लूडो के नाम पर चल रहा सट्टा!

 

 

पारिवारिक मनोरंजक खेल बना सट्टे का साधन!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। इन दिनों लूडो का जादू युवाओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। लूडो की आड़ में युवा वर्ग दांव लगाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। शहर के चौराहों, दुकानों, गुमटियों यहाँ तक कि शैक्षणिक संस्थानों और कार्यालयों में भी लोगों को लूडो गेम खेलते देखा जा सकता है।

जानकारों का कहना है कि यह एक मोबाईल गेम है जिसे मोबाईल पर आसानी से डाऊनलोड किया जा सकता है। इस गेम के माध्यम से सार्वजनिक स्थानों पर भी बिना किसी भय के दांव लगाये जा सकते हैं। नगर के चौक चौराहों पर भी युवाओं को बड़ी तादाद में झुण्ड के रूप में मोबाईल पर लूडो खेलते देखा जा सकता है।

ज्ञातव्य है कि लूडो एक पारिवारिक खेल है, जिसे बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक के लोग बहुत ही चाव से खेलते आये हैं। अब मोबाईल पर लूडो का खेल जा आने के कारण यह युवाओं के लिये टाईम पास का साधन बन चुका है। आज के युवा स्कूल कॉलेज में भी मोबाईल का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं।

बताया जाता है कि इस गेम के बहाने युवाओं के द्वारा आपस में जीत – हार के दांव लगाये जाते हैं। पान की गुमटी हो या दुकान हर जगह लूडो का खेला जाना इसकी लोकप्रियता को तो प्रदर्शित करता ही है, साथ ही साथ इसकी आड़ में लग रहे दांव से शायद पुलिस अन्जान ही है।

एक प्रतिष्ठान के संचालक ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि मंदी के इस दौर और जीएसटी की झिकझिक के चलते दुकान में व्यापार हो या न हो पर फुरसत के क्षणों में लूडो का व्यापार जमकर चल रहा है। इसकी आड़ में लोग हजारों के वारे न्यारे करने से नहीं चूक रहे हैं।

बताया जाता है कि इन दिनों लूडो खेलना युवाओं का प्यारा शगल बन चुका है। पचास सौ रूपये से आरंभ होने वाले दांव अंत में हजारों में तब्दील हो जाते हैं। इस तरह अघोषित तौर पर लूडो सट्टे की जद में जिले के युवा धीरे – धीरे फंसते दिख रहे हैं। चौक चौराहों पर लूडो के खेल में दांव लगाने वाले युवा झुण्ड के रूप में आसानी से देखे जा सकते हैं।

जानकारों का कहना है कि वैसे तो लूडो पूरी तरह पारिवारिक और मनोरंजक खेल है, लेकिन अब यह मनोरंजन के साथ ही साथ हजारों रूपयों की हार – जीत का साधन बन चुका है। इस खेल के बहाने युवा वर्ग अपना काम धाम छोड़कर अधिकांश समय इसी में उलझा रहता है। शुरूआत में कुछ रूपये जीतने वाले युवाओं का लोभ बढ़ता है और धीरे – धीरे दांव सौ पचास रूपये से बढ़कर हजारों तक पहुँच जाते हैं।

शहर का कोई भी हिस्सा शायद ऐसा नहीं बचा होगा जहाँ इस तरह के दांव न लग रहे हों। यह सब जानते बूझते हुए भी कोतवाली पुलिस के द्वारा इन लोगों पर कार्यवाही न किया जाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। इस तरह से लूडो के नाम पर दांव लगाने का खेल डेढ़ दो सालों से बदस्तूर जारी है।

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