आदर्श न्यायालय में तेज न्याय

 

 

जल्दी न्याय करने की बजाय पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था याचिकाकर्ताओं और आरोपियों की पीड़ा को एक तरह से लंबा खींचती है। दोनों पक्षों की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की भावना अनुपस्थित है, जबकि विकसित देशों में कानूनी सुरक्षा को पूर्णरूप से सुरक्षित मानकर चला जाता है।

देश की अदालतों में करीब 20 लाख मामले लंबित हैं। हाल ही में मॉडल क्रिमिनल ट्रायल कोर्ट स्थापित किए गए हैं, ताकि न्याय प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। कुछ ही दिन पहले जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की 110 आदर्श न्यायालयों ने हत्या और मादक द्रव्य से जुड़े 5,647 लंबित मामलों में ढाई महीने में ही फैसले सुना दिए। इस उपलब्धि से उत्साह बढ़ा है, अब हर जिले में मॉडल ट्रायल मजिस्ट्रेट कोर्ट और मॉडल सिविल अपील कोर्ट की स्थापना का प्रस्ताव है।

कोई स्थगन स्वीकार नहीं होगा और सुनवाई प्रक्रिया पूरी होने के तीन दिनों के अंदर फैसला सुना दिया जाएगा। फौजदारी मामलों को सामान्य न्यायालय जहां चार से पांच वर्षों में निपटाते हैं, वहीं आदर्श न्यायालयों में यह प्रक्रिया तीन महीने में पूरी हो जा रही है। इस नई पहल में क्षमता है कि पूरी न्याय व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव हो जाए। यह हर प्रकार से यथोचित होगा कि दीवानी मामलों को भी धीरे-धीरे आदर्श अदालतों के दायरे में लाया जाए।

पंजाब की निचली अदालतों में किए गए अध्ययन के अनुसार, दीवानी मामलों में औसतन 58 सुनवाइयों की जरूरत पड़ती है और फैसला आने में 37 महीने लग जाते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए याचिका लगाना बहुत महंगा साबित होता है। ऐसे में, तेज सुनवाई स्वाभाविक समाधान है। विधि समाज के कुछ हलकों में आदर्श न्यायालयों का विरोध हो रहा है। कुछ जजों को भी आपत्ति है। हालांकि यह आश्चर्यजनक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को भी इस सोच और तरीके को बदलना होगा, तभी दुश्चक्र टूटेगा। करीब दो वर्ष पहले स्वयं सुप्रीम कोर्ट के एक अध्ययन में पता चला था कि किसी मामले को सुलझने में 25 वर्ष तक लग सकते हैं। सुधार हो, पर ध्यान रहे कि न्याय लक्ष्य है, मुकदमों का त्वरित निपटारा नहीं। (डॉन, पाकिस्तान से साभार)

(साई फीचर्स)

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