आदिवासियों के तीर्थ को भी दिया बिसार!

 

 

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(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। जिले में सरकारी वेब साईट मज़ाक बनकर रह गयी है। लगभग एक माह बाद भी इस वेब साईट को पूरी तरह तैयार नहीं कराया गया है। इस वेब साईट में अनेक विसंगतियों को उजागर किये जाने के बाद भी स्थान नहीं मिल पाना दुर्भाग्य से कम नहीं माना जा रहा है।

सिवनी डॉट एनआईसी डॉट इन नामक वेब साईट पर सिवनी जिले से संबंधित आधी अधूरी जानकारी प्रसारित किये जाने से लोग इसे देखकर भ्रमित हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिले के अनेक स्थानों का इस पोर्टल में जिकर ही नहीं है। जिनका जिकर है उनके बारे में जानकारी विस्तार से उपलब्ध नहीं है।

बरघाट क्षेत्र में जिले का एक स्थान है कोंगो राजा। यहाँ कोंगो राजा की लेटी हुई प्रतिमा आदिवासियों के लिये आस्था का केंद्र सदा से रही है। जानकारों का कहना है कि आदिवासियों के राजा कोंगो एक भूल के कारण पत्थर के हो गये थे। लोगों का मानना है कि भले ही वे पत्थर के हो गये हों, पर आज भी वे लोगों की दुःख तकलीफों को दूर करते हैं।

बरघाट विकासखण्ड के विजयपानी पंचायत के अंर्तगत कोंगो राजा लोगों के आकर्षण के साथ श्रद्धा का केन्द्र हैं। आदिवासी ग्रंथों में इस बात का उल्लेख है कि कोंगो राजा आदिवासी शासकाल में प्रभावशाली राजा के रुप में जाने जाते थे। उनके पास प्रजा के लिये सर्मपण था तो दूसरी ओर प्रजा भी उन्हें अपना ईश्वर मानती थी।

उनके शासन काल में हुई एक घटना ने उन्हें पत्थर का कर दिया। समाज में मान्यता है कि मामा – भांजे को एक साथ न ही सफर करना चाहिये और न ही शयन। मान्यता है कि कोंगो राजा अपने शासन काल में अपने भांजे के साथ शयन कर रहे थे तभी भूल से उनका पैर भांजे को लग गया और वे पत्थर की प्रतिमा के रुप में तब्दील हो गये। लोगों ने उन्हें पुर्नजीवित करने की खूब कोशिशें की लेकिन सफल नहीं हो सके।

आदिवासी समाज में मान्यता है कि राजा कोंगो प्रजा के शुभचिंतन में हमेशा मगशूल रहते थे। वे अध्यात्म पर खासा जोर देते थे। इसलिये उनका प्रभाव था कि वे गलत काम करने वालों को श्राप देते थे। इसलिये पूरे क्षेत्र में उनका अलग प्रभाव था।

सैकड़ों सालों को बीत जाने के बावजूद कोंगो राजा का आज भी प्रताप बाकी है। कई बार कई लोगों ने इस प्रतिमा को अन्यत्र ले जाने की कोशिश की लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हटी। आज भी खुले मैदान के नीचे लेटी हुई अवस्था में लोगों के लिये पूज्यनीय है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे जो भी मन्नत लेकर आते हैं उसे कोंगो राजा अवश्य पूरा करते हैं। मन्नत पूरी होने पर प्रसाद आदि चढ़ाने की पंरपरा है। अपनी समस्या का निराकरण होने पर लोग नजदीकी वटवृक्ष पर झण्डी, तोरण, सिंदूर, त्रिशूल, घण्टा और प्रसाद आदि चढ़ावा चढ़ाते हैं।

बरघाट और केवलारी विकासखण्ड की सीमा पर स्थित यह क्षेत्र वनों से आच्छादित है। यहाँ पर पहुँचने के लिये नजदीकी गाँव मेहरा पिपरिया, पखारास मोआर होकर पहुँचा जा सकता है। चारों तरफ घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र लोगों के लिये आस्था का केन्द्र है। यहाँ पर अनेक अवसरों पर मेले का भी आयोजन होता रहता है।

कोंगो राजा के संबंध में बात करते हुए स्थानीय बी.एल. बट्टी और विवेक डहेरिया आदि का कहना है कि कोंगो राजा की तरह क्षेत्र में अनेक ऐसे प्रसंग जुड़े हुए हैं जो हमें आदिवासी संस्कृति से जोड़ते हैं। कोंगो राजा जिस तरह से पत्थर में तब्दील हो गये वैसे ही उदाहरण गांगी राजा की बारात पत्थर की बनना, धनौरा विकासखण्ड के सुनवारा क्षेत्र व सिवनी विकासखण्ड के बिठली में नक्कारखाना क्षेत्र में भी देखने को मिलता है, जहाँ पर ढोल शहनाई व पत्थर की बारात बन जाने जैसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। स्थानीय लोगों को कहना है कि इस क्षेत्र को जिले के साथ ही साथ प्रदेश के पर्यटन स्थलों में शामिल कर इसका विकास किया जाना चाहिये।