधाराओं से लड़ाई थी, जिससे देश का भविष्य निर्धारित होना था। भोपाल से विपक्षी उम्मीदवार दिग्विजय सिंह की पराजय हुई है, जो संप्रगकाल में उस कुनबे का हिस्सा थे, जिन्होंने हिंदू पहचान की काट हेतु मिथक हिंदू/भगवा आतंकवाद का विकृत विमर्श बुना था, जिससे देश की सनातन संस्कृति और बहुलतावादी परंपरा को विश्वभर में कलंकित किया गया था। इसी तरह बेगूसराय से विपक्षी उम्मीदवार कन्हैया कुमार की हार हुई है, जिसने भारत तेरे टुकड़े होंगे…इंशा अल्लाह…इंशा अल्लाह… का नारा लगाकर उस विदेशी वामपंथी विचारधारा प्रतिनिधित्व किया था, जिसमें हिंदू विरोधी चिंतन के साथ भारत को एक राष्ट्र नहीं मानने का दर्शन है।

मैं अपने पिछले कॉलम में चर्चा कर चुका हूं कि इस बार के लोकसभा चुनाव का मुख्य संदेश हिंदू पहचान रहा है। स्थिति यह हो गई थी कि जो स्वघोषित सेकुलरिस्ट केवल शाही इमाम से भेंट करने या किसी रोजा-इफ्तार में शामिल होने पर भारतीय संविधान को सुरक्षित मानते थे, उनमें से अधिकांश साधु-संतों के शरण में या फिर मंदिरों में तिलक-चंदन लगाए, पांरपरिक गणवेश में विभिन्न मंदिरों में दर्शन करने का नाटक करते देखे गए है। राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण है।

विरोधी (वैचारिक विरोधियों सहित) दशकों से भाजपा को बनियों की पार्टी और सवर्णों की पार्टी आदि कहकर संबोधित करते आए है और ऐसा आज भी हो रहा है। इसी को आधार बनाकर स्वयंभू सेकुलरिस्टों ने यह स्थापित करने का भी प्रयास किया कि भाजपा दलित-पिछड़ा आरक्षण विरोधी होने के साथ मुस्लिम विरोधी भी है। क्या यह सत्य नहीं कि इस लोकसभा चुनाव के परिणाम ने विरोधियों के इसी मिथक और उससे जनित भ्रम की हवा निकाल दी है?

वास्तव में, राजग के फिर एक बार, मोदी सरकार नारे को मूर्त देने में उन दर्जनों जनकल्याणकारी योजनाओं और नीतियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, जिसने समाज के करोड़ों वंचितों को बिना किसी भेदभाव के सीधा लाभांवित किया है। आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जनआरोग्य योजना के अंतर्गत (3 अप्रैल तक) लक्षित 10 करोड़ लाभार्थियों में से 2.89 करोड़ लोगों को पांच लाख रूपये के मुफ्त चिकित्सा का स्वास्थ्य कार्ड जारी किया है, जिसमें से 18.35 लाख लोगों को देश के विभिन्न अस्पतालों में मुफ्त उपचार भी मिल चुका है। वही ग्रामीण क्षेत्र के पूरी तरह विद्युतीकृत करने के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना में 1.5 करोड़ परिवारों के लिए घर बनाए गए हैं। उज्जवला योजना के अंतर्गत, पांच वर्षों में देश के 714 जिलों में 7 करोड़ से अधिक घरों में मुफ्त एलपीजी रसोई गैस कनेक्शन वितरित कर दिए गए है।

इसी तरह, मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए बिना किसी सामाजिक कठिनाई और संवैधानिक संकट के 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया है। देश में स्वरोजगार बढ़ाने की दिशा में मोदी सरकार की मुद्रा योजना किसी क्रांति से कम नहीं है। राजग-2 शासन में 4.8 करोड़ लोगों को 2.4 लाख करोड़ का कर्ज मिल चुका है, जिनमें से कई स्वनियोजित अन्य लोगों को भी रोजगार देने में सक्षम हो चुके है। ष्प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधिष् के अंतर्गत, दो हेक्टेयर या उससे कम भूमि पर जोत करने वाले 12 करोड़ किसान प्रतिवर्ष तीन किस्तों में 6,000 रूपये की आर्थिक सहायता से लाभांवित हो रहे है।

जनहित नीतियों के साथ मोदी सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों, बंदरगाहों और अन्य आधारभूत ढांचे का विकास भी तीव्र गति से हुआ है, जिसकी प्रशंसा विरोधी भी करते है। पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार ने उन जनकल्याणाकारी योजनाओं को भी पूरा करने का प्रयास किया है, जो पूर्ववर्ती शासनकाल में योजनाबद्ध तो हुई, किंतु नीतिगत पंगुता और भ्रष्टाचार के कारण अधर में लटक गई थी।

यह सब इसलिए संभव हुआ, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पिछले पांच वर्षों में नोटबंदी और जी.एस.टी. जैसी कड़वी आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप बढ़ चुका है। अनुशासित शासन व्यवस्था के कारण राजकोषीय घाटा और मुद्रास्फीति नियंत्रित है। आर्थिक अपराधियों पर वित्तीय कार्रवाई के सख्य कानून और नियमों के कारण देश के बैंक तीन लाख करोड़ की ऋण वसूली करने में नीतिगत रूप से सफल हुए है। जनधन-डीबीटी-आधार जैसी योजनाओं के माध्यम से अनुवृत्ति (सब्सिडी) का कुशल वितरण हो रहा है और पूंजीगत व्यय भी निरंतर बढ़ रहा है।

क्या यह सत्य नहीं कि मोदी सरकार में उपरोक्त कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों को केवल भारतीय के रूप में देखा है, जिसमें न ही किसी व्यक्ति की मजहब की पहचान की गई और न ही उसकी जाति को चिन्हित किया गया है- जैसा अक्सर स्वघोषित सेकुलरिस्टों के शासन में होता था?

वास्तव में, लोकसभा चुनाव के परिणाम से स्पष्ट है कि जनता अब ढोंगी सेकुलरवाद के नाम पर टुकड़े-टुकड़े गैंग, देशविरोधियों और अलगाववादी शक्तियों को बिल्कुल भी सहन नहीं करेगी। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को समझना होगा कि राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंडता, हिंदू अस्मिता, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और सबका साथ, सबका विकास- वह मापदंड बन चुके है, जिससे सत्ता का मार्ग प्रशस्त होता है।

(साई फीचर्स)

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