मनमोहन सिंह, बस अब बचे!

 

 

(हरी शंकर व्यास)

हां, आश्चर्य नहीं होगा यदि कोल ब्लॉक आवंटन मामले में डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ भी भ्रष्टाचार की जांच रजिस्टर्ड हो जाए! आखिर कोयला सचिव को सजा हुई है तो उनके कैबिनेट कोयला मंत्री मनमोहन सिंह पर शक की सुई क्यों नहीं खड़ी की जा सकती है? मनमोहन सिंह को भी मोदी सरकार, उनकी ईडी, सीबीआई एजेंसियां प्रामाणिक तौर पर करार दे सकती हैं कि यूपीए सरकार के तमाम भ्रष्टाचारों की गंगोत्री याकि किंगपिन मनमोहन सिंह हैं। वैसे ही जैसे सहकारिता बैंक घोटाले के किंगपिन शरद पवार हैं। ध्यान रहे पुलिस ने सहकारी बैंक के कथित 25 हजार करोड़ रुपए के स्कैंडल की एफआईआर में शरद पवार का जिक्र बतौर किंगपिन किया है और इसी पर फिर ईडी ने शरद पवार को घेरा है। तथ्य याकि शरद पवार के इस बयान को नोट रखें कि वे कभी किसी रूप में बैंक में निर्णयकर्ता नहीं रहे। पिछले पचास सालों से इस सहकारी बैंक के न तो पदाधिकारी रहे और न डायरेक्टर!

सोचें, हिंदुओं के राज करने की समझ में क्या खूब खोज हुई है कि भारत में भ्रष्टाचार मिटाना है तो लुटेरे सरदारों के सरदार याकि किंगपिन को जेल में डालो। तब भला मोदी राज क्यों सरदार मनमोहन सिंह को छोड़ रहा है? अपनी तो इससे भी आगे बढ़ कर थीसिस है कि संघ परिवार, भाजपा और मोदी-शाह को आजाद भारत में भ्रष्टाचार की गंगा कांग्रेस को घोषित करके इसकी पूर्वज तिकड़ी गांधी-नेहरू-पटेल को भी किंगपिन करार दे कर इनकी तस्वीरों को अंडमान जेल में शिफ्ट कर देना चाहिए। सोनिया गांधी, राबर्ट वाड्रा, राहुल गांधी, अहमद पटेल, चिदंबरम आदि तिहाड़ जेल में तो गांधी-नेहरू-पटेल की तस्वीरें अंडमान जेल की उस कोठरी में भर दी जाएं, जिसमें सावरकर कैद रहे थे। ऐसा होना कांग्रेस याकि गांधी-नेहरू-पटेल के आइडिया ऑफ इंडिया का वीर सावरकर के आइडिया ऑफ इंडिया के आगे समर्पण होगा। हां, मैं नहीं मानता कि सरदार पटेल कांग्रेसी नहीं थे। मैं गांधी-नेहरू-पटेल को एक ही तिकड़ी में ढला-बुना हुआ मानता हूं और यदि भ्रष्टाचार में कालिख पोतने के लिए किंगपिन कसौटी बनी है और मोदी राज का मिशन भारत को भ्रष्टाचार मुक्त, कांग्रेस मुक्त बनाने का है तो कांग्रेस के ओरिजनल किंगपिन वैसे ही गांधी-नेहरू-पटेल हैं, जैसे मोदी भक्त सोनिया, मनमोहन, चिदंबरम को मान रहे हैं।

सो, गजब है भारत का मौजूदा वक्त! गजब है पूर्ण बहुमत वाली पहली हिंदू सरकार के राज करने का यह अंदाज! देश आर्थिकी और समाज की सभी कसौटी में बरबाद, जर्जर है। पूरे देश में अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में फफोले पक रहे हैं तो दुनिया भारत-पाक में एटमी विध्वंस का सिनेरियो लिए हुए है वहीं मोदी-शाह राज में प्राथिकता ऐसे विपक्ष मुक्त भारत बनाना है।

हिसाब से अपना मानना था और है कि पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद पाकिस्तान, इस्लामी देशों और विश्व बिरादरी की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा कर, आगे के विभिन्न सिनेरियो सोचते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह, शरद पवार याकि भारत के हर राजनीतिक दल और नेता को मोदी-शाह को विश्वास में लेने, उनका दिल जीत, पूरे देश में एकजुटता बनवाने की कोशिश करनी थी। लेकिन पांच अगस्त के बाद एप्रोच है कि हमने कश्मीर का झंझट खत्म कर दिया और अब विपक्ष का झंझट खत्म करो। चिदंबरम, शरद पवार, राबर्ट वाड्रा, शिवकुमार याकि उन तमाम चेहरों पर, उस कांग्रेस पर, उन विपक्षी दलों पर कालिख पोतो, जिससे ये जनता के बीच चेहरा न दिखा पाएं।

बहुत संभव है मोदी-शाह की यह सोच हो कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने से भारत के हिंदू इतने दिवाने हो गए हैं कि विपक्ष को पूरी तरह कालिख में रंगा प्रमाणित करने का वक्त है। या यह भी सोच संभव है कि आर्थिकी बदहाली और लोकल इश्यू हावी हो रहे हैं तो जनता का ध्यान बांटने के लिए पुराने पापियों पर कालिख पोतने का नैरेटिव बनवाया जाए।

जो हो, भारत राष्ट्र-राज्य का आज लब्बोलुआब किंगपिन याकि कि सरदारों के सरदार की धुरी है। शरद पवार कथित किंगपिन हैं तो मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी याकि कांग्रेस और विपक्ष की विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों के क्षेत्रीय किंगपिनों पर भी तलवार लटकी हुई है, कालिख पुत रही है। ये सब सच्ची जेल या ओपन जेल की उस हकीकत में जी रहे हैं, जिसमें पिंजरे में बंद एजेंसियों या मीडिया के तोते एक सुर में साबित करने को तुले हुए हैं कि तुम सब चोर हो, लुटरे हो, किंगपिन हो।

मैं न शरद पवार को ईमानदार मानता हूं और न चिदंबरम को लेकिन उन्हें भ्रष्ट, चोर, हत्यारा भी तब तक नहीं मान सकता जब तक ठोस सबूत या अदालती फैसला न हो। यह बात नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर भी 2014 से पहले लागू थी। इन्हें 2014 से पहले इसी अखबार में, इसी कॉलम में पिंजरे में बंद तोतों की साजिश का मारा मैंने लिखा था। लेकिन तब और अब का फर्क यह है कि तब मीडिया तोता नहीं था, न्यायपालिका तोता नहीं थी, लोग ओपन जेल में, मूर्खताओं के नक्कारखाने में नहीं जी रहे थे। आज पूरा देश ही पिंजरे में बंद तोते की रामनामी में ऐसा बख्तरबंद बना पड़ा है कि कई बार सचमुच समझ नहीं आता है कि इतनी जल्दी यह सब कैसे हो गया? सवा सौ करोड़ लोगों की सामूहिक चेतना को लगातार ऐसा पाला कैसे पड़ा हुआ है कि बुद्धि, विवेक, सत्य सब पिंजरे में बंद!

(साई फीचर्स)