किधर गए वैष्णव जन

 

 

(चंद्र भूषण)

भारतीय मिजाज के एक ग्लोबल आध्यात्मिक आयोजन में उसके धुरी व्यक्तित्वों में से एक के साथ बात चल रही थी। 82 की उनकी उम्र को ध्यान में रखते हुए मैंने उनसे पूछा कि अध्यात्म की राह पकड़नी थी तो ईश्वर अल्लाह तेरो नाम को क्यों नहीं चुना। जवाब में उन्होंने एक छोटा सा किस्सा सुनाया और मेरे लिए एक बहुत मुश्किल सवाल छोड़ गए। बताया कि वह कर्नाटक के दक्षिणी कन्नड़ा जिले के एक बेहद पिछड़े इलाके से आते हैं जहां आजादी के समय एक अदद रेडियो सिर्फ गांव के मुखिया के घर में हुआ करता था। आजादी की गहमागहमी में गांव के लोग, खासकर बच्चे हर शाम वहां समाचार सुनने जाते थे। वहीं एक शाम महात्मा गांधी के मारे जाने की खबर उनके कान में पड़ी। पूरे गांव के लिए यह वज्रपात जैसा था। वह देर रात वहां से रोते हुए घर लौटे, छोटे बच्चों के सिवा सब भूखे पेट सोए और अगली दोपहर गांव के किसी बुजुर्ग की तरह पास के श्मशान में गांधीजी का प्रतीकात्मक दाह संस्कार किया गया।

अध्यात्म में गांधीजी का रास्ता न पकड़ने के सवाल पर उन्होंने मुझसे प्रतिप्रश्न किया कि किस क्षेत्र में कौन उनके रास्ते पर चला, यह तो बताओ? मैंने विनोबा भावे का नाम लिया तो वह मुस्कुराए और बोले- हां, कुछ दूर तो वह चले। मुझे प्रतिष्ठित संपादक प्रभाष जोशी के मुंह से सुनी गई विनोबा की एक बात याद आई जो उन्होंने अपने अंतिम दिनों में भूदान की विफलता को ध्यान में रखते हुए खुद की तरफ उंगली उठाते हुए कही थी, बी फॉर बाबा, बी फॉर बिहार, बी फॉर भूदान, बी फॉर बोगस! फिर बाबा आमटे और मेधा पाटकर की शक्लें मेरे मन में उभरीं लेकिन इन्हें आध्यात्मिक विमर्श का हिस्सा बनाना उचित नहीं लगा, सो जान-बूझकर मैंने बात को प्रैक्टिकल के बजाय थिअरी की तरफ मोड़ने की कोशिश की। गांधी के लिए अध्यात्म कोई एकांत साधना नहीं था। हर कोई मानवीय गरिमा के साथ जिए, लोगों के बीच खड़ी नकली दीवारें ढह जाएं, सबका आपस में दुख-सुख का साझा हो, यह पुकार ही उनका अध्यात्म थी।

बुजुर्ग का कहना था कि यह जो भी था, अकेले गांधी का था और उनके साथ ही चला गया। इसे अध्यात्म की कोई अलग परंपरा माना जाए तो गांधी के बाद इसका नामलेवा कोई नहीं बचा। राजनीति में उनका नाम लिया जाता रहा, आगे भी लिया जाएगा लेकिन जिन्हें सरकारी कारोबार से कोई मतलब नहीं, उनके लिए गांधी क्या हैं, कहां हैं? धर्म, दर्शन, अध्यात्म, कला-संस्कृति जैसे आम इंसानी दायरों में गांधी का जिक्र पचास के ही दशक में भूले-भटके भी आना बंद हो गया था। एक आदर्शवादी नौजवान जिसकी दुनियादारी में कोई दिलचस्पी न हो, अपनी भीतरी तड़प को शांत करने के लिए गांधी का आध्यात्मिक रास्ता कहां से पकड़ेगा, जब ऐसा कोई रास्ता कहीं बचा ही नहीं है!

(साई फीचर्स)