जनता का मूड और गुस्से को भांपें हुक्मरान!

(लिमटी खरे)

1978 में 26 अगस्त को दिल्ली के धौलाकुआ क्षेत्र में हुए संजय चौपड़ा, गीता चौपड़ा काण्ड के बाद देश उबल पड़ा था। इसके बाद लगने लगा था कि देश में बलात्कार के इस तरह के जघन्य मामलों में कमी आएगी। कुछ दिनों तक को इस तरह के जघन्य अपराध रूके रहे फिर रह रहकर इस तरह के मामले सामने आते रहे। 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया काण्ड में एक बार फिर देश के लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर आ गया था। अब हैदराबाद की घटना के बाद पुलिस एनकाऊॅटर में चार आरोपियों के मारे जाने के बाद सोशल मीडिया पर लोग जिस तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं उससे हुक्मरानों को चेतने की आवश्यकता महसूस हो रही है।

1978 में दिल्ली के घौलाकुंआ क्षेत्र में नौसेना अधिकारी के पुत्र और पुत्री के साथ जिस तरह की घटना को रंगा खुश (कुलजीत सिंह) एवं बिल्ला (जसवीर सिंह) ने अंजाम दिया था उससे देश दहल गया था। लगभग चार साल चली अदालती कार्यवाही के बाद रंगा बिल्ला को 1982 में फांसी पर लटका दिया गया था।
आज जवान हो रही पीढ़ी को रंगा बिल्ला काण्ड की याद नहीं होगी, पर लगभग सात साल पहले 2012 में निर्भया काण्ड की यादें उनके मानस पटल पर ताजा ही होंगी। इस दौरान लोगों में जिस तरह का आक्रोश उपजा था, वह किसी से छिपा नहीं है। 2012 में सोशल मीडिया का जादू सर चढ़कर नहीं बोल रहा था। इसलिए समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए लोगों तक सारी जानकारियां पहुंच रहीं थीं। इस दौर में माना जा रहा था कि सरकारों के द्वारा जनता की भावनाओं को समझा जा सकेगा और कानून में वांछित संशोधन किए जा सकेंगे।
हैदराबाद में जो घटना घटी उसे मीडिया में ज्यादा माईलेज नहीं मिल पाया। सोशल मीडिया में इस घटना को लेकर गुस्सा चरम पर था। दरिंदों ने पंचर हुई स्कूटी को सुधरवाने के बहाने एक बेटी के साथ दुष्कर्म किया। इतना ही नहीं पाशविकता का परिचय देते हुए उसे जला भी दिया गया। इस घटना के महज एक सप्ताह के अंदर ही उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक बलात्कार पीड़िता को आग के हवाले कर दिया गया है।
इस तरह की घटनाएं समाज को झझकोरने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती हैं। हैदराबाद में चार आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा और घटना को किस तरह से अंजाम दिया गया था इसलिए ब्रहस्पतिवार और शुक्रवार की दर्मयानी रात उन्हें घटनास्थल की ओर ले जाया गया।
सुबह जब लोगों की आंख खुली तो पता चला कि चारों आरोपियों ने रात के अंधेरे में पुलिस से हथियार छीनने का प्रयास किया, इन चारों आरोपियों को पुलिस के द्वारा एनकाऊॅटर में मार गिराया गया। जैसे ही यह बात लोगों को पता चली वैसे ही सोशल मीडिया भी सुर्ख होना आरंभ हो गया।
इस पूरे घटनाक्रम में एक बात पर विचार करना जरूरी है। हैदराबाद पुलिस के द्वारा पूरे घटनाक्रम को रीक्रिएट करना चाहा गया होता तो निश्चित तौर पर पुलिस के द्वारा (जैसा अमूमन होता है) इसकी वीडियोग्राफी कराई जा रही होगी। इस वीडियोग्राफी (अगर कराई गई होगी तो!) में सब कुछ साफ हो सकता है!
सोशल मीडिया पर जिस तरह का ट्रेंड चल रहा है उस पर सरकार को निगाह रखने की जरूरत है। एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर हैदराबाद पुलिस को बधाई देते नहीं थक रहा है। सोशल मीडिया पर पुलिस की तारीफ में कशीदे गढ़े जा रहे हैं। लोग अपने मन की भड़ास जमकर निकालते नजर आ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चलने वाला जुमला है कि अगर पुलिस ने यह अनजाने में किया है तो सौ बार सलाम और अगर जानबूझकर किया है तो एक हजार बार सलाम। इस जुमले से जनता के आक्रोश का अंदाजा लगाया जा सकता है। 2012 में निर्भया के आरोपी अभी भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
देखा जाए तो दुष्कर्म के मामलों को समय सीमा में ही सुलझाने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। इसके लिए सख्त कानून की जरूरत सालों से महसूस की जा रही है। देश में कानून की अवधारणा सामान्यतः यही बताई जाती है कि सौ दोषी छूट जाएं पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए।
कानून के जानकार यही बताते हैं कि देश के कानून में इतने सारे पेंच छूटे हुए हैं कि सालों साल तक किसी भी मामले के लिए पीड़ित न्याय के लिए चक्कर काटने पर मजबूर होते रहते है। आज जरूरत है कि सत्तर साल पहले बनाए गए कानूनों को नए सिरे से आज के समय की मांग के हिसाब से उनमें तब्दीली की जाए।
आज कानून का भय जरायमपेशा लोगों के मन से समाप्त होता दिख रहा है। जेल से पैरोल या जमानत मिलने पर छूटते ही न जाने कितने शातिर बदमाश दुबारा फिर उसी तरह की हरकतों को दोहराने में पल भर भी नहीं विचार करते हैं। देखा जाए तो नशे की आदी हो रही युवा पीढ़ी का इस अंधी सुरंग में जाने का कारण नशा ही प्रमुख रूप से सामने आ रहा है।
सरकारों को चाहिए कि शुक्रवार को हैदराबाद में एनकाऊॅटर में मारे गए चारों आरोपियों की घटना के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह के विचार लोगों के द्वारा पोस्ट किए जा रहे हैं उसका गहराई से अध्ययन किया जाए। इस तरह के विचार आज के समय में लोगों की मानसिकता को उजागर करने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं।
बलात्कारियों को जनता के हवाले कर दिया जाए, बलात्कारियों का एनकाऊॅटर कर दिया जाए, उन्हें सदियों पहले दी जाने वाली सजाओं की तरह ही सजा दी जाए, जैसी प्रतिक्रियाएं इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती हैं कि जनता आज क्या चाह रही है!
हैदराबाद प्रकरण में वास्तव में क्या हुआ इस बात पर से पर्दा तो तभी उठ पाएगा जब इसकी जांच मुकम्ममल हो पाएगी। पर अगर यह पूरा मामला कुक (क्रत्रिम तौर पर) किया गया है तो देश के संविधान और कानून के हिसाब से इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है। देश में सजा देने का काम माननीय न्यायालयों का है। अगर इस तरह से पुलिस ही मौके पर न्याय करने लगी तो देश के संविधान और कानून पर प्रश्न चिन्ह लगने स्वाभाविक ही हैं।
हैदराबाद में 26 नवंबर को घटी घटना ने एक बात को तो साबित कर दिया है कि दुष्कर्म के मामलों में अभी तक सरकारों के द्वारा किए गए प्रयास नाकाफी ही हैं। इसके लिए चाहे कितने भी सख्त कानून बनाए जाने की बात कही जा रही हो पर वर्तमान हालात इसी ओर इशारा करते दिख रहे हैं कि देश का सिस्टम अभी भी महिलाओं को पूर्ण सुरक्ष देने की स्थिति में कतई नहीं है। इसके अलावा अपराधियों पर नकेल कसने में भी नाकामयाब ही है।
आज कहने को महिलाओं को पुरूषों के बराबर दर्जा देने की हिमायत की जाती है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट ही नजर आती है। महिलाओं को पुरूषों के बराबर लाने के लिए अभी देश का समाज अंधी और अंधेरी सुरंग के अंदर ही यहां से वहां भटकते हुए रास्ता खोजता नजर आ रहा है। पता नहीं कब इसे रोशनी की किरण दिखाई देगी और यह इस सुरंग से बाहर आकर नए भारत का निर्माण करने के मार्ग प्रशस्त करेगा! (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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