चंडी का धरा रानी ने फिर रूप …

 

(प्रतिमा अखिलेश)

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!

राजपूत चन्देल घराने की अदभुद बाला की!!

कीर्ति सिंह राजा की पुत्री दुर्गा राजकुमारी!

कालिंजर में पली बढ़ी,सीख कृपाण कटारी!!

वीर भेष में साथ पिता के समरस्थली जाती!

रुद्र भैरवी रूप धरे शत्रु को मार गिरती!!

दसों दिशाओं विदित हुई जब उसकी शौर्य कहानी!

गढ़ मण्डला के राजपुत्र दलपत ने सुनी ज़ुबानी!!

बंधी प्रीत की दूर दूर से ऐसी मधुमयी डोरी!

हुई मन ही मन दलपत की वह रणबांकुरी छोरी!!

छोड़ पिता ने हठ, प्रेम सच्चा उसका स्वीकारा!

कर विवाह हैँसकर दोनो का,मधुमय भागय सँवारा!!

बन मण्डल की महारानी तब दुर्गावती आयी!

ढोल नगाड़े बजे, बजी मधुर शहनाई!!

बना प्रेम से दलपत तब बाहों का दोला!

मुस्काकर अपनी रानी से कुछ यूँ बोला!!

आस तुम्ही हो मर्यादा और लाज हो घर की!

अर्धांगिनी, पार्वती हो इस शंकर की!!

हम दोनो की शक्ति कुल की आन रखेगी!

सदा सदा इस कुल का मान सम्मन रखेगी!!

चलो शपथ लेते हम दोनों उस दीपमाला की!

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुधधारी ज्वाला की!!

किंतु कहाँ स्वीकार नियति को था ये खेला!

पुत्र एक के बाद रानी ने वैधव्य झेला!!

कैसे कटेगा, सोच सोच मन उसका हारा!

इस अनन्त नभ में अकूल ये जीवन सारा!!

शोकाकुल पाषाण मूर्ति बनी वो ज्वाला!

चार वर्षीय पुत्र वीर ने उन्हें सम्भाला!!

बीते बरस बाज बहादुर था ललचाया!

अबला स्त्री जान चढ़ाई करने आया!!

बजी दुंदुभि सुवीरांगना रण में उतरी!

क्षण भर में चहुँ ओर मच गई अफरातफरी!!

मुँह की खाई बाजबहादुर ऐसे हारा!

बरसों देखा नही पलट उसने दोबारा!!

ज्यों पूनम का चांद चमकता नील गगन में!

विजय वीरता के किस्से त्युं घुले पवन में!!

अब चर्चाएं होती उसके बरछी,तीर भाला की!

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!!

अकबर ने सुना आसिफ से, वह रानी जगदम्बा है!

नुमंडमालिनी, उग्रचण्डिका अग्निशिखा अम्बा है!!

सेनापति आधार सिंह महारथी रानी का!

दूर दूर तक नही कोई सानी उस महा ज्ञानी का!!

रण-मद-मत्त तब हुआ बावला अकबर यूँ बौराया!

एक पत्र आसिफ द्वारा झट गढ़ में भिजवाया!!

सेनापति आधार सहित सौंपो अपना खजाना!

नही तो सोने के पिंजरे में चुगती रहोगी दाना!!

शंकाओं ने घेर लिया उलझी दुर्गा उलझन में!

क्या ये दामिनी दमक सकेगी उस कोहरे उस घन में!!

तब बोला आधारसिंह उस धीर वीर वाणी में!

काल निनादी प्रतिध्वनि करने आतुर हूँ रानी मैं!!

टंकारित हो,खड्ग सम्भालो, ढाल तुम्हारी मैं हूँ!

हे महामयी शक्तिरूपा हुंकार तुम्हारी मैं हूँ!!

शीर्ष कसा जुड़ा रानी ने भाल तिलक लगाया!

अग्निरूपा दमक उठी, क्रोधित उसकी काया!!

कसा कटिबन्ध तूणीर सम्भाला दुर्गावती रानी ने!

सम्बल खूब दिया था उसको आधारसिंह ज्ञानी ने!!

आग न बुझने दूंगी अब मैं इस अन्तरजवाला की!

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!!

रवि शशि जो होवें एक तो ये भी सम्भव होगा!

विंध्य रहे मुगलों अधीन ये तो असम्भव होगा!!

आसिफ खां ने हमला बोला हाहाकार था क्षण में!

भंवर समर का चक्रवात सा उठने लगा कण कण में!!

दुर्ग द्वार पर खड़ी हुई सुसज्जित समर भवानी!

साथ लिए सीमित सहस्त्र सुभट सुघड़ सैनानी!!

आसिफ खां को देख रक्त हुंकार दहाड़ा!

उसने भी रोष रानी का क्षण में ताड़ा!!

तब बोली रानी रे सुन तू अच्छा आया!

पतन मुगल का साथ अधम तू अपने लाया!!

