पाकिस्तान की उम्मीद

 

विश्व कप क्रिकेट में इंग्लैंड के हाथों भारत की हार के बाद बहस तेज हो गई। इजबेस्टन के मैदान पर हुए इस मैच में क्या भारत रनों का पीछा करने का इच्छुक नहीं था? गौर करने की बात है, एक समय यह मैच भारत के कब्जे में दिख रहा था। सौरव गांगुली और संजय मांजरेकर सहित करीब-करीब 15 पूर्व भारतीय क्रिकेटरों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। 338 रनों का पीछा करते हुए भारतीय खिलाड़ियों ने बहुत ढीला रवैया दिखाया। विराट कोहली और उनकी टीम के बाकी सदस्य जीत के लिए जद्दोजहद करते भी नहीं दिखे।

भारतीय सलामी बल्लेबाजों ने भी रन बनाने में कछुआ गति दिखाई, उसकी सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रिया हुई। महेंद्र सिंह धौनी और केदार जाधव की भी अपनी शैली से अलग हटकर रक्षात्मक खेलने की खूब निंदा हुई। इंग्लैंड के खिलाफ मैच से पहले टीम इंडिया विश्व कप की अकेली अपराजित टीम थी। आलोचक भी इस टीम के समर्थन में थे, लेकिन आक्रामकता और जीतने की इच्छाशक्ति की जगह जल्दीबाजी ने ले ली। मैच के अटपटे अंत ने उन पाकिस्तानी दर्शकों को निराश कर दिया, जो भारत के पक्षधर होने का दुर्लभ उदाहरण पेश कर रहे थे। पाकिस्तानियों को लग रहा था कि इंग्लैंड को हराकर भारतीय टीम पाकिस्तान के सेमीफाइनल में जाने की संभावनाओं को मजबूत करेगी। अब वे न्यूजीलैंड से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह इंग्लैंड को हराएगा।

जीतना और हारना खेल का हिस्सा है, हालांकि कभी-कभार ऐसा होता है कि किसी की जीत को विरोधी खेमे द्वारा खुले दिल से स्वीकार किया जाता है। गलाकाट व्यावसायिकता और मैच फिक्सिंग जैसे कारकों ने विश्लेषकों को सोचने पर विवश किया है। खासकर किसी अनपेक्षित जीत या अचंभित करने वाली हार से चर्चा को बल मिला है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल को सुनिश्चित करना चाहिए कि बाहरी प्रभावों का असर किसी मैच पर न पड़े। जहां भी लगे कि खेल में कुछ अस्वाभाविक घटित हुआ है, तो उसकी जरूर जांच होनी चाहिए, ताकि खेल में सज्जनता भाव कायम रहे। (डॉन, पाकिस्तान से साभार)

(साई फीचर्स)

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