कब आयेंगे सिवनी के अच्छे दिन!

 

 

(शरद खरे)

परिसीमन के उपरांत सिवनी संसदीय क्षेत्र को विलोपित किया जाकर सिवनी जिले के भाग्य निर्धारण के लिये दो-दो सांसदों को बैठा दिया गया है। इसके बाद भी सिवनी के अच्छे दिन आते नहीं दिख रहे हैं। आश्वासन पर आश्वासन, बयान पर बयान आने के बाद भी सिवनी में कुछ नया नहीं हो पा रहा है।

इतिहास खंगालने पर यही मालूम होता है कि सिवनी संसदीय क्षेत्र के निर्माण के साथ यहाँ स्व.पंडित गार्गीशंकर मिश्र और सुश्री विमला वर्मा ने ही सिवनी की ओर ध्यान दिया। दोनों ही काँग्रेस के प्रतिनिधि रहे हैं। सिवनी में सबसे पहले 1962 में एसटी कोटे से नारायणराव मनीराम वाडीवा सांसद रहे। इसके उपरांत यह सीट विलोपित हो गयी और पुनः 1977 में अस्तित्व में आयी। 1977 में सिवनी लोकसभा से भारतीय लोकदल के निर्मल चंद जैन यहाँ से सांसद चुने गये। इसके उपरांत 1980 एवं 1984 में पंडित गार्गीशंकर मिश्र (काँग्रेस) ने यहाँ का प्रतिनिधित्व लोकसभा में किया। 1989 में किस्मत ने पलटी मारी और भाजपा के प्रहलाद सिंह पटेल को यहाँ का सांसद चुना गया।

1991 में एक बार फिर यह सीट काँग्रेस के कब्जे में आयी और काँग्रेस की आयरन लेडी मानी जाने वालीं सुश्री विमला वर्मा यहाँ की सांसद बनीं। जनता ने एक बार फिर 1996 में उन्हें नकारते हुए यह सीट भाजपा की झोली में डाली और प्रहलाद सिंह पटेल यहाँ से दोबारा सांसद बने। 1998 में सुश्री विमला वर्मा पर लोगों ने ऐतबार जताया और वे यहाँ की सांसद बनीं।

इसके बाद सिवनी लोकसभा सीट को भाजपा ने काँग्रेस के हाथ से छीना तो उसके बाद काँग्रेस इसे वापस नहीं पा सकी। 1999 में सिवनी से रामनरेश त्रिपाठी सांसद बने। उनके उपरांत 2004 में श्रीमति नीता पटेरिया यहाँ से सांसद चुनी गयीं। इसके बाद परिसीमन के झंझावत में यह सीट फंसी। बिना किसी प्रस्ताव के इस सीट का विलोपन कर दिया गया।

2009 के चुनावों में सिवनी की पाँच में से चार बची विधानसभा सीटों में से सिवनी और बरघाट को बालाघाट लोकसभा क्षेत्र में तो केवलारी और लखनादौन को मण्डला लोकसभा क्षेत्र में समाहित कर दिया गया। इस तरह केवलारी और लखनादौन का नेत्तृत्व काँग्रेस के बसोरी सिंह मसराम के उपरांत फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा तो सिवनी और बरघाट का बालाघाट के भाजपा के पूर्व में उम्मीदवार रहे के.डी. देशमुख, बोधसिंह भगत द्वारा किया गया।

बहरहाल, स्व.सुश्री विमला वर्मा के सक्रिय राजनीति से किनारा करने के बाद केंद्र सरकार की ओर से सिवनी को जो भी मिला वह नीतिगत निर्णयों के तहत ही मिल पाया। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सिवनी के विकास के लिये सुश्री विमला वर्मा के उपरांत रहे सांसदों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया है।

सिवनी के लिये नैरोगेज़ रेल लाईन सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही माना जाता है। नैरोगेज़ को ब्रॉडगेज़ में तब्दील करने के लिये न जाने कितने आंदोलन हुए पर नतीजा सिफर ही निकलता रहा। आज सिवनी की सीमा से लगे जिलों छिंदवाड़ा, नागपुर, बालाघाट, जबलपुर, नरसिंहपुर में ब्रॉडगेज़ की सीटी बज रही है। मण्डला और सिवनी में आज भी नैरोगेज छुक-छुक रेल गाड़ी के अमान परिवर्तन का कार्य मंथर गति से ही चल रहा है। आज सिवनी में आवागमन के साधनों का टोटा साफ दिखायी पड़ता है। छिंदवाड़ा से भोपाल, इंदौर यहाँ तक कि नई दिल्ली के लिये सीधी रेल सेवा वाकई अपने आप में एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है। अगर सिवनी के संसद सदस्यों द्वारा लोकसभा के पटल पर सिवनी की नैरोगेज़ को ब्रॉडगेज़ में तब्दील करने की बात, बहुत पहले ही वजनदारी से रखी जाती तो आज यहाँ से भी बड़ी रेल लाईन गुजर रही होती जिससे यहाँ का व्यापार काफी हद तक समृद्ध हो चुका होता।

इसके साथ ही साथ सड़क मार्ग से सिवनी पहुँचना अपने आप में टेड़ी खीर ही साबित होता है। शेरशाह सूरी के जमाने की लगभग साढ़े चार सदी पुरानी जीएन रोड पर भी नेताओं की वक्र दृष्टि पड़ी और सिवनी से होकर गुजरने वाला फोरलेन मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त होकर रह गया। यह मार्ग किसी और की नहीं वरन भाजपा के आदर्श रहे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल की महत्वाकांक्षी योजना रही है। बारिश के दिनों में यहाँ अक्सर लगने वाले जाम से लोग खासे परेशान नज़र आते हैं।

इस सड़क के लिये न जाने कितने आंदोलनों के दौर हुए, पर नतीजा सिफर ही निकला। मतलब साफ है कि प्रयास तो हुए पर ये प्रयास दिशाहीन ही साबित हुए। अगर प्रयास सही दिशा में किये गये होते तो आज नतीजा कुछ और होता। बहरहाल, अब प्रदेश में काँग्रेस सरकार है और केंद्र में भाजपा की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार है। अब भाजपा के नुमाईंदों के पास सिवनी के निवासियों को फोरलेन के मामले में झूला झुलाने का कोई कारण नहीं बचता है। इस सड़क के संबंध में आये दिन सांसद यहाँ तक कि विधायकों के द्वारा भी बयानबाजी की जाती रही है।

सिवनी का प्रतिनिधित्व करने वाले फग्गन सिंह कुलस्ते केंद्र में मंत्री हैं। दूसरे सांसद डॉ.ढाल सिंह बिसेन भी भाजपा से ही हैं। प्रदेश की बात की जाये तो दिनेश राय और राकेश पाल सिंह भाजपा के सांसद हैं तो योगेंद्र सिंह और अर्जुन सिंह काकोड़िया काँग्रेस से हैं। प्रदेश में काँग्रेस की सरकार है तो केंद्र में भाजपा की। देखा जाये तो जिले के दोनों सांसद और चारों विधायक अगर उन्हें जिले के निवासियों के द्वारा दिये गये जनादेश का सम्मान करते हुए दलगत सियासत से ऊपर उठकर काम करें तो चंद माहों में ही सिवनी जिले के विकास के द्वारा आसानी से खुलने के मार्ग प्रशस्त हो सकते हैं, पर इसके लिये सभी को जिले के हितों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

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