तिल तिल काट काट मारूँ रे इस घाटी में!

कहूँ धरन न देहुँ एक पग इस माटी में!!

देख रुधिर की आभा मुख पर अदभुद भारी!

काँप गया आसिफ और उसकी सैन्य सवारी!!

टूट पड़ी सशस्त्र आसिफ के सम्मुख रण में!

मुगलों को लगे दिखने गौणवाना कण कण में!!

हमारे जियत हमारी रानी को न छूना!

होश ठिकाने आये मुगल के ऐसा पड़ा पाला कि,

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!!

कह कह भट मुगलों से भिड़ गए दूना दूना!

हुए पराजित टिक न सके उस तेज़ के आगे,

छोड़ राणभूमि सैनिक सब मुगलों के भागे!!

बरस बाद आसिफ़ ने छल से भेद ये जाने!

कहाँ-कहाँ कैसे रानी के ठौर ठिकाने!!

हुई शरवृष्टि, हुआ आक्रमण हाय दोबारा!

फ़िर से दुर्गावती ने रूप चंडीका धारा!!

पुत्र वीर नारायण मृत्युंजय रथी रहा था!

समर भूमि में आँधी-अंधड़ बनके बहा था!!

क्षणों पूर्व आहत होकर वह गिरा धरा पर!

विचलित नही हुआ वीर किन्तु भी ज़रा पर!!

तत्क्षण रानी ने देखा, ममता-से कंठ लगाया!

चूमा माथा भरे नयन-से घावों को सहलाया!!

तुम जाओ भुवन में संभव हो ये अंतिम भेंट हमारी!

आज लड़ेगी अंतिम दम तक सुनो ये मात तुम्हारी!!

बाद मेरे, अभिमान मेरे तुम महारुद्र-सा लड़ना!

हार कभी स्वीकार न करना भले मृत्यु ही चुनना!!

जाओ सुरक्षित रक्षा करना जन धन की अबला की!

सुनो सुनाऊँ आज कथा आयुध धारी बाला की!!

इतना कह मुड़ गई महामाई फिर धरती थर्राई!

ज्यूँ दानव दल का लहू पीने मुण्डमालिनी आई!!

महाघोर, महासिंहनाद-से रानी ने ललकारा!

ज्वार उठा हो ज्यूँ सिंधु में ज्यूँ अंबर हुंकारा!!

ठन्न-ठनन-ठन्न-ठन्न-ठन्न टंकार उठीं तलवारें!

फूट पड़े थे फव्वारे, उठतीं ख़ूनी बौछारें!!

धेनु-धूलि बेला थी रानी के सैनिक थक हारे!

तब आसिफ़ ने अपने ताज़े नए सैनिक उतारे!!

क्षणोपरांत पीड़ा की बदली ऐसी घिर आई!

बुरी तरह घायल हुई रानी मूर्छा ऐसी आई!!

एक तीर आ लगा कंठ में घाव कर गया गहरा!

पीड़ा और रक्त-से लथ-पथ लाल हुआ था चेहरा!!

तभी दूसरा तीर नेत्र में घुसा दशा दुखदाई!

हुंकारी रानी, सुनो यदि मैं रिपु हाथ में आई!!

कम होगा गौरव माटी का ओ मेरे सेनानी!

मार कृपाण मेरे सीने में ख़त्म करो ये कहानी!!

हा…हा…! क्या कहती हो देवी तुम कुल का गौरव हो!

गोंडवाना वंश की मर्यादा तुम कुल का सौरभ हो!!

थर्राते हैं हाथ हमारे हम ये न कर पाएंगे!

अभी उठाकर दूर यहाँ से तुमको ले जाएंगे!!

बिखर गईं सब टूट के लड़ियाँ उनकी वर्णमाला की!

सुनो सुनाऊं आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!!

दिया दिखाई आते आसिफ़ दुर्गावती तब चौंकी!

खींच कृपाण कटि-से उसने ख़ुद सीने में भोंकी!!

अंतिम नमन किया धरती को मन में गढ़ को निहारा!

माटी चूमी, बुझने लगा था अब आँखों का तारा!!

मूर्तिमति-सी भूतल पर गिर गई वो समर भवानी!

अरिदल ने भी उस दुर्गा की परमशक्ति पहचानी!!

हॄदय विदीर्ण हुआ जाता था रोती थी ये धारती!

चाँद-सितारे मूक ताकते, रजनी आहें भरती!!

पुरवासी लगे बिलखने ठोक-ठोक कर माथा!

लहू-से अपने लिख गई रानी अमर ये गौरव गाथा!!

समिधा बन जल चुकी तो है अब न अनल बुझेगी!

युगों-युगों तक कथा तुम्हारी गढ़ प्राचीर कहेगी!!

तो यही कथा थी कही जो मैंने उस अमृत बाला की!

सुनो सुनाऊं आज कथा आयुध धारी ज्वाला की!!

(साई फीचर्स)

rani durgavati

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