सरकार कितनी कंपनियों को बेचेगी?

 

 

(सुशांत कुमार)

केंद्र सरकार के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पिछले दिनों कहा कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है। हालांकि इसके अलावा सरकार और कोई काम करती भी नहीं है। बाकी सारे काम तो भारत में भगवान भरोसे होते हैं। भारत में सरकार का मुख्य काम कारोबार करना ही है। सरकार तेल बेचती है, बैंक चलाती है, लोहा बेचती है, हवाई जहाज और ट्रेन चलाती है, बस चलाती है आदि आदि। कुल मिला कर हर किस्म के कारोबार में सरकार शामिल है। पर अब सरकार कह रही है कि उसका काम कारोबार करना नहीं है। यह इल्हाम होने के बाद सरकार तमाम सरकारी कंपनियों को बेचने की तैयारी में लगी है।

सरकार ने एयर इंडिया को बेचने का फैसला किया है। इसकी बिक्री के साथ ही सरकार विमानन के कारोबार से बाहर हो जाएगी। इसे बेचने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में चार मंत्रियों का एक समूह बना है। ध्यान रहे कंपनी के ऊपर करीब 75 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। इसलिए इस बात की उम्मीद नहीं है कि इसकी बिक्री से सरकार को कोई खास कमाई होगी। इसलिए इसके साथ साथ कई और कंपनियों को बेचने का फैसला कर लिया गया है। सरकार हवाईअड्डे भी बेच रही है और रेलवे के निजीकरण की भी शुरुआत हो गई है।

सरकार डेढ़ सौ ट्रेन और 50 स्टेशन पहले चरण में निजी हाथों में देने जा रही है। कहा जा सकता है कि अगले कुछ दिन में सरकार सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र से पूरी तरह बाहर हो जाएगी। फिर लोगों का आवागमन पूरी तरह से निजी हाथों में होगा। हवाई यातायात तो हो सकता है कि अगले चंद महीनों में ही पूरी तरह से निजी हाथों में चला जाए। आम लोगों पर इसका क्या असर होगा, इसका आकलन बाद में होगा। यह भी सरकार की खूबी है कि वह फैसला करने से पहले उसके असर का आकलन नहीं करती है। जैसे धूमधड़ाके से जीएसटी लागू किया गया और उसके बाद एक सौ से ज्यादा बदलाव किए जा चुके हैं। उसमें बनाए गए शुल्क के स्लैब अप्रासंगिक हो गए हैं और रिटर्न भऱने का तरीका भी पूरी तरह से बदला जा चुका है। इसके बावजूद तीन दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि इसमें कुछ खामियां हैं और लोगों की मुश्किलें नहीं दूर कर पा रहा है। सरकार का अपना राजस्व कम हुआ है सो, अलग है। उसी राजस्व की भरपाई के लिए सरकारी कंपनियों को बेचने का सिलसिला तेज हुआ है।

सरकार अपनी दो संचार कंपनियों भारत संचार निगम लिमिटेड, बीएसएनएल और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड, एमटीएनएल को बंद करने की तैयारी में है। इनके बंद होने के बाद सरकार संचार सेवा के क्षेत्र से पूरी तरह से बाहर हो जाएगी और देश के लोग अपने हर किस्म के संचार के लिए निजी क्षेत्र की तीन कंपनियों पर निर्भर रहेंगे। बहरहाल, विमानन, रेलवे और संचार के सेक्टर से बाहर होने से पहले केंद्र सरकार कम से कम पांच सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने जा रही है। इनसे सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा मिलेंगे। कहा जा रहा है कि कारपोरेट टैक्स में छूट के जरिए सरकार ने देश की निजी कंपनियों को करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए की जो राहत दी है उसकी भरपाई सरकारी कंपनियों को बेच कर की जाएगी।

हैरानी की बात यह है कि सरकार जिन पांच सरकारी कंपनियों को बेचने जा रही है उनमें से कोई भी कंपनी घाटे में नहीं चल रही है। मिसाल के तौर पर सरकार भारत पेट्रोलियम, बीपीसीएल को बेचने जा रही है। इसमें सरकार 53 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी बेचेगी। वित्त वर्ष 2018-19 में इस कंपनी का मुनाफा सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का था और इसकी बाजार पूंजी एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है। सिर्फ इस कंपनी में हिस्सेदारी बेच कर सरकार को 54 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम मिलेगी। इसी तरह सरकार कंटेनर कारपोरेशन, कॉनकोर को बेचने जा रही है, जिसका मुनाफा पिछले वित्त वर्ष में करीब 12 सौ करोड़ रुपए था। इसकी बाजार पूंजी करीब 35 हजार करोड़ रुपए की है और सरकार इसमें 30 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी। इन दोनों कंपनियों में काम करने वाले लोगों की संख्या चार हजार के करीब है।

सरकार इनके अलावा शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया, नार्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन लिमिटेड और टीएचडीसी को बेच रही है। ये पांचों कंपनियां भी मुनाफा कमा रही हैं। पिछले वित्त वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक टीएचडीसी का मुनाफा 12 सौ करोड़ रुपए से ज्यादा रहा। हालांकि इस कंपनी की बाजार पूंजी नौ हजार करोड रुपए से कुछ ज्यादा का ही है। शिपिंग कारपोरेशन का मुनाफा 2017-18 में ढाई सौ करोड़ रुपए से ऊपर का था और नार्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन का मुनाफा उसी अवधि में 270 करोड़ रुपए के करीब था। इन पांचों कंपनियों में शेयर बेचने से सरकार को एक लाख पांच हजार करोड़ रुपए मिलेंगे।

यह सही है कि सरकार की राजस्व वसूली कम हुई है। यह भी सही है कि सरकार ने कारपोरेट टैक्स के रूप में डेढ़ लाख करोड़ रुपए की राहत कंपनियों को दी है। सरकार की हालत खस्ता है और तभी उसे रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष से एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए लेने पड़े। पर अभी सरकार जिस तरह से सरकारी कंपनियों को बेच रही है वह विनिवेश के स्थापित नियमों के भी विपरीत है। विनिवेश का पूरा सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि सरकार ऐसी कंपनियों को बेचेगी, जो घाटे में हैं, बीमार हैं और उन्हें ठीक करके चला सकना संभव नहीं है। पर यहां तो तमाम आर्थिक मंदी के दौर में भी मुनाफा कमा रही कंपनियों को बेच कर पैसे जुटाने का प्रयास हो रहा है। इसे किस आधार पर विनिवेश कहा जाएगा? यह तो घाटे वाली कंपनियों से पीछा छुड़ाना नहीं है, बल्कि घर का कीमती जेवर बेच कर जरूरत के लिए पैसे जुटाना है! हैरानी है कि इसके बावजूद सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि देश में मंदी नहीं है।

(साई फीचर्स)