गोपाष्टमी पर्व पर महामंच द्वारा गाय, बछड़े को सजाकर की पूजा

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। गौ, गीता, गंगा महामंच द्वारा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी पर्व मनाया गया। गोपाष्टमी पर्व पर महामंच द्वारा गायों और उनके बछड़े को सजाकर उनकी पूजा की गयी।

महामंच के अध्यक्ष पंडित रविकान्त पाण्डेय ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हम गौ माता के ऋणी है और हमें उनका सम्मान और सेवा अवश्य ही करनी चाहिये।

गौ, गीता, गंगा महामंच के अध्यक्ष पं रविकान्त पाण्डेय ने गाय के वैज्ञानिक महत्व पर बताया कि गाय का गोबर परमाणु विकिरण को कम कर सकता है। गाय के गोबर में अल्फा, बीटा और गामा किरणों को अवशोषित करने की क्षमता है। घर के बाहर गोबर लगाने की परंपरा के पीछे यही वैज्ञानिक कारण है। वहीं गाय के सींगों का आकार पिरामिड की तरह होने के कारणों पर भी शोध करने पर पाया कि गाय के सींग शक्तिशाली एंटीना की तरह काम करते हैं और इनकी मदद से गाय सभी आकाशीय ऊर्जाओं को संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गौमूत्र, दूध और गोबर के द्वारा प्राप्त होती है।

इसके अलावा गाय की कूबड़ ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। इसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है। इसलिये गाय का दूध हल्का पीला होता है। यह पीलापन कैरोटीन तत्व के कारण होता है। जिससे कैंसर और अन्य बीमारियों से बचा जा सकता है। गाय की बनावट और गाय में पाए जाने वाले तत्वों के प्रभाव से सकारात्मक ऊर्जा निकलती है। जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और मानसिक शांति मिलती है।

पंचमुखी हनुमान मंदिर के प्रधान पुजारी पंडित विजय मिश्र ने बताया कि भविष्य पुराण के अनुसार गाय को माता यानी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। गौमाता के पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं।

गोपाष्टमी की परंपराओ के संबध मे सुनीता झारिया ने बताया कि गाय और बछड़े को सुबह नहलाकर तैयार किया जाता है। उसका श्रृंगार किया जाता हैं, पैरों में घुंघरू बांधे जाते हैं, अन्य आभूषण पहनाएं जाते हैं। गौ माता के सींगो पर चुनड़ी का पट्टा बाधा जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करके गाय के चरण स्पर्श किए जाते हैं। गाय की परिक्रमा की जाती हैं।

इसके बाद उन्हें चराने बाहर ले जाते है। इस दिन ग्वालों को भी दान दिया जाता हैं। कई लोग ग्वालों को नए कपड़े देकर तिलक लगाते हैं। शाम को जब गाय घर लौटती है, तब फिर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें अच्छा भोजन दिया जाता है। खासतौर पर इस दिन गाय को हरा चारा, हरा मटर एवं गुड़ खिलाया जाता हैं।

महामंच के अध्यक्ष पं रविकान्त पाण्डेय ने लोगों से कहा कि आधुनिक युग में यदि गोपाष्टमी पर गौशाला के लिये दान करें और गायों की रक्षा के लिये प्रयत्न करें तो गोपाष्टमी का पर्व सार्थक होगा और उसका फल भी प्राप्त होगा। पाण्डेय ने कहा कि गोपाष्टमी का उद्देश्य गौ संवर्धन की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है।