कोरबा की तरह नवाचार हो तो बात बने!

 

 

(लिमटी खरे)

मोहम्मद पाशा राजन, एम.मोहनराव, मोहम्मद सुलेमान, डॉ.जी.के. सारस्वत, भरत यादव, धनराजू एस. फिर गोपाल चंद्र डाड के कार्यकाल में जिला अस्पताल को चमकाने के प्रयास किये गये। इनमें से मोहम्मद पाशा राजन, मोहम्मद सुलेमान का कार्यकाल सफल माना जा सकता है क्योंकि इनके कार्यकाल में जिला अस्पताल की दशा और दिशा दोनों ही काफी हद तक सुधरी थी। मोहम्मद सुलेमान की दूरदृष्टि थी कि उनके द्वारा जिलाधिकारी रहते हुए रोगी कल्याण समिति को आर्थिक रूप से समृद्ध करने के लिये रोगी कल्याण समिति का एक कॉम्प्लेक्स बनवाया गया था जिसमें 75 छोटी और 45 बड़ी इस तरह कुल 110 दुकानें हैं। इन दुकानों की पगड़ी भी लाखों रूपये एकत्र की गयी थी।

इसके अलावा लगभग उन्नीस सालों से इन 110 दुकानों का किराया भी रोगी कल्याण समिति की मद में जमा करवाया जा रहा है। रोगी कल्याण समिति की दुकानों में व्यापार करने वाले दुकानदारों का कहना है कि जबसे वे इन दुकानों पर काबिज हुए हैं, उसके बाद से रोगी कल्याण समिति के द्वारा एक धेला भी इन दुकानों के संधारण में खर्च नहीं किया गया है। यहाँ तक कि 110 दुकानों के लिये एक अदद प्रसाधन तक नहीं है। यहाँ छत पर जाने के ग्रिल टूटे पड़े हैं। इनकी छत और सीढ़ियों पर शराब की बोतलें इस बात की चुगली करती दिखती हैं कि यहाँ शराबखोरी होती है।

देखा जाये तो अस्पताल को प्रयोगशाला बना दिया जाता रहा है। जिला अस्पताल में कर्मचारियों की कमी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। इसी तरह पेंशनर्स को दो सालों से दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस बारे में भी किसी अधिकारी के द्वारा पहल नहीं की गयी है। अस्पताल में मिलने वाली पर्ची का आकार इतना छोटा है कि उस पर लिखी गयी इबारत को पढ़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इस छोटी सी पर्ची में चिकित्सक के द्वारा मरीज़ का परीक्षण करने के बाद उसका रक्तचाप, पल्स, उसे क्या-क्या टेस्ट करवाने हैं जैसी बातें कहाँ लिखी जायेंगी, यह शोध का ही विषय है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ के कोरबा से एक खबर आयी है। कोरबा की जिलाधिकारी किरण कौशल के द्वारा अस्पताल को लेकर नवाचार किया गया है। उनके द्वारा बिना किसी से आर्थिक सहयोग लिये, जो उपलब्ध है उसी आधार पर अस्पताल को सुव्यवस्थित करने की कवायद आरंभ की गयी है। वैसे जिले के ही लखनादौन के सिविल अस्पताल में थाना प्रभारी महादेव नागोतिया के द्वारा जिस तरह का नवाचार किया जा रहा है वह भी जमकर सराहा जा रहा है। महादेव नागोतिया ने लोगों को इस बात के लिये प्रेरित किया कि वे अस्पताल में भर्त्ती मरीज़ों और उनके परिजनों को सुबह की चाय और नाश्ता करवायें। इससे मरीज़ और उनके परिजनों को नये लोगों से मिलकर अच्छा भी लगता होगा, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल, कोरबा की जिलाधिकारी किरण कौशल के द्वारा किये गये नवाचार में यह बात उभरकर सामने आ रही है कि अस्पताल में जिन मरीज़ों का पंजीयन होगा उन्हें बार-बार पुरानी पर्ची लाकर चिकित्सक को बताने की जरूरत नहीं होगी। जिला अस्पताल में मरीज़ का पूरा रिकॉर्ड दर्ज होगा। चिकित्सक भी दवाईयों की पर्ची को कागज की बजाय कंप्यूटर में दर्ज करेंगे। वैसे भी अस्पताल के मरीज़ों को अस्पताल की दवाएं ही प्रदाय की जाती हैं। इसके अलावा अगर किसी मरीज़ को रिफर किया जाता है तो उसका भी पूरा ब्यौरा कंप्यूटर में ही दर्ज होगा।

इस कवायद के पीछे यह वजह बतायी जा रही है कि अगर कोई मरीज़ एक बार अस्पताल में जाकर कई माह बाद भी अस्पताल जाता है तो उसका पूरा ब्यौरा चिकित्सक के सामने एक क्लिक पर उपलब्ध होगा। संचार क्रांति के इस जमाने में यह बात बहुत बड़ी मशक्कत की नहीं है। सिवनी के जिला अस्पताल में कंप्यूटरीकृत पर्ची बनाये जाने के पीछे भी मंशा शायद रही होगी कि मरीज़ का पूरा ब्यौरा कंप्यूटर में दर्ज रहे।

ब्हाय रोगी विभाग (ओपीडी) और आंतरिक रोगी विभाग (आईपीडी) में केवल मरीज़ का नाम डालने पर ही उसके नाम से मिलते जुलते नाम सामने आयेंगे और चंद सेकेण्ड्स में ही मरीज़ की पुरानी हिस्ट्री चिकित्सक के सामने होगी। इसमें मरीज़ के द्वारा करवायी गयी जाँचें भी सामने आ जायेंगी, जिससे चिकित्सकों को वर्तमान और पूर्व की स्थिति को समझने और उपचार करने में सहूलियत होगी।

स्वास्थ्य विभाग में नवाचार की संभावनाएं बहुत ज्यादा हैं। इसके लिये थम्ब रूल को अपनाने की बजाय जमीनी हकीकत और व्यवहारिक रूप से क्या उचित है इस बात को ध्यान में रखकर काम किया जाना जरूरी है। एक बात और कि यह सारा काम सिवनी के नागरिकों के लिये किया जा रहा है तो कम से कम एक बार सिवनी के नागरिकों से भी तो यह पूछ लिया जाये कि वे किस तरह का अस्पताल चाहते हैं!

अमूमन होता यह है कि जब भी कोई बड़ा अधिकारी अस्पताल का निरीक्षण करता है तो उस अधिकारी के आने के पहले अस्पताल की व्यवस्थएं चाक चौबंद करवा दी जाती हैं, पर जमीनी हकीकत इससे उलट ही होती है। चिकित्सकों को चिकित्सा करने के लिये स्वतंत्र छोड़ दिया जाना चाहिये और प्रशासिनक कामों को प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों के जिम्मे। अगर चिकित्सकों को दीगर कामों में उलझाया जायेगा तो निश्चित तौर पर वे अपने मूल काम को अंजाम देने में पूरी ईमानदारी नहीं बरत पायेंगे, इसलिये अस्पताल के कायाकल्प के बारे में एक बार फिर अस्पताल प्रशासन विचार करे और उसके बाद अस्पताल में पहले रिक्त पदों (जो वर्तमान में बहुत आवश्यक हैं) की पूर्ति करवाये जाने के बाद ही आगे किसी तरह के कदम उठाये . . .!

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