बाहरी चिकित्सकों पर मेहरबानी क्यों!

 

 

(शरद खरे)

जिले में स्वास्थ्य विभाग की लीला अपरंपार ही दिख रही है। अपनों पर सितम गैरों पर करम की तर्ज पर सिवनी में रहने वाले चिकित्सकों को नियम कायदों का भय बताया जा रहा है तो दूसरी ओर नागपुर एवं अन्य जिलों से आकर सिवनी में सरेआम प्रचार कर चिकित्सा करने वाले चिकित्सकों पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय पूरी तरह मेहरबान ही नज़र आ रहा है।

दो सालों में सीएमएचओ कार्यालय के द्वारा लगभग आधा दर्ज़न बार चिकित्सकों से उनकी डिग्री आदि को जमा करवाये जाने के लिये जनसंपर्क कार्यालय के जरिये खबरों का प्रकाशन करवाया जा चुका है। इसके बाद भी अब तक एक भी चिकित्सक के खिलाफ कार्यवाही न होना आखिर किस ओर इशारा कर रहा है!

बताते हैं कि जिले के 45 चिकित्सकों को उनके द्वारा वांछित जानकारी नहीं दिये जाने पर दो माह के बाद नोटिस जारी किया गया है, जबकि दस्तावेज जमा करवाये जाने के लिये महज़ 15 दिन का समय ही दिया गया था। अगर दो माह बाद नोटिस जारी किया जाना था तो 15 दिन की मियाद की क्या जरूरत थी। इस नोटिस को जारी करने के पूर्व सीएमएचओ के द्वारा अगर स्वयं के द्वारा पहले जारी किये गये आदेश को पढ़ लिया जाता तो स्थिति कुछ और ही निर्मित होती।

बहरहाल, सिवनी शहर में सरकारी स्तर पर चिकित्सकों की कमी किसी से छुपी नहीं है। जिला अस्पताल में चिकित्सकों का टोटा है। अस्पताल में पदस्थ चिकित्सकों के द्वारा हर साल एक शपथ पत्र दिया जाता है, जिसमें उनके द्वारा कहा जाता है कि उनके द्वारा अपने निवास के अलावा अन्य किसी भी स्थान पर सशुल्क चिकित्सा नहीं की जायेगी। इसके बाद भी शहर में न जाने कितने स्थानों पर सरकारी चिकित्सकों के द्वारा सरेआम चिकित्सा की जा रही है। याद पड़ता है कि पूर्व में तत्कालीन प्रभारी सीएमएचओ डॉ.चौहान के द्वारा इस तरह के क्लीनिक्स में ताला भी जड़ दिया गया था।

आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि नागपुर सहित अन्य जिलों के चिकित्सक सिवनी में आकर किस हक या अनुमति से चिकित्सा कर रहे हैं! क्या इन चिकित्सकों के द्वारा मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग से स्थायी अथवा अस्थायी पंजीयन करवाया जाकर सीएमएचओ कार्यालय से अनुमति ली गयी है! अगर पंजीयन कराकर अनुमति ली गयी है तो कोई बात नहीं पर अगर नहीं ली गयी है तो क्या इन चिकित्सकों की दुकानों को वैध माना जायेगा!

कुल मिलाकर हालात देखकर यही प्रतीत होता है कि स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों के द्वारा नियम कायदों को अपनी सुविधा के हिसाब से उसकी व्याख्या की जा रही है। जिला प्रशासन के द्वारा किसी न किसी अधिकारी को स्वास्थ्य विभाग का प्रभारी अधिकारी (ओआईसी) बनाया ही होगा। इसके बाद भी ओआईसी की नज़रों से यह विसंगति कैसे छुपी हुई है। इस मामले में चुने हुए प्रतिनिधियों का मौन भी आश्चर्य जनक ही माना जायेगा।

संवेदनशील जिलाधिकारी प्रवीण सिंह का ध्यान इस समय स्वास्थ्य सुविधाओं को पटरी पर लाने की ओर दिख रहा है, इस लिहाज़ से उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे ही इस मामले में स्वसंज्ञान से कोई कार्यवाही को अंजाम जरूर देंगे।