पस्त विपक्ष को छोड़कर मस्त सरकार की ओर चलने का चलन

(सहीराम)
सरकारों के लिए ऐसी आदर्श स्थितियां रोज-रोज नहीं बनतीं कि वह अर्श पर हो और विपक्ष फर्श पर हो। चंद्रयान तो चांद छूने जा रहा हो और विपक्ष ने विपक्ष होने तक का आंकड़ा न छुआ जा रहा हो। लेकिन साहब, विपक्ष चाहे कितना ही पस्त हो, कर्मठ लोग पस्त नहीं हुआ करते।
राजनीति में पस्त होने का अर्थ है अस्त होना। सो राजनीति के कर्मठ पस्त विपक्ष को छोड़कर मस्त सरकार की ओर लपक रहे हैं। हालांकि सरकार को मस्त कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उसके कई दूसरे अर्थ निकल जाते हैं- सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त टाइप के। उसे कर्मठ कहना ही ज्यादा उपयुक्त होगा। क्योंकि यहां तो कर्मठता में जरा सी कमी आई कि प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों को भी डपटने लगते हैं। खैर, राजनीति के ये कर्मठ कुछ इसी अंदाज में सरकार की ओर लपक रहे हैं कि हम को भी साथ ले ले, हम रह गए अकेले। ऐसे में दलबदल विरोधी कानून को याद करने का कोई अर्थ नहीं है। इसे याद करने से बात दूर तलक जा सकती है और नानी की ही तरह भजनलाल जी भी याद आ सकते हैं। कहते हैं कि वे दलबदल में पीएचडी थे। इसका फायदा यह होगा कि नेहरूजी बच जाएंगे, जिन्हें बख्शने को बीजेपी वाले कतई तैयार नहीं।
इसे कांग्रेस के लिए भजनलाल जी का योगदान माना जा सकता है कि उन्होंने कम से कम एक मामले में तो नेहरूजी को बचाया। ऐसे कर्मठ नेता इतिहास में कितने हैं, बताइए! भजनलाल जी के बाद दलदबल विरोधी कानून अपनी बेनूरी पर वैसे ही बरसों रोया, जैसे नरगिस सालों-साल रोया करती है। अब बड़ी मुश्किल से बीजेपी में दीदावर पैदा हुए हैं। चश्मेबद्दूर!
वैसे भी सरकार पुराने कानूनों को तो बदलने में लगी ही है। बोरी भर-भरकर ये कानून वैसे ही फेंके जा रहे हैं, जैसे मोदीजी की पहली सरकार ने आते ही पुरानी फाइलों को फेंका था। वैसे भी फाइलें धूल ही खाती हैं। भले कुछ सांसद कहते रहें कि साफ-सफाई उनका काम नहीं है पर सरकार स्वच्छता प्रधान है। इसलिए उसने बोरियां भर-भरकर जैसे तब फाइलें फेंकी थीं, वैसे ही अब पुराने-धुराने कानूनों को फेंका जा रहा है। सरकार को कर्मठ लोगों की जरूरत है और वे सरकार के साथ इफरात में आ भी रहे हैं। अर्थात कर्मठता उबल रही है।
एक दिन आएगा कि बीजेपी के घाट पर कर्मठों की भीड़ वैसे ही बढ़ जाएगी, जैसे चित्रकूट के घाट पर संतों की बढ़ा करती है। फिर बल्ला दे-दनादन चलेगा। रही बात मॉब लिंचिंग की तो उसमें सरकार को नहीं घसीटा जाना चाहिए। वह कलंक नहीं है। वह तो काला टीका है, जो सरकार को बुरी नजर से बचाता है। अब यह काला टीका कौन लगा रहा है यह मत पूछिए। सरकार के माई-बाप कौन हैं, सब जानते हैं। वैसे माता-पिता के अलावा भी बहुत से रिश्तेदार और खैरख्वाह होते हैं, जो होनहारों को बुरी नजर से बचाने को चिंतित रहते हैं।
ऐसी आदर्श स्थिति में टमाटर भी पीला हुआ जा रहा है क्योंकि उसने जमाने का रंग पहचान लिया है। लाल होकर महंगा होने का जमाना गया, थोड़ा पीला होगा तो सस्ते में निकल जाएगा। यही हाल सांसदों-विधायकों का हो रखा है। जिन सांसदों और विधायकों के सूटकेसों की इतनी चर्चा होती थी, आज कोई उनका जिक्र भी कर रहा है क्या? कोई कीमत की बात कर रहा है? कोई रेट-लिस्ट देख रहा है? इतने सस्ते हुए पड़े हैं कि अगली समस्या आएगी इनको ढोकर कैसे ले जाएं?
बात सिर्फ सांसदों या विधायकों की नहीं है। सरकार कानून बदलकर मजदूरी तक सस्ती करने में लगी है। यह अलग है कि शिक्षा या इलाज महंगा हो जाए। इलाज की बात चली है तो कोई न कोई ऐसा कर्मठ नेता सामने आ ही जाएगा, जो प्राचीन चिकित्सा पद्धति का हवाला देकर साबित कर देगा कि टमाटर खाना सेहत के लिए हानिकर है। यह मिसाल भी बहुत पुरानी नहीं है, जब एक नेता ने कहा था कि टमाटर खाने से पथरी हो जाती है। तो भैया ज्यादा भाव न खाओ। भाव खानेवालों के जमाने लद गए।
(साई फीचर्स)