समझौते का रास्ता

 

 

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई खत्म होने के साथ ही इस मसले को अदालती दायरे से बाहर सुलझाने का एक सूत्र भी सामने आया है। सुनवाई के आखिरी दिन मध्यस्थता समिति ने अपनी रिपोर्ट पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपी जिसमें 2.77 एकड़ की विवादित जमीन पर राममंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने के लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। माना जा रहा है कि ये शर्तें यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड की हैं। पहली शर्त यह है कि धार्मिक स्थल (विशेष प्रावधान) कानून, 1991 को देश भर में लागू किया जाए। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद इसके दायरे में नहीं है। यह कानून कहता है कि देश भर में धार्मिक स्थलों की स्थिति 15 अगस्त, 1947 से पहले जैसी ही कायम रखी जाएगी।

दूसरी शर्त के मुताबिक मुस्लिम पक्ष अयोध्या की विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ देगा, लेकिन सरकार को अयोध्या की सारी मस्जिदों का कायाकल्प करवाना होगा। बाद में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड किसी वैकल्पिक स्थल पर एक मस्जिद बनाएगा। तीसरी शर्त एएसआई के अधिग्रहण वाली कुछ चुनिंदा मस्जिदों में नमाज की अनुमति देने की है। इसके अलावा अयोध्या में सामाजिक सौहार्द के लिए एक संस्थान बनाने की बात भी है। दरअसल ये सूचनाएं मीडिया रिपोर्टों के जरिए सामने आई हैं, संबद्ध पक्ष इस पर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कह रहे। बुधवार को वक्फ बोर्ड से जुड़े कुछ लोगों ने ऐसे किसी प्रस्ताव से इनकार भी किया। जो भी हो, अगर ये बातें चर्चा में हैं तो मानना होगा कि मध्यस्थता का रास्ता अभी छोड़ा नहीं गया है।

कोर्ट ने सुनवाई भले खत्म कर दी हो लेकिन बाकी प्रक्रियाएं चलती रहेंगी। अदालत ने दस्तावेज जमा कराने के लिए तीन दिन का वक्त भी दे रखा है। कहा जा रहा है कि मध्यस्थता समिति की सिफारिश पर यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के अलावा निर्माेही अखाड़े की पैतृक संस्था निर्वाणी अखाड़ा, हिंदू महासभा और राम जन्मस्थान पुनरुद्धार समिति के हस्ताक्षर हैं। हालांकि, विश्व हिंदू परिषद समर्थित राम जन्मभूमि न्यास और जमायत उलेमा ने इस पर दस्तखत नहीं किया। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि कुछ पक्षों की असहमति की स्थिति में मध्यस्थता की बात कैसे आगे बढ़ेगी? समझने की बात यह है कि चूंकि यह टाइटल सूट (जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा मुकदमा) है लिहाजा इसका फैसला एक के पक्ष में जाएगा और दूसरे के खिलाफ।

कानूनी दृष्टि से इसमें कोई उलझन नहीं है पर समाज को यह उलझा सकता है, क्योंकि फैसले से एक पक्ष में जीत का भाव पैदा होगा और दूसरे में हार का, जिससे इस विवाद के चलते दोनों समुदायों में अर्से से चला आ रहा वैमनस्य और बढ़ सकता है। ऐसे में बेहतर यही है कि दोनों तरफ के सुलह-समझौते के हिमायती लोग फैसले से पहले ही अपने समुदाय के बाकी पक्षकारों को इसके लिए राजी करें। अगर वे कामयाब हुए तो एक लंबी समस्या से छुटकारा मिलेगा और देश में सांप्रदायिक सौहार्द की जमीन भी मजबूत होगी।

(साई फीचर्स)