नवीन के निकम्मेपन की दास्तां

 

 

(अजित द्विवेदी)

ओडिशा की पिछले दो दशक की कहानी एक मुख्यमंत्री के निकम्मेपन की दास्तां है। इसकी अनेक दास्तानों में से एक बुधवार को अखबारों में छपी है। खबर के मुताबिक मलकानगिरी जिले के खैरपुट प्रखंड के एक गांव नौगुडा में 12 साल के एक बीमार बच्चे को एक डॉक्टर ने दूसरे लोगों की मदद से खाट पर रख कर पांच किलोमीटर दूर इलाज के लिए पहुंचाया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस गांव तक एंबुलेंस या किसी भी मोटर वाहन के जाने का रास्ता नहीं था। इसी खबर में यह भी बताया गया है कि मलकानगिरी में ही पिछले साल तीन नंवबर को एक डॉक्टर और गांव के कुछ लोगों ने एक गर्भवती महिला को खाट पर रख कर कई किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचाया था।

खबर लिखने वालों की भेड़ चाल ऐसी है कि जितने अखबारों में खबर छपी है, हर जगह बीमार बच्चे को खाट पर रख कर ले जाने वाले डॉक्टर की मानवीयता का वर्णन किया गया है। सबने लिखा है कि डॉक्टर ने दिल जीत लिया। किसी ने राज्य के शासन, प्रशासन को लेकर सवाल नहीं उठाया है। किसी ने यह नहीं पूछा कि आखिर ऐसा क्यों है कि जिस समय भारत का यान चंद्रमा के चक्कर लगा रहा है उस समय उसी भारत का एक गांव सड़क से क्यों नहीं जुड़ पाया है? क्या खबर की समझ नहीं होने की वजह से ऐसा हुआ या 20 साल से जमी एक ही सरकार से सवाल पूछना मना है इसलिए किसी ने सवाल नहीं उठाया?

इस मामले में पत्रकारिता की नैतिकता और समझ का मामला एक मुद्दा है तो करीब 20 साल से राज्य में सत्तारूढ़ एक पार्टी की सरकार और उसके मुख्यमंत्री के निकम्मेपन की दास्तां एक अलग मुद्दा है। राज्य में करीब 20 साल से बीजू जनता दल की सरकार है और नवीन पटनायक मुख्यमंत्री हैं। चार करोड़ 60 लाख की आबादी वाले ओड़िशा की हालत यह है कि अब भी वहां 32 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है और मानव विकास सूचकांक में यह राज्य 25वें स्थान पर है। देश के 29 राज्यों में से 25वें स्थान पर ओडिशा है।

अब भी ओडिशा का नाम लेते ही कालाहांडी और मलकानगिरी की तस्वीरें नजर के सामने घूमने लगती हैं। आम की गुठलियों को पीस कर खाने और मर जाने वाले लोगों की तस्वीर दिखाई देती है। भुखमरी के शिकार लोग दिखाई देते हैं। दाना मांझी दिखाई देता है, जो अपनी पत्नी का शव कंधे पर लेकर चल रहा है और रोती बिलखती 12 साल की उसकी बेटी चौला उठाए उसके साथ चल रही होती है। तीन साल पहले दाना मांझी की तस्वीर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखी थी। उसकी पत्नी का शव ले जाने के लिए अस्पताल एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं कर पाया था।

सोचें, एक राज्य, जो खनिज संपदा से भरपूर है और जहां खनन और उद्योग दोनों के लिए आदर्श स्थितियां हैं। देश और दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों ने जहां पैर जमा रखे हैं और जिस राज्य में एक ही पार्टी की चुनी हुई स्थायी सरकार एक ही मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बरसों से चल रही हो वहां जिला अस्पतालों में एंबुलेंस या शव वाहन की व्यवस्था न हो! ऐसी सरकार और ऐसे मुख्यमंत्री को क्या कहेंगे?

ऐसा लगा था कि दाना मांझी की हृदयविदारक तस्वीर से कुंभकर्ण की नींद सो रही सरकार जगेगी। कम से कम जिला और प्रखंड स्तर के अस्पतालों में एंबुलेंस और शव वाहन की व्यवस्था होगी। पर तीन साल बाद स्थिति वहीं ढाक के तीन पात वाली है। अब भी लोग खाट पर रख कर इलाज के लिए ले जाए जा रहे हैं और हमारे अखबार खाट ढोने वाले की मानवीयता और उसकी करुणा की कथाएं लिख रहे हैं।

यह विडंबना अपने लोकतंत्र की भी है, जिसमें सरकारों और चुने हुए प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की कोई व्यवस्था नहीं है। वरना क्या कारण है, जो एक सरकार 20 साल के शासन में अपने राज्य के लोगों के लिए स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं नहीं मुहैया करा सके और फिर भी लगातार जीतती रहे! आदिवासी बहुलता वाले इस प्रदेश के लोग भी इसे अपनी नियति मान कर जीए जा रहे हैं। कंधे पर शव और खाट पर बीमार को ढो रहे हैं। जंगल राज इसे नहीं तो और किसे कहते हैं!

(साई फीचर्स)

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