जब गोरे सैनिकों ने नाटक मंडली पर तानीं तलवारें

 

 

(कृष्ण प्रताप सिंह)

अवध में नवाबों के वक्त हुए सांस्कृतिक मेल-मिलापों की एक बड़ी मिसाल यह भी है कि बंगालियों के समूह जैसे समरस होकर उसकी राजधानी लखनऊ में बसते हैं, बंगाल के बाहर शायद ही कहीं और बसते हों। हां, अनूठी सामाजिक व सांस्कृतिक परंपराओं के धनी इन समूहों की भी खासियत है कि उन्होंने अपनी अलग पहचान को अवध की गंगा-जमुनी तहजीब व अदब से दूरी, परहेज या अलगाव का वायस नहीं बनने दिया है। लखनऊवासियों की सुख-समृद्धि में ही नहीं, दुःखों-तकलीफों में भी उनकी ऐसी भागीदारी है कि लखनऊविद योगेश प्रवीन कहते हैं, आज की तारीख में नवाबों के शहर का कोई भी इतिहास बंग-समाज की चर्चा के बगैर पूरा नहीं हो सकता।

बहरहाल, लखनऊ में बंग-समाज ने अपने सुनहरे दिन तब देखने शुरू किए जब ज्योतिष शास्त्र में गहरी दिलचस्पी लेने वाले बादशाह नसीरुद्दीन हैदर (1827-1837) ने मोतीमहल के पास के एक ऊंचे टीले पर तारों वाली कोठी नाम से एक वेधशाला बनवाई। वेधशाला की कीमती दूरबीनों की देखभाल, आकाशीय नक्षत्रों के अध्ययन व शिक्षण के लिए उन्होंने बंगाल से कई ज्योतिर्विदों को बुलवाया। इनमें से एक कालीचरण चट्टोपाध्याय आगे लखनऊ के ही होकर रह गए। दुर्गापूजा व कालीपूजा समेत प्रायः सारे बंगाली उत्सवों से लखनऊ का पहला परिचय उन्होंने ही कराया।

तारों वाली कोठी ने अपना महत्व खो दिया तो उन्होंने खजांची के पद पर नियुक्ति पा ली और रेजिडेंट जनरल आउट्रम के इतने वफादार हो गए कि 1857 की बगावत कुचलने के लिए अंग्रेजों ने जो भी साजिशें कीं, उनमें स्वतः शामिल मान लिए गए। इसके चलते बागी हर हाल में उनके खून के प्यासे हो गए और उनका सिर काट लाने वाले के लिए पांच हजार रुपयों का इनाम भी घोषित कर डाला। लेकिन कालीचरण क्या जानें किस कंदरा में जा छिपे कि बागी किसी भी तरह उन तक नहीं पहुंच पाए। बाद में वे तभी नजर आए, जब बागियों को नाकाम कर अंग्रेजों ने फिर से सत्ता संभाल ली। उनकी वफादारी से खुश अंग्रेज अफसरों ने कहा कि वे अपने लिए जो भी पद चुन लेंगे, उन्हें दे दिया जाएगा। लेकिन उन्होंने पद के बजाय रेजिडेंसी (रेजीडेंट के निवास) में दुर्गापूजा कराने की अनुमति मांगी, जो उन्हें तुरंत मिल गई। इससे आम लखनऊवासियों को लगा कि बंग-समाज उनसे ज्यादा अत्याचारी अंग्रेज शासकों के नजदीक है।

लेकिन, तीन साल भी नहीं बीते, अंग्रेजों ने खुद उनका यह भ्रम तोड़ डाला। बात 1861 में बिगड़ी, जब गोमती के किनारे निर्मित ऐतिहासिक छत्तरमंजिल में कलकत्ता से आई एक नाटकमंडली ने दीनबंधु मित्र के नीलदर्पण नामक नाटक का मंचन शुरू किया। यह नाटक नील की खेती को मजबूर किसानों पर गोरों के अत्याचारों के खिलाफ था। उसके एक दृश्य में एक किसान नेता एक ग्रामवधू की इज्जत के लुटेरे अंग्रेज अफसर को पटककर उसकी छाती पर चढ़ बैठा और चाबुक चलाने लगा तो वहां उपस्थित कई अंग्रेज सैनिकों को लगा कि यह उनकी शान में गुस्ताखी है। वे नंगी तलवारें लिए मंच पर चढ़ गए और नाटकमंडली को गोलियों से भून देने की धमकी देने लगे। फिर तो ऐसी अफरा-तफरी फैली कि नीलदर्पण के बजाय दूसरा ही नाटक शुरू हो गया। नाटक मंडली जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर निकली।

अंग्रेजों ने बंग-समाज की इस गुस्ताखी को अरसे तक दिल पर लिए रखा। उसका पुलिस पर व्यंग्य करने वाला वह नाटक भी प्रतिबंधित कर दिया गया, जो एक मार्च, 1875 को मंचित किया जाना था। तीन दिन बाद बंगाल की ग्रेट नेशनल नामक नाट्यमंडली ने सती या कलंकिनी नाटक का मंचन शुरू किया तो पुलिस ने नाटक के बीच में ही उसके अभिनेताओं अमृतलाल बसु, मोतीलाल सूर व अमृतलाल मुखर्जी को पकड़ लिया। इसे लेकर सारे देश में विरोध प्रदर्शन हुए। आगे का इतिहास गवाह है, इस बंग-समाज ने अवध के अहिंसक व क्रांतिकारी दोनों तरह के स्वतंत्रता संघर्षों में कंधे से कंधा मिलाए रखा।

(साई फीचर्स)