पालकों की सुनवायी कौन करे!

 

 

(शरद खरे)

जिले में शिक्षा विभाग के अधिकारी किस तरह की झींगा मस्ती कर रहे हैं, यह बात किसी से छुपी नहीं है। जिले में निजि शालाओं के द्वारा पालकों की जेबों को जमकर तराशा जा रहा है। अपने जिगर के टुकड़े के उज्ज्वल भविष्य के सपने मन में संजोने वाले पालक खामोशी से सब कुछ सह रहे हैं। मामला चाहे गणवेश का हो या शालाओं की फीस अथवा पाठ्य पुस्तकों का, हर मामले में पालक लुट ही रहे हैं।

राज्य शासन के निर्देश हैं कि जिलों में कलेक्टर्स के द्वारा निजि विद्यालय (फीस एवं संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम के तहत समिति का गठन किया जाये। यह समिति निजि शालाओं में फीस, शाला में एनसीईआरटी की निर्धारित किताबें, गणवेश, परिवहन आदि मामलों में जाँच करने के लिये पाबंद होगी।

नया शैक्षणिक सत्र अप्रैल से आरंभ हो चुका है। विधिवत यह जून माह से चालू हुआ है। वर्तमान में जुलाई माह का पहला पखवाड़ा बीतने को है। विडंबना ही कही जायेगी कि अब तक इस समिति के द्वारा क्या कार्यवाही की गयी, इस बारे में शिक्षा विभाग पूरी तरह ही मौन नज़र आ रहा है। जिले भर में सीबीएसई की आड़ में सीबीएसई पैटर्न का खेल जमकर चल रहा है, जबकि दोनों में अंतर है।

शिक्षा विभाग के अधिकारी इस बात की राह तक रहे हैं कि कोई पालक आये, उनसे शिकायत करे और तब वे जाँच के लिये समिति बनाकर औपचारिकता पूरी करें। यक्ष प्रश्न यही खड़ा है कि आखिर शिक्षा विभाग के अधिकारियों को वेतन किस बात का मिल रहा है! क्या गणवेश, कॉपी किताबों आदि की दुकानों का औचक निरीक्षण करना उनके कर्त्तव्यों में शामिल नहीं है!

मजे की बात तो यह है कि समाचार साधनों में निजि शालाओं के द्वारा मची हुई लूट को जमकर उजागर किये जाने के बाद भी शिक्षा विभाग के अधिकारी नीरो के मानिंद चैन की बंसी ही बजाते दिख रहे हैं। शिक्षा विभाग के द्वारा अब तक जबकि शैक्षणिक सत्र आरंभ हुए महीना बीतने को आया है तब भी जाँच आरंभ नहीं करवायी गयी है।

साँप निकल गया और लकीर पीटते रहे गये की तर्ज पर अब अगर शिक्षा विभाग के द्वारा समिति बनाकर जाँच भी करवायी जाती है तो जिन पालकों को अपने-अपने बच्चों के लिये गणवेश और पाठ्य पुस्तकें क्रय करना थीं उनके द्वारा तो कर ली गयी हैं। अब शिक्षा विभाग के अधिकारियों के हाथ क्या लगेगा? महज़ औपचारिकता ही पूरी की जा सकेगी।

इस मामले में विपक्ष में बैठी भाजपा और सत्तारूढ़ काँग्रेस के छात्र संगठनों ने भी मौन ही साधा हुआ है। पालक मन ही मन दोनों ही सियासी दलों को अगर कोस रहे हों तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि वे इस लापरवाही के लिये दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्यवाही कर नज़ीर अवश्य पेश करें ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही की गुंजाईश न रह जाये।

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