यातायात सिग्नल्स पर क्यों हुआ खर्च!

 

 

(शरद खरे)

एमपी अज़ब है एमपी गज़ब है की तर्ज पर सिवनी की भारतीय जनता पार्टी शासित नगर पालिका परिषद भी अज़ब और गज़ब ही दिख रही है। नगर पालिका की योजनाएं किसके लिये बन रही हैं, यह बात भी विचारणीय है। नगर पालिका के द्वारा जनता के गाढ़े पसीने की कमायी से संचित राजस्व को कहाँ खर्च किया जा रहा है यह जानने का अख्तियार जनता को पूरा-पूरा है।

वर्ष 2013 में राजेश त्रिवेदी के नेत्तृत्व वाली नगर पालिका परिषद के कार्यकाल के अंतिम समय में शहर में छिंदवाड़ा चौक, कचहरी चौक, सर्किट हाऊस चौराहे के साथ ही साथ बाहुबली चौराहे पर लगभग तीस लाख रूपये मूल्य के यातायात सिग्नल्स लगवाये गये थे। इसके पहले नगर पालिका के सामने भी एक यातायात सिग्नल लगाया गया था।

निश्चित तौर पर शहर में यातायात के बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिये व्यस्त चौक-चौराहों पर यातायात सिग्नल्स लगाये जाने आवश्यक थे। विडंबना ही कही जायेगी कि इन यातायात सिग्नल्स को परिवहन विभाग और यातायात पुलिस से विचार विमर्श किये बिना ही लगा दिया गया था।

कचहरी चौक पर लगा यातायात सिग्नल अपने आप में अज़ूबा ही माना जा सकता है। वह इसलिये क्योंकि सिंधिया तिराहे से गाँधी भवन की ओर जाने वाले मार्ग पर इसके लिये कोई संकेतक नहीं लगाये गये हैं। इसके अलावा अन्य मार्गों पर लगे सिग्नल्स की दृश्यता भी काफी कम ही प्रतीत होती है।

वैसे तो पालिका इन यातायात सिग्नल्स को बंद रखने की पक्षधर ही दिखती है, पर चीख पुकार मचने के बाद इन्हें चालू किया जाता है। जैसे-तैसे लोग यातायात सिग्नल्स का पालन करना सीखते हैं, वैसे ही यातायात सिग्नल्स को बंद कर दिया जाता है। इसके साथ ही बाहुबली चौराहे का यातायात सिग्नल भी लंबे अरसे से बंद ही है। यहाँ यह उल्लेखनीय होगा कि इन सभी यातायात सिग्नल्स को लंबे समय बाद आरंभ कराया गया था।

बताते हैं कि जो यातायात सिग्नल महज़ एक-दो माह ही चले थे उनके कंट्रोल पैनल में लगी आईसी खराब हो गयी है। इन आईसी पर से नंबर भी मिटा दिये गये थे। मज़े की बात तो यह है कि जिन भी अधिकारियों के द्वारा इन सिग्नल्स को टेस्टेड ओके करार दिया गया था अब उन पर कार्यवाही करने से पालिका प्रशासन बचता ही नज़र आ रहा है।

ये यातायात सिग्लन्स शहर के निवासियों की सुविधा के लिये संस्थापित कराये गये थे, अब ये सिग्नल्स काम क्यों नहीं कर रहे हैं, यह बात जानने का हक शहर की जनता को है पर इस मामले में नगर पालिका परिषद ने अपना मौन नहीं तोड़ा है, जिससे भ्रम की स्थितियां निर्मित हो रही हैं।

इस मामले में चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ ही साथ भाजपा और काँग्रेस संगठन का मौन आश्चर्य को ही जन्म इसलिये दे रहा है क्योंकि यह शहर वासियों के गाढ़े पसीने की कमायी से संचित राजस्व से जनता की सुविधा के लिये ये संस्थापित करवाये गये थे। संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि इस मामले में वे ही स्वसंज्ञान से कदम उठायें और बिगड़ैल पालिका प्रशासन की मश्कें कसें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *