14 नुमाइंदे एक तरफ़, नरेंद्र भाई एक तरफ़

 

 

(पंकज शर्मा)

यह दुस्साहस डोनाल्ड ट्रंप ही कर सकते थे। अनजान होने से बड़ा अहोभाग्य तो कुछ होता नहीं। भारत तो भारत, ट्रंप तो ख़ुद के अमेरिका के बारे में भी इतने अनजान हैं कि परमानंद की अवस्था में हैं। सो, जब उन्होंने हमारे नरेंद्र भाई मोदी को भारत-पिता कहा तो मुझे उनकी बुद्धि पर कतई तरस नहीं आया। हां, यह उपाधि बिना ना-नुकर स्वीकार कर लेने के नरेंद्र भाई के पराक्रम ने मुझे ज़रूर हैरत में डाला।

ट्रंप मस्तमौला हैं। अमेरिका का उनका राष्ट्रपति बन जाना ऐसा ही है, जैसे लोकतांत्रिक दुर्याेग से किसी दिन विजय माल्या भारत के प्रधानमंत्री बन जाएं। सो, वे कुछ भी कह सकते हैं। किसी को कोई भी उपाधि दे सकते हैं। मगर हमारे नरेंद्र भाई तो भारत को जानते हैं। कम-से-कम इतना तो जानते ही हैं कि भारत-पिता पर उनके मौनं स्वीकृति लक्षणम से भारतवासियों की आंखें फटी रह जाएंगी। मगर फिर भी उन्होंने दोनों हाथ जोड़ कर ट्रंप से यह नहीं कहा कि इतना शर्मिंदा तो न करें!

इस सदमे ने दो-एक दिन मुझे भौचक रखा। लेकिन फिर मैं ने सोचा कि विश्व-राजनय की तमाम स्थापित पपंरपराओं को ठेंगा दिखा कर भारत का जो प्रधानमंत्री ह्यूस्टन में अपने दोनों हाथ उठा कर अब की बार, ट्रंप सरकार का नारा बुलंद कर सकता है, अगर वह ट्रंप के विदूषक-विश्वविद्यालय से भारत-पिता की मानद उपाधि मिलने पर मन-मन भावा हो गया तो कौन-सी बड़ी बात है?

आज से चौथे दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की डेढ़ सौ वीं जयंती का सालाना समारोह शुरू होगा। राष्ट्रवादियों की आत्मा गदगद है कि अब उनके पास राष्ट्रपिता के साथ-साथ भारत-पिता भी हैं। देशभक्त कुछ भी सोचें। राष्ट्रवादियों को इससे कोई मतलब नहीं। और, अब तो विश्व-पिता डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की साधारण सभा में यह ऐलान भी कर दिया है कि आने वाला वक़्त वैश्विकता का नहीं, राष्ट्रवाद का है। सो, राष्ट्रवादियों की भुजाएं और भी ज़ोरों से फड़क रही हैं। उन्हें कौन यह समझाए कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद में क्या फ़र्क़ है? वे कभी मानेंगे ही नहीं कि देशभक्ति भीतर से जन्म लेती है और राष्ट्रवाद बाहर से थोपा जाता है। उनमें यह समझने की कूवत ही नहीं है कि अंदर के अंकुर बाहर के मुलम्मे से ज़्यादा असली होते हैं।

यह काम कोई भारतीय राष्ट्रवादी ही कर सकता है कि एक अमेरिकी राष्ट्रवादी की सरकार दोबारा लाने का नारा लगाते समय भूल जाए कि ऐसा करने के लिए उसने अपने सवा अरब देशवासियों से पूछ लिया है या नहीं? निजी हैसियत से नरेंद्र भाई जो चाहें, करते। भारतीय जनता पार्टी के नुमाइंदे के नाते भी वे अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं। मगर जब हम यह कहते नहीं थकते कि भारत के प्रधानमंत्री के नाते नरेंद्र भाई जब परदेसी धरती पर हों तो विरोधियों को उनके खि़लाफ़ कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए तो क्या नरेंद्र भाई की भी यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि विदेशी ज़मीन पर वे भी भारत के प्रधानमंत्री की गरिमा रखते हुए व्यवहार करें? क्या आपने इससे पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री को किसी भी देश में किसी एक राजनीतिक दल की सरकार लाने की गुहार मचाते कूदते देखा था?

आज़ादी के बाद से हमारे देश में 15 व्यक्ति प्रधानमंत्री बने हैं। इस बीच अमेरिका में 13 व्यक्ति राष्ट्रपति बने। भारत के प्रधानमंत्रियों में से 10 कांग्रेस के थे। नरेंद्र भाई समेत 2 भाजपा के। 2 युनाइटेड फ्रंट के। बाकी एक-एक जनता पार्टी, जनता पार्टी सेकुलर, नेशनल फ्रंट और समाजवादी जनता पार्टी के। 1947 के बाद से अब तक अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के 6 और रिपब्लिकन पार्टी के 7 लोग राष्ट्रपति बने हैं। लेकिन नरेंद्र भाई और ट्रंप की परस्पर ताल-से-ताल मिलाई के नृत्य में राजनय के वस्त्रहरण की ऐसी होड़ किसी ने कभी देखी? मुझे नहीं लगता कि किसी और जुगलबंदी ने भारतीयों और अमेरिकियों की ऐसी फ़जीहत कभी कराई होगी।

जवाहरलाल नेहरू ने तो कभी हैरी ट्रूमैन, ड्वाइट आइज़नहोवर, जॉन कैनेडी या लिंडेल जॉन्सन की ज़िंदाबाद का नारा लगा कर उनमें से किसी की दोबारा सरकार बनवाने के लिए नियम-परंपराएं ताक पर नहीं रखीं। लालबहादुर शास्त्री का शारीरिक सीना छप्पन तो छोड़िए, शायद छब्बीस का भी नहीं रहा होगा, लेकिन उनकी भीतरी दृढ़ता के चलते उन्हें भी हमने किसी लिंडेन जॉन्सन के लिए फुदकते नहीं देखा। इंदिरा गांधी उस मिट्टी की बनी ही नहीं थीं कि लिंडेन, रिचर्ड निक्सन, गेरॉल्ड फोर्ड, जिमी कार्टर और रोनाल्ड रीगन को दंडवत करने का सोचें भी। उन्होंने तो हमेशा उन सबसे ही भारत को दंडवत कराया। मोरारजी देसाई और चरण सिंह तक कभी जिमी कार्टर के लिए नहीं थिरके।

राजीव गांधी के लिए छाता पकड़े रोनाल्ड रीगन की तस्वीरें तो आपने भी देखी होंगी। पर, क्या जॉर्ज बुश (सीनियर) तक के सामने भरतनाट्यम करते हुए राजीव की कोई तस्वीर कभी किसी ने देखी? विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और पी. वी. नरसिंहराव भी बुश सीनियर से चरणामृत लेने नहीं गए। नरसिंहराव को अमेरिका-परस्त माना जाता था, मगर वे भी बिल क्लिंटन की घोड़ी के आगे नाचते कभी नहीं दिखे।

भाजपा की तरफ़ से अब तक बने सबसे महान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को क्या आप में से किसी ने क्लिंटन और जॉर्ज बुश (जूनियर) के सामने मुज़रा करते देखा? अटल जी तो अटल जी थे, एच. डी. देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल जैसे सियासी तौर पर बेहद कमज़ोर माने जाने वाले प्रधानमंत्रियों तक को कभी क्लिंटन को छू-छू कर देखने की ललक नहीं हुई। इतनी लाज तो भारतवासियों की सभी ने रखी।

डॉ. मनमोहन सिंह का तो जॉर्ज बुश (जूनियर) और बराक ओबामा कितना आदर करते थे, सभी जानते हैं। मेरे दोस्त बराक, मेरे दोस्त बराक रटने वाले नरेंद्र भाई को ट्रंप ने भले ही अपना दोस्त कह दिया हो, ओबामा ने कभी नहीं कहा। और, वही ओबामा मनमोहन सिंह को सार्वजनिक तौर पर अपना गुरु कहा करते थे। विश्व-राजनय में व्यक्तिगत संबंधों की मर्यादा और गरिमा सीखने की जिन्हें थोड़ी-बहुत इच्छा हो, उन्हें हमारे देश के प्रधानमंत्री रहे बाकी 14 व्यक्तियों की आचरण संहिता का आचमन करना चाहिए।

एक-दूसरे के गले में बार-बार बाहें डाल कर, एक-दूसरे की हथेलियों पर बार-बार थाप दे कर, एक-दूसरे के बालों को बार-बार सहला कर, प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन करना किशोर-मन के स्वस्थ लक्षण हैं। मगर जब परिपक्व लोग ऐसा करें तो संसार उनके बचकानेपन पर हंसता है। दुनिया के देशों के आपसी संबंधों का पैमाना किशोर-वयी दैहिक संकेत नहीं, ज़मीनी सच्चाइयां तय करती हैं और ये सच्चाइयां क्या हैं, भारतवासी खूब जानते हैं।

130 करोड़ भारतवासियों के नुमाइंदे के लिए; फिर भले ही वोट देने गए 61 करोड़ लोगों में से 38 करोड़ ने उसे अपना वोट न दिया हो; जब ह्यूस्टन में भारतवंशियों का सैलाब हुलस कर जुटता है तो मुझे भी फ़ख्र होता है। मगर जब इस नुमाइंदे को मैं ट्रंप ज़िंदाबाद-ट्रंप ज़िंदाबाद करते देखता हूं तो मुझे पीछे से उस भारत माता की सिसकियां सुनाई देती हैं, जिसे अनगिनत देशभक्तों ने अपना रक्त दे कर बेड़ियों से आज़ाद कराया है। गहन चिंतनशीलता और तरल भावुकता में फ़र्क़ समझने का माद्दा न रखने वालों से कोई क्या कहे? भारत की परिकल्पना क्या अब हमें कोई डोनाल्ड ट्रंप बताएगा? आपकी गोद तक तो ठीक है नरेंद्र भाई, लेकिन हमें इस तरह ट्रंप को तो गोद मत दीजिए। आप जिस झूले में चाहें, जाकर झूलें। भारत किसी झूला-घर का हिस्सा न था, न है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

(साई फीचर्स)