विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड!

 

 

(शरद खरे)

शाला में विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है, इसके बाद भी जब चाहे तब शारीरिक दण्ड दिये जाने के मामले प्रकाश में आते रहते हैं। हाल ही में छपारा के एक निज़ि स्कूल में एक विद्यार्थी को पीटने का मामला सामने आया है। इस मामले में अब तक क्या कार्यवाही हुई है इस बारे में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के द्वारा विस्तार से जानकारी सार्वजनिक नहीं की गयी है।

विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड देने से रोकने के लिये देश के संविधान में अनेक संशोधन भी किये गये हैं। किशोर न्याय अधिनियम की धारा 23 के अनुसार बच्चों के साथ किसी तरह की क्रूरता नहीं की जा सकती है। इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून की धारा 17 में भी विद्यार्थियों को दण्ड देने पर पूरी तरह से रोक लगायी गयी है। स्कूल में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार रोकने के लिये साल 2012 में एक विधेयक पारित किया गया है, जिसके मुताबिक बच्चों को शारीरिक दण्ड देने पर शिक्षक को तीन साल की जेल हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को मानसिक या शारीरिक दण्ड देना आरटीई की धारा 17 के तहत दण्डनीय अपराध है।

शालाओं में विद्यार्थियों को दण्ड दिये जाने के मामले में मनोवैज्ञानिकों का भी मत है कि उन्हें शारीरिक अथवा अन्य तरह के दण्ड से दण्डित किये जाने की बजाय अगर उन्हें प्यार से उनकी गलती का अहसास कराया जाये तो इसके बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। विडंबना ही कही जायेगी कि दिल्ली और भोपाल के वातानुकूलित कक्षों में बैठे नीति निर्धारकों के द्वारा जमीनी हकीकतों को नजर अंदाज़ कर शिक्षा की व्यवस्थाओं में मनमाने परिवर्तन किये जाते रहे हैं।

पिछले लगभग दो दशकों से शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा लिपिक की भूमिका में नज़र आने लगे हैं। मैपिंग फीडिंग के अलावा न जाने कितने तरह के दीगर गैर जरूरी कामों को शिक्षकों से करवाया जाता है। यही कारण है कि शिक्षक अपने मूल काम को पूरी ईमानदारी से संपादित नहीं कर पाते हैं। शिक्षक को पढ़ाने के लिये जब पर्याप्त समय नहीं मिल पायेगा तो वह विद्यार्थियों की गलती पर प्यार से समझाने के लिये समय कहाँ से निकालेगा!

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि जिन विद्यार्थियों को शाला में शारीरिक दण्ड दिया जाता है वे विद्यार्थी अपनी कक्षा में अन्य विद्यार्थियों के सामने अपमानित महसूस करते हैं। इसके चलते या तो वे चुप रहते हुए अवसाद में चले जाते हैं या फिर हिंसक होने लगते हैं। विद्यार्थियों को घर अथवा शाला में पीटे जाने पर उनके दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है। इससे बच्चा हीन भावना का शिकार भी होने लगता है।

बहरहाल, जिले में गाहे बेगाहे विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड दिये जाने के मामले प्रकाश में आते रहते हैं। शालाओं में इसके लिये एक समिति का गठन भी किया जाना चाहिये ताकि वह इस तरह के मामलों की जाँच कर सके। संवेदनशील जिलाधिकारी प्रवीण सिंह से जनापेक्षा है कि वे स्वसंज्ञान से इस तरह के संवेदनशील मामलों में पहल करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी और जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त को इस बात के लिये पाबंद करें कि इस तरह की घटनाएं रोकी जायें या इनकी पुनरावृत्ति न हो सके।

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