आध्यात्मिक गुरू की होती है आवश्यकता

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। गौ, गीता, गंगा महामंच द्वारा आयोजित गुरूपूजन कार्यक्रम में पं रविकान्त पाण्डेय ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में एक आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता होती है।

आपने कहा कि गुरु का काम होता है परमात्मा से सम्बन्ध स्थापित करवा देना। हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं- पूजा पाठ, दान पुण्य, व्रत उपवास, पढाई लिखाई या अपनी आजीविका का प्रयास, यह तब तक पूरी की पूरी सफलता नहीं देता जब तक की जीवन में कोई आध्यात्मिक गुरु न हो, क्योंकि हम जो भी करते हैं उसे भगवान तक पहुँचाने का काम गुरु ही करते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि हमारा मन जो सांसारिक गतिविधियों की ओर भाग रहा है उस मन को परमात्मा की ओर मोड़ देना गुरु का काम होता है। गुरु को मन का डाक्टर कहा गया है। जिस तरह से एक कुशल चिकित्सक शारीरिक रोगों को दूर करके हमें स्वस्थ बना देता है, वैसे ही एक योग्य गुरु हमारी मानसिक बीमारियों को दूर करके हमारे मन को स्वस्थ बना देता है। ये मानसिक बीमारिया हैं तनाव, कुंठा, अवसाद, निराशा आदि हैं।

आपने कहा कि आज समाज में ये बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं। इसका मूल कारण यही है की हमारे जीवन में कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं है अगर है भी तो योग्य नहीं है। आज मनुष्य स्वयं को सर्व समर्थ समझने लगा है परिणामतः भौतिक सुख के साधन तो हम पा जा रहे हैं, परन्तु वह हमें चैन देने की बजाय बेचैन कर रहे हैं। हंसी-ख़ुशी, शांति, यह सब हमसे दूर हो रहे हैं, हंसने के लिये हमें लाफिंग क्लब जाना पड़ रहा है. मानव जीवन के तमाम लौकिक और पारलौकिक सुख गुरु-दया पर ही आश्रित होते हैं।

महामंच के अध्यक्ष पं रविकान्त पाण्डेय ने कहा कि गुरु की आवश्यकता उस उम्र से होती है जबसे बच्चे को समझ आती है। क्योंकि गुरु का काम होता है जीवन का विकास करना और विकास की सही उम्र है बचपन। गुरु अपने शिष्य के व्यक्तित्व के सर्वोत्तम पक्ष को उजागर करते हैं। लोग समझते हैं की जब सारे कामों से बरी हो जाँय तब गुरु बनायें कितनी बड़ी नादानी है। संसार में आये हैं तो सांसारिक सुख भोगना हमारा अधिकार है. लौकिक सुख गुरु की दया से ही प्राप्त होते हैं. वरना समझ और ज्ञान के अभाव में भौतिक सुख हम नहीं भोगते, वह ही हमें भोगने लगते हैं। भोगी की तरह सुख को भोगना और स्वयं भुक्त हो जाना दो पृथक स्थितियां हैं। कहा गया है गुरु की दया ही लौकिक एवं परलौकिक चरमोत्कर्ष का रहस्य है। अपने शिष्य भाव के जागरण हेतु सदैव यह बात ध्यान में रखनी चाहिये. अतः बचपन से ही गुरु की आवश्यकता है।