खेल, खेल में ब्रह्मांड अपना मैदान!

 

 

 

(हरी शंकर व्योस)

वर्ष 2019 मानव के देवता बनने का पचासवां साल है। हां, चांद पर इंसान का पचास साल पहले कदम रखना उसका सचमुच देवतुल्य काम था। अपनी सृष्टि रचने की और बढ़ने का वह पहला इंसानी कदम था। उस दिन मानव ने चांद-तारों के बीच कहीं बैठे हुए अपने-अपने भगवानजी को मैसेज दिया था कि वह भी अपनी सृष्टि रचने की और कदम टिका चुका है। 20 जुलाई 1969 को जब चंद्रमा पर, अपोलो 11 उतरा था, चांद की मिट्टी पर नील आर्मस्ट्रांग ने कदम रखा था तो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने ठीक कहा कि यह सप्ताह विश्व रचना बाद के इतिहास में सर्वाधिक महान है। वह अविस्मरणीय घड़ी थी।

उस सप्ताह की पचासवीं वर्षगांठ अभी है। पर कितनी पुरानी बात लगती है? क्या वह उपलब्धि आज ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की तरह गुजरे जमाने जैसी नहीं लगती है? (जबकि हम भारतीय पचास साल बाद एक चंद्रयान को भेज ऐसे उछलने की तैयारी में हैं, जैसे चंद्रमा हमसे फतह होगा। मतलब अमेरिका की एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म पर बॉलीवुड का रंगीन फिल्म बना कर भारतीयों को मूर्ख बनाना.) बावजूद इसके राइटर बंधुओं की बदौलत हवा में उड़ने का अनुभव भी अमिटता लिए हुए है तो चांद पर कदम का क्षण तो खैर ब्रह्मांड को भेदने वाली अपनी देव उपलब्धि है ही।

इंसान का देव रूप ही है जो वह आगे की धुन में, नया बनाने, नए कदम उठाने में रमा रहता है। तभी आश्चर्य नहीं जो अविस्मरणीय पचास साल पुरानी चांद यात्रा को दुनिया कुछ ऐसे याद कर रही है जैसे वह सामान्य बात हो! निश्चित ही भूली-बिसरी बातों, यादों में पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म को याद करते हुए यह सप्ताह दुनिया भर में धूमधाम से मनाया जाएगा। कई फिल्में, डाक्युमेंटरी, चर्चा, परिचर्चा में वे लोग, वे कंपनियां चांद-तारों के किस्से-कहानियां बतला रहे हैं, जिन्होने अंतरिक्ष में पर्यटन का अपना एक बिजनेस मॉडल भी बना रखा है। 20 जुलाई 1969 से 20 जुलाई 2019 के पचास साल का फर्क ब्रह्मांड का व्यवसायी धंधे में बदला हुआ होना भी है। अमेरिका का नासा अपनी जगह अपना काम कर रहा है। वह देर सबेर बतलाने वाला है कि ब्रह्मांड के किस ग्रह या उपग्रह में जल-पानी और जीव बसता है। चांद पर कदम के पचासवें साल की याद में डोनाल्ड ट्रंप भी नासा से चांद पर वापिस यात्री भिजवाने के मूड में हैं। चीन, रूस, यूरोपीय देश और कई कारोबारी कंपनियां भी इस मौके पर अपने-अपने हिसाब से अपना मिशन या तो बनाए हुए हैं या बनाएंगे।

असली पते की बात यह है कि विज्ञान-तकनीक ने पिछले पचास सालों में इंसान को बिना ज्यादा भेजे भी ब्रह्मांड को बहुत दूर तक, बहुत भारी-गहरा भेद डाला है। मशीनी रोबो से इंसान कई ग्रहों, खास कर मंगल पर बहुत चढ़ाई कर चुका है तो पृथ्वी से ब्रह्मांड को भेदती केपलर, हबल जैसी दूरबीनों ने एस्ट्रोनॉमी का कायाकल्प करा दिया है। जाहिर है खोजबीन के लिए अंतऱिक्ष में इंसान के जाने की जरूरत नहीं रही। तभी 1968 से 1972 के बीच 24 यात्री चंद्रमा की परिक्रमा में भेजे गए थे। वह सिलसिला 1972 के बाद घटता गया। अब मंगल तक को ले कर यह सोच है कि पृथ्वी से बैठे-बैठे ही उसे इंसान के रहने लायक बनाया जा सकता है।

