विपक्ष किस मुद्दे पर राजनीति करे?

 

 

(अजित द्विवेदी

सत्ता में चाहे जो बैठा हो उसका एक पसंदीदा डायलॉग यह होता है कि अमुक मसले पर विपक्ष राजनीति न करे। हालांकि वह खुद विपक्ष में रहते उसी मसले पर राजनीति कर चुका होता है। पर सत्ता में आने के बाद उसे लगता है कि यह राजनीति का नहीं राष्ट्र नीति का मुद्दा है। जबकि असल में देश के सारे मसले राजनीतिक ही होते हैं। मशहूर हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध हर मामले में सामने वाले व्यक्ति से पूछते थे कि पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है। सो, यह कहना सत्तापक्ष की एक किस्म की बेईमानी है कि विपक्ष किसी खास मसले पर राजनीति न करे।

जैसे पिछले दिनों कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने जम्मू कश्मीर जाने की बात कही तो राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पहले तो उनको हवाई जहाज देने की बात कही लेकिन जब राहुल सीरियस हो गए तो राज्यपाल ने कहा कि वे कश्मीर पर राजनीति न करें। सवाल है कि कश्मीर पर राजनीति न करें तो क्या करें? क्या राज्यपाल कह रहे हैं कि कश्मीर राजनीतिक मसला नहीं है? ऐसा वे अज्ञानतावश कह रहे हैं या जान बूझकर गलबयानी कर रहे हैं? असल में उनका प्रशिक्षण राष्रीेंय स्वंयसेवक संघ से नहीं हुआ है और वे भाजपा में भी नहीं रहे हैं।

उनको समझना चाहिए कि कश्मीर भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का आधार रहा है। इसी मसले पर राजनीति करने के लिए आरएसएस ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की है। पिछले 70 साल में पहले जनसंघ और फिर भाजपा ने इस मसले पर राजनीति की है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक प्रधान, एक विधान और एक निशान का आंदोलन करने कश्मीर गए थे, जहां रहस्यमय स्थितियों में उनका निधन हो गया था। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मुद्दा हर बार भाजपा के घोषणापत्र में रहा है। दूध मांगोगे खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे चीर देंगे इस नारे को भाजपा ने दशकों से लोकप्रिय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा।

इसलिए कश्मीर एक राजनीतिक मुद्दा ही है और इसे राजनीतिक तरीके से ही सुलझाया जाना चाहिए था, जो दुर्भाग्य से केंद्र सरकार ने नहीं किया। केंद्र सरकार ने इसे भारतीय शासन व्यवस्था की एक प्रशासनिक गड़बड़ी के तौर पर सुलझाया है। पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि अनुच्छेद 370 से राज्य को क्या लाभ हुआ। पर अफसोस की बात है कि इस पर सांस्थायिक रूप से कोई चर्चा नहीं हुई। सरकार ने खुफिया ब्यूरो के प्रमुख रहे दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर में वार्ताकार नियुक्त किया था पर उन्होंने महीनों तक क्या वार्ता की और किस निष्कर्ष पर पहुंचे यह भी किसी को पता नहीं है।

बहरहाल, जनसंघ और भाजपा ने बरसों तक कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर राजनीति की। भाजपा के तब के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और नरेंद्र मोदी 90 के दशक के शुरू में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने गए थे। भाजपा ने अनेक चुनाव इस मुद्दे पर लड़े। पहले भी भाजपा ने इस मसले पर राजनीति की और अभी अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को हटा कर भी भाजपा ने राजनीति ही की है। आखिर उसे अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं और नेताओं को जवाब देना था कि पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद उस वादे को क्यों नहीं पूरा किया जा रहा है, जो दशकों से किया जा रहा है। दूसरे, निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। सो, फैसले की टाइमिंग ऐसी चुनी गई, जिससे अधिकतम राजनीतिक लाभ हो।

सवाल है कि जब भाजपा इस मसले पर लगातार राजनीति कर रही है और सरकार के फैसले भी राजनीतिक असर वाले हैं तो कांग्रेस और राहुल गांधी को इस पर राजनीति क्यों नहीं करनी चाहिए? ऐसे ही भाजपा ने दिल्ली के निर्भया कांड पर जम कर राजनीति की लेकिन उन्नाव कांड पर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को राजनीति नहीं करने की नसीहत देती है। भाजपा लगातार आरक्षण की व्यवस्था से छेड़छाड़ कर रही है पर मोहन भागवत के बयान पर भाजपा नेता राजनीति नहीं करने की सलाह देते हैं। राजनीतिक फैसलों के कारण अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है पर भाजपा के नेता कहेंगे कि आर्थिकी को लेकर विपक्ष राजनीति न करे। इसी तरह एनआईए और यूएपीए कानून में बदलाव, एनआरसी आदि सारे राजनीतिक मसले हैं पर भाजपा विपक्ष से यहीं कहेगी कि वह इन मुद्दों पर राजनीति न करे। तो सवाल है कि आखिर विपक्ष किस बात पर राजनीति करे?

(साई फीचर्स)

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