आखिर क्यों हो गये अधिकारी बेलगाम!

 

 

(शरद खरे)

जिले में अफसरशाही पूरी तरह बेलगाम ही दिख रही है। किसी भी अधिकारी के द्वारा जवाबदेही के साथ शायद ही काम किया जा रहा हो। यह अराजक स्थिति रातों रात शायद नहीं बनी है। लगातार ही प्रशासनिक उदासीनता के कारण इस तरह की स्थिति निर्मित हो गयी है।

इस तरह की अराजक स्थिति बनने के पीछे कुछ ठोस वजहें लग रहीं हैं। अव्वल तो यह कि सिवनी का कोई भी विधायक लगभग डेढ़ दशक से मंत्री नहीं है। प्रभारी मंत्रियों के द्वारा भी सिवनी जिले को अपनी प्राथमिकता की सूची में निचली पायदान पर रखा गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह समझ में आ रहा है कि विपक्ष में बैठी भाजपा के द्वारा स्थानीय मामलों में चीत्कार करना मानो बंद ही कर दिया गया है।

इक्कीसवीं सदी के पहले तक एच.मिश्रा, ए.डी. मोहले, एम.पी. राजन, प्रवेश शर्मा, मोहम्मद सुलेमान के बाद इस सदी में पी.नरहरि एवं अजीत कुमार ही ऐसे जिलाधिकारी हुए हैं जिनके द्वारा प्रशासनिक कसावट को अंजाम दिया गया था। इनके कार्यकाल में जिले में प्रशासनिक मशीनरी चुस्त दुरूस्त हुआ करती थी।

वर्तमान में अफसरशाही के बेलगाम घोड़े जिस तरह से दौड़ रहे हैं उसे देखते हुए यही प्रतीत हो रहा है कि अधिकारियों को किसी का भय नहीं रह गया है। सब कुछ मनमर्जी से ही चलता दिख रहा है। सरकारी नियम कायदे सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह गये हैं।

कमोबेश हर तहसील, विकास खण्ड में किसान परेशान हैं। नकली बीज खाद की शिकायतें मिल रही हैं। पालक अपने जिगर के टुकड़ों के लिये महंगी कॉपी किताब, गणवेश खरीदने पर मजबूर हैं। ट्यूशन का व्यवसाय फल फूल रहा है। जगह-जगह अवैध शराब बिक रही है।

नयी थोक सब्जी मण्डी अपनी अव्यवस्था पर कराह रही है। जिला मुख्यालय की मॉडल रोड और नवीन जलावर्धन योजना पूरी नहीं हो पायी है। मच्छरों के शमन के उपाय भी न के बराबर ही हैं। स्थान-स्थान पर गंदगी पसरी पड़ी है। आवारा मवेशी, कुत्ते, सूअर एवं अन्य जानवर लोगों का जीना मुहाल किये हुए हैं।

सड़कों के धुर्रे उड़ रहे हैं। फोरलेन पर ट्रामा केयर यूनिट का अता पता नहीं है। जिला अस्पताल में चार साल पहले बना ट्रामा केयर यूनिट का भवन अभी भी शोभा की सुपारी बना हुआ है। लखनादौन के अस्पताल में बीते दिनों जो हुआ वह किसी से छुपा नहीं है। कमोबेश हर अस्पताल गंदगी से अटा पड़ा ही नज़र आता है।

कुल मिलाकर जिले में पदस्थ अधिकारियों के द्वारा जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को साहब.. यह बात नहीं है, साहब.. मामला ऐसा नहीं है, साहब.. उनकी आदत तो जबरन में तिल का ताड़ बनाने की है, साहब.. हम इस मामले की जाँच करवाते हैं . . . आदि जुमले गढ़कर संतुष्ट कर दिया जाता है। जैसे ही मामला शांत होता है वैसे ही इसे ठण्डे बस्ते के हवाले ही कर दिया जाता है। पता नहीं साहबों का सूचना तंत्र कितना कमजोर है कि वे चाहकर भी सच्चाई पता नहीं कर पाते हैं, या सच्चाई जानते हुए भी किसी प्रकार का कठोर कदम उठाने की जहमत . . .!

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