दि न्यूयार्क टाइम्स में डेनिस ऑवरबाय ने पचासवीं वर्षगांठ पर लिखते हुए एक दिलचस्प सवाल किया है कि वक्त क्या फिर स्पेस शीप से खेल खेलने का है? वे कहते है हमने (अमेरिका ने) रूस को हरा क्या दिया हमने चंद्रमा को भूला दिया। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑरबिटिंग स्टेशन, अड्डा आदि कुछ भी नहीं बनाया। उसे भूतिया बना कर छोड़ा हुआ है।

मतलब शीत युद्ध, तत्कालीन सोवियत संघ से अमेरिका की खुन्नस के वक्त रूस ने स्पूतनिक यान (1957) और 1961 में पहला इंसान यूरी गैगरिन को अंतरिक्ष में भेजा नहीं कि अमेरिका को मिर्च लगी। उसे पछ़ाड़ने की प्रतिस्पर्धा में अमेरिका मैदान में उतरा और नतीजे में चंद्रमा पर नील ऑर्मस्ट्रांग ने अमेरिकी झंडा फहराया। वह रूस और अमेरिका की परस्पर खुन्नस का खेल था, जिसमें जीता इंसान। चंद्रमा पर मानव का देवतुल्य उतरना! कितनी गजब बात है यह। लेखक ने इस सिलसिले में विज्ञान लेखक आर्थर क्लार्क की 1946 में एक चीनी दार्शनिक के बताए इस फलसफे का जिक्र किया कि ज्ञान की खोज खेल, खेल में होती है!

क्या गजब और सही बात कि प्रतिस्पर्धा, होड़, खेल और उसकी जिंदादिली ही मानव के विकास की वजह है। इसी का हवाला देते हुए क्लार्क ने फिर लिखा- ज्ञान यदि खेल का रूप है तो बहुत अच्छे! तब आओ खेलते हैं स्पेस शीप का खेल!

वहीं हुआ। दूसरे महायुद्व के बाद सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध के घनघोर खेल में कुछ राकेट इंजीनियरों, विज्ञान की कल्पनाओं में उड़ने वाले भविष्यवक्ताओं, सैनिक-राजनीतिक धुनी नेताओं ने स्पेस, ब्रह्मांड को ले कर प्रतिस्पर्धा का ऐसा खेल खेला, जिसने मानवता को प्रक्षेपास्त्र, अंतरिक्ष यान आदि बहुत कुछ दे डाला। उस खेल ने ही इंसान को देवता बनाया। चांद पर मानव का कदम पड़ा। अमेरिका (मतलब उद्यम-विचार-निज आजादी में ज्ञान-विज्ञान- बुद्धि विस्फोट के मनचाहे प्रयोगों का भरपूर मुक्त पूंजीवाद) विजयी हुआ।

डेनिस ऑवरबाय ने फिर इस खेल से अमेरिका की आगे की उपलब्धि का ब्योरा देते हुए बताया कि सोवियत संघ से वह होड़ खत्म हुई तब भी उसके कारण अमेरिका में तकनीक, कारोबार, खोज की नई उर्वरता, नए झरने फूटे। उसी का एक रूप सिलिकॉन घाटी भी है। अमेरिकी सरकार ने जिद्द में, सोवियत संघ से प्रतिस्पर्धा में जबरदस्ती खोज-विकास के अपोलो प्रोग्राम चलवाए और वह खेल खत्म हुआ तो उसके बाद उसके असर में नई पीढ़ी में यह धुन बनी कि आगे अंतरिक्ष अपनी विरासत है।

तभी अंतरिक्ष का खेल आज यूरोप और अमेरिका के निज उद्यम, खरबपतियों का शगल है। इंजीनियर इलॉन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी, अमेजन के संस्थापन जेफ बिजोस की ब्ल्यू ऑरिजन, वर्जिन एयरलाइंस के रिचर्ड ब्रासनेन वह सब कर रहे हैं, जिससे 35 हजार डॉलर का टिकट ले कर लोग अंतरिक्ष यात्रा करें या मंगल ग्रह पर कॉलोनी, बस्ती बसाएं।

सो, पचास साल पहले नील ऑर्मस्ट्रांग का चंद्रमा पर रखा कदम ब्रह्मांड की अनंत संभावनाओं वाले मानव खेल में परिवर्तित है। यदि सोवियत संघ-अमेरिका के दो विचार, आइडिया में खेल की प्रतिस्पर्धा नहीं बनती तो न हम अपनी पृथ्वी को दूसरे ग्रह से देखते कि कैसी पृथ्वी है, और पृथ्वी पर्यावरण याकि अस्तित्व के कैसे-कैसे संकट लिए हुए है और न यह विचार मूर्त रूप लेते हुए आगे बढ़ता कि यदि कभी पृथ्वी का अस्तित्व मिटा तो हम इंसान दूसरे ग्रह, उपग्रह में जा बसेंगे!

(साई फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *