पितृपक्ष में क्या करें और क्या न करें!

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। जब पितरों के कर्माें का लोप होने लगता है अर्थात जातक के द्वारा पितरों के श्राद्ध आदि कर्म उचित व विधिपूर्वक नहीं किये जाते हैं तो पितर प्रेत योनि में चले जाते है और जातक के वंश वृद्धि, धन वृद्धि, विकास, पद, प्रतिष्ठा आदि में बाधाएं आने लगती है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को पितृ दोष के कारण बाधाएं, प्रगति में गिरावट, सन्तान से कष्ट, मानसिक दशा में गिरावट, आर्थिक विपन्नता हो रही है, तो श्राद्ध पक्ष में उस जातक को पूरे विधि – विधान से पितरों का श्राद्ध करना चाहिये और तर्पण करना चाहिये। पितृ पक्ष में तर्पण करने से पितरों के श्राप से बचा जा सकता है।

तर्पण विधि : पीतल की थाली में विशुद्ध जल भरकर, उसमें थोड़े काले तिल व दूध डालकर अपने समक्ष रख लें एवं उसके आगे दूसरा खाली पात्र रख लें। तर्पण करते समय दोनों हाथ के अंगूठे और तर्जनी के मध्य कुश लेकर अंजली बना लें अर्थात दोनों हाथों को परस्पर मिलाकर उस मृत प्राणी का नाम लेकर तृप्यन्ताम कहते हुए अंजली में भरे हुए जल को दूसरे खाली पात्र में छोड़ दें। एक या दो व्यक्ति के लिये कम से कम तीन – तीन अंजली तर्पण करना उत्तम रहता है।

क्या होती है पंचबलि : पितरों को तृप्त करने के लिये अश्विन मास के कृष्णपक्ष में जिस तिथि को पूर्वजों का देहान्त हुआ हो उस तिथि को तिल, जौ, पुष्प, गंगाजल या शुद्ध जल से तर्पण, पिण्डदान और पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात विद्वान ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र, फल व यथा शक्ति दान देना चाहिये। गाय, कौआ, कोयल व श्वान को भी भोजन देना चाहिये।

यह कर्म पंचबलि की श्रेणी में आता है। पितृपक्ष में सूर्य दक्षिणायन होता है। शास्त्रों के अनुसार सूर्य इस दौरान श्राद्ध तृप्त पितरों की आत्माओं को मुक्ति का मार्ग देता है। कहा जाता है कि इसीलिये पितर अपने दिवंगत होने की तिथि के दिन, पुत्र – पौत्रों से उम्मीद रखते हैं कि कोई श्रद्धा पूर्वक उनके उद्धार के लिये पिण्डदान तर्पण और श्राद्ध करे लेकिन ऐसा करते हुए बहुत सी बातों का ख्याल रखना भी जरूरी है।

पितृपक्ष में क्या है वर्जित : श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के समय कुछ विशेष वस्तुओं और सामग्री का उपयोग और निषेध बताया गया है। श्राद्ध में सात पदार्थ – गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल महत्वपूर्ण हैं। तुलसी से पितृगण प्रलयकाल तक प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं। श्राद्ध सोने, चाँदी कांसे, तांबे के पात्र से या पत्तल के प्रयोग से करना चाहिये। श्राद्ध में लोहे का प्रयोग नहीं करना चाहिये। 5-केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।

पितृपक्ष में पितृदोष निवारण हेतु उपाय : अपने कुल देवता का विधिवत पूजन व अर्चन करें। नाग योनि में पड़े पितरों को मुक्ति देने के लिये पितृपक्ष में ही चाँदी के बने नाग – नागिन के जोड़े का दान करना चाहिये।

इस समय पीपल व बरगद की नियमित पूजा करने से पितृदोष का शमन होता है। सूर्याेदय के समय कुश के आसन पर खड़े होकर गायत्री मन्त्र का जाप करते हुए सूर्य का ध्यान करना चाहिये। ऐसा करने से पितृदोष की शान्ति होती है। दत्तात्रेय देवता के चित्र या मूर्ति की प्रतिदिन पूजा करें। इन 15 दिनों में यदि नित्य सूर्य को जल देकर आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करने से भी पितृदोष में न्यूनता आती है।

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