जब मुलायम ने अफसरों की रणनीति पलट दी

 

 

(राजकेश्वर सिंह)

बात 1990 की है। तब उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार थी। मुलायम सिंह यादव पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे और विधायकों के ठीक-ठाक समर्थन के बावजूद मुलायम के मुकाबले कमजोर पड़े चौधरी अजित सिंह मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। उस समय तक उत्तर प्रदेश में, खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान नेता के रूप में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का दबदबा कायम हो चुका था। वैसे तो किसानों की मांगों को लेकर टिकैत सन 1980 के दशक से ही प्रदेश की सरकारों से टकराने लगे थे। भारतीय किसान यूनियन के इस नेता को नजरअंदाज करना सरकारों के लिए आसान नहीं रह गया था। 80 के दशक में ही किसानों को बिजली के दाम के सवाल पर उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को मुजफ्फरनगर में अपने गांव की एक किसान पंचायत में बोलने तक का मौका नहीं दिया था। शासन-प्रशासन और सरकारों से सीधे टकराव के दुस्साहसी चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के सवाल पर आखिर मुलायम सिंह यादव से भी दो-दो हाथ करने का फैसला कर लिया। किसानों से जुड़ी कुछ मांगों पर अफसरों के साथ कई दौर की बातचीत नाकाम हो जाने पर टिकैत ने जुलाई 1990 में लखनऊ में विधानसभा के सामने हजारों की संख्या में किसानों को लाकर धरना देने का ऐलान कर दिया।

टिकैत के इस ऐलान से मुलायम सिंह की सरकार के भी माथे पर पसीने आने लगे। तारीख नजदीक आती देख मुख्यमंत्री के तत्कालीन सचिव नृपेंद्र मिश्र (जो अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव हैं) ने टिकैत के धरने से निपटने के लिए प्रदेश के तब के पुलिस महानिदेशक, प्रमुख सचिव गृह व दूसरे अधिकारियों के साथ रणनीति बनाई। लेकिन जब उस रणनीति के बारे में अवगत कराने के लिए मुलायम सिंह के पास पहुंचे तो मुलायम सिंह ने अफसरों की रणनीति की हवा निकाल दी। मुलायम ने अफसरों से दो टूक कहा कि यदि टिकैत की अगुवाई में हजारों किसानों ने चारबाग से हजरतगंज आने वाले विधानसभा मार्ग को जाम कर दिया तो कौन सी पुलिस, पीएसी किसानों को संभाल लेगी? हजारों किसानों के सड़कों पर ही खाने-पीने और शौच से लखनऊ के लोगों की मुश्किल बढ़ जाएगी। फिर तो किसानों को बगैर उनकी शर्तें माने लखनऊ से हटा पाना ही मुश्किल हो जाएगा। इसलिए टिकैत को लखनऊ पहुंचने ही नहीं देना है। मुख्यमंत्री के इस इशारे पर टिकैत को लखनऊ पहुंचने से पहले बरेली में ही गिरफ्तार कर लिया गया।

मायावती 2008 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। बिजनौर में किसानों की एक पंचायत में टिकैत ने उनके प्रति अपमानजनक टिप्पणी कर दी। फिर तो मायावती सरकार सख्त हो गई। प्रदेश शासन के आला अफसरों ने टिकैत की गिरफ्तारी की योजना बना ली। यह भी तय हो गया कि रात में भारी संख्या में पुलिस, पीएसी व अन्य बलों को लगाकर टिकैत को गिरफ्तार कर लिया जाए। उस समय शशांक शेखर सिंह यूपी के कैबिनेट सचिव थे। वह भी टिकैत के गृह जनपद से ही थे और उनकी बिरादरी से आते थे। शेखर और उनके एक करीबी प्रमुख सचिव इस मसले को बहुत संभालकर निपटाना चाहते थे। इन अफसरों का तर्क था कि रात में पुलिस व दूसरी फोर्स की कार्रवाई के बाद जाटों के प्रभाव वाले पश्चिमी जिलों में हिंसक आंदोलन शुरू हो गए तो हालात पर काबू पाना और भी मुश्किल हो जाएगा और सरकार से जवाब देते नहीं बनेगा। जबकि एक अन्य अफसर जो मुख्यमंत्री के सचिवालय में ही तैनात थे, वह हर हाल में गिरफ्तारी के पक्ष में थे। कई दौर की बात के बाद रात तक एक राय नहीं बनी तो तय हुआ कि शीर्ष अफसर रात का खाना खाकर फिर बैठक करेंगे। दोबारा हुई बैठक में आधी रात के बाद शशांक शेखर की कोशिशों से तय हो पाया कि टिकैत इस मामले में खुद पुलिस के सामने सरेंडर करेंगे। वैसा ही हुआ। बाद में टिकैत को कोर्ट से जमानत भी मिल गई और मामला ठंडा हो गया।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों में मुलायम सिंह यादव एक ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिनके मीडिया के लोगों से ज्यादा अच्छे संबंध रहे हैं। पहली व दूसरी बार जब वे मुख्यमंत्री थे, तब उनसे मिलना-मिलाना बहुत मुश्किल नहीं था। उनकी पहली सरकार जा चुकी थी। जनता दल टूट चुका था। फिर से चुनाव होने थे। एक शाम मुलायम के घर पर कुछ चुनिंदा पत्रकारों की बैठकी थी। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा चल पड़ी। मुलायम ने भांपना चाहा कि उनकी पार्टी की क्या स्थिति रहेगी। एक पत्रकार जो राजपूत बिरादरी से थे, उन्होंने कहा- बहुत बेहतर स्थितियों में भी आपकी 50-60 सीटें ही आ सकती हैं। मुलायम सिंह को यह बात अच्छी नहीं लगी। बोले- तुम तो वीपी सिंह (जनता दल के जनक विश्वनाथ प्रताप सिंह) का पक्ष लेते हो, इसलिए ऐसा कह रहे हो। मेरा मुंह मत खुलवाओ, मुझे सब पता है। अभी त्रिपाठी जी (किस त्रिपाठी की तरफ उनका इशारा था, यह पता नहीं) आए थे। बता रहे थे कि मेरी पार्टी की डेढ़ सौ तक सीटें आ सकती हैं। चुनाव के नतीजे आए तो मुलायम की पार्टी की लगभग तीन दर्जन सीटें आई थीं। यह किसी से छिपा नहीं कि मुलायम सिंह यादव व वीपी सिंह के राजनीतिक रिश्ते कभी बहुत अच्छे नहीं रहे। मुझे दिए एक साक्षात्कार में मुलायम ने प्रदेश में जनता दल की सरकार रहते तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह पर खुद के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया था। दरअसल उन दिनों मुलायम को हमेशा यह लगता रहता था कि वीपी सिंह उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं देखना चाहते। हालांकि इस मामले में मुलायम के कान भरने में दिल्ली में कार्यरत उनके एक कथित शुभचिंतक पत्रकार की बड़ी भूमिका को लेकर भी चर्चा होती रहती थी।

(साई फीचर्